Tuesday, April 27, 2021

निष्पृह

बहुत दिन हो गए और बहुत कुछ जीवन प्रवाह बह चूका। कुछ लिखा नहीं मैंने , वैसे लिखने को कुछ था भी नहीं। जीवन में जब तारतम्यता न हो तो वैसे ही मन निष्पृह हो जाता है। इच्छारहित। 

 

2 साल हुए शादी को , और नन्हा मुन्ना बाबू भी धरती पे आ चूका। याद करता हूँ , सितम्बर का महीना जो बहुत भयावह था। सोचता था लिखूंगा उस अनुभव को पर शायद अब तक मूड न बन पाने की वजह से लिख नहीं पाया। अब चूँकि अपने पास करने को कुछ हैं नहीं तो सोचता हूँ अपने अनुभव को ही शब्द रूप दूँ। 

बहुत दुःख होता है कि मैं एक ऐसी संस्था में काम कर रहा हूँ जिसने हमेशा मुझे पीड़ा ही दी है। हमेशा से , और लगभग तब से जब से मैं यहाँ आया , तबसे इसे छोड़ने का यत्र तत्र परयत्न कर रहा हूँ ,लेकिन किस्मत और भाग्य दोनों को यह मंजूर नहीं है। लगभग 12 साल हो आये , यहीं घुटता हूँ , पिसता हूँ , लेकिन छोड़ नहीं पता। कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है मेरे पास। 

Saturday, October 5, 2019

तुम ही आना ....

बहुत आयी गयीं यादें ,
मगर इस बार तुम ही आना।


तुम आओगे मुझे मिलने ,
खबर ये भी तुम ही लाना।

जुबिन नौटियाल का स्वर और शब्द हैं कुणाल वर्मा के.

लगातार सुन रहा हूँ इस गाने को , और मज़बूर हो गया हूँ कुछ लिखने के लिए. लगभग २ साल के बाद मेरे अपने ब्लॉग में कुछ लिखना हो रहा है। हाँ अब शादी हो गयी है मेरी और कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गया हूँ। सबकुछ भूल कर , छिना कर , सामान्य सा जीवन जीने की कोशिश करने लगा हूँ। एक आम आदमी का जीवन जैसा होना चाहिए , ठीक एकदम वैसा ही।

ये गाना सुनकर बहुत कुछ फ़्लैश बैक में आ रहा है जा रहा है।

बहुत आयी गयीं यादें ,
मगर इस बार तुम ही आना।


किस किस की यादें आ रही हैं और जा रही हैं , समझ ही नहीं पा रहा हूँ। बचपन से हर वो शख्स जिससे कुछ यादें  जुडी हुई है , टूट टूट कर आ रही है. 





Saturday, November 4, 2017

मैला आँचल.......

    अभी अभी ही ख़तम की हैं फणीश्वर नाथ रेणु लिखित ये किताब।  बहुत कुछ अपने जैसा , अपने घर गांव जैसा। मैं बिहार  कभी नहीं रहा हूँ ,सिर्फ 1 ,2  बार ही जाने का मौका मिला है। समझता हूँ कुछ ज्यादा फर्क नहीं है वहां और हमारे यहॉ।  सब कुछ एक समान हैं सोंधा सोंधा , माटी के महक जैसा। मुझे अपने पुरखो के घर में अधिक दिनों तक रहने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है , जिंदगी की  आपाधापी में सब कुछ पीछे छूट गया है मेरा।  खैर ,जब आप  किसी उपन्यास को कहानी को पढ़ रहे होते हो तो आप खुद उस कहानी से अपने आप को जोड़ लेते हो। उसके किसी पात्र में खुद को ढूंढ लेते हो या किसी पात्र के करीब हो जाते हो। मैं लक्ष्मी कोठारिन को सबसे शसक्त किरदार मानता हूँ। सर्वस्य समर्पण और निश्वार्थ सेवा ,अपने आस पास भी ऐसे बहुत से किरदार होते हैं जो अनसुने से अनछुवे से रह जाते हैं। डॉक्टर प्रशांत और कमली भी ,रेणु  जी ने शरतचंद्र जी को भी करीने से नमन किया हैं। शरतबाबू के उपन्यासों की यह नारी अपने विश्वाश पर अडिग होकर आज भी आगे बढ़ रही है ,रूप बदल दो ,नाम बदल दो , समय बदल दो ,पर यह कभी बदल नहीं सकती। और यह सिर्फ शरत की ही नारी नहीं है पुरे भारत वर्ष की नारी है। हमारे  आस पास की ही माँ,पत्नी ,बहन या किसी और रूप में। वो है तो यही कहीं ,यहीं कहीं अपने आस पास। गोदान पढ़ी थी कुछ दिनों पहले उसमे भी थी वो धनिया शरत बाबू की नारी ,अपने विश्वाश पर अडिग होकर बढ़ने वाली।
                   मैला आँचल की एक और नारी है जिसके बारे में शायद बहुत कम चर्चा हुई है ,कमली की माँ , विश्वनाथ तहसीलदार की पत्नी। कड़ी यातना के क्षणों में अपनी पुत्री के पक्ष में खड़ी  ,पति  और बेटी दोनों के बिच का सामंजस्य। मेरी बेटी का कोई दोख नहीं..... माँ रो पड़ती है,"कमली का कोई कसूर नहीं। डॉक्टर ने फुसलाकर उसका सत्यानाश किया है। माँ का दुःख अब कौन समझे।
        आंचलिकता ,सबसे बड़ी खासियत रही है रेणु जी की। पढ़ते हुए लगता जैसे सब कुछ अपने आस पास का ही है। अपना ही है। और यही ......

Thursday, October 19, 2017

राजू....

   आज दिवाली की रात है और जग जगमग है और जब बहरी परिवेश जगमग होता है तो अंदर का अँधेरा खुलकर बाहर आ ही जाता है। इंसान का माज़ी कभी उसका पीछा नहीं छोड़ती और इंसान को भी अपने माज़ी से मोहब्बत करना आना ही चाहिए। और अगर इस अँधेरे में कोई देवता सा हो तो....
     कम से कम मेरे लिए तो वो देवता ही था। जिंदगी के उस श्याह अँधेरे को अगर मै भूल भी जाऊ उस देवता को कभी नहीं भुला पाउँगा।  भूखे को भोजन देना सबसे बड़ा पुण्य कार्य कहा गया है ,भगवन की सबसे बड़ी भक्ति कही गयी है। और उस वक़्त सबसे बड़ी भक्ति ही कर रहा था वो। बड़ी दीदी भी याद आती है ,बस नतमस्तक हो जाने को मन करता है। क्या क्या लिखू उस वक़्त जो गुजरा था ,कहते हैं सब बुरी बातों को भूल कर उनमे छुपी अच्छी यादो को संजो कर रखना चाहिए। और उस वक़्त की केवल एक ही अच्छी याद है...राजू।
       आज इतने साल हो गए ,न कभी उसकी खबर मिली और ना ही उसे मिल पाया। शायद पता नहीं कहाँ हो। पता नहीं जीवन के किस दौर में हो। इस बार घर जाऊंगा तो कोशिश करूँगा कुछ खबर मिले उसकी। भगवान से प्रार्थना करता हूँ उसका जीवन भी उतना ही बड़ा हो जितना बड़ा उसका दिल था। दिल में हमेशा से दुआ उठती है कभी मिलु तो कहूं राजू जीवन के उन दिनों का जो अहसान है कभी मौका देना ,कुछ हल्का कर पाऊं।  जनता हूँ जन्मो जन्मो तक तुम्हारा वो अहसान नहीं चूका पाउँगा भाई। तुम कुछ भी न थे ,कुछ भी नहीं ,पर तुमने जो मेरे लिए किया वो तुम्हारे बड़प्पन को और बड़ा कर देता है।तब शायद नवी या दशवी में था मैं ,14 या 15  साल का,और अब जिंदगी का उतना ही हिस्सा और गुजर चूका है,रहा सहा वो भी गुजर जायेगा ,बस इसके गुजर जाने से पहले भगवान से दुआ करूँगा कि तुमसे एक बार तो मिला दे ,कम से कम धन्यवाद तो बोल पाऊं।  

Monday, October 16, 2017

प्रारब्ध....

                      सब प्रारब्ध का ही फल है। बहुत मेहनत करता हूँ कि अपने आप को खुश रखूं , पर ये हो नहीं पाता। कुछ न कुछ तो बना ही रहता है। चलो सब प्रारब्ध ही है अपना तो बस यही कर्त्तव्य है कि कर्म करते रहो ,अच्छा और बुरा होना तो भगवान के हाथो में होता है। और जब भी कुछ बुरा हो बस यही सोचना है कि चलो पिछले जनम का कोई पाप कटा। भाग्यवादी होना भी अच्छा होता है। 

Friday, September 1, 2017

भुखमरिया

भुखमरिया ,ये शब्द मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा रहा है ,और शायद अब ये मेरी नियति में छप गया है। इस शब्द को मैंने डिक्शनरी में भी ढूंढने की कोशिश की और इसका अर्थ मिला भूख से मरने की अवस्था और मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ इस अर्थ से। शायद इसका अर्थ होना चाहिए सब कुछ होते हुए भी भूख से मरने की अवस्था।
                 अब शुरुआत करता हूँ कि कब मेरा इस शब्द से पाला पड़ा ,बहुत पूरानी बात है,एक बहुत अच्छे ओहदे पर बैठा व्यक्ति जब हाफ प्लेट तड़का,2 रोटी और आधी कप चाय से अपना पेट भर लेता हो तो भुकमरिया शब्द जेहन में चस्पा हो जाता है। और इस बहुत पुरानी बात को याद करता हूँ तो ऐसा लगता है कि मैं ठीक वहीँ बैठा हूँ ,2 रोटी हाफ प्लेट तड़का और फिर आधी चाय। उस व्यक्ति को याद करता हूँ और वहां खुद को पाकर मुस्कुरा पड़ता हूँ। कल ही एक मित्र से बात कर रहा था ठीक कहा भाई ने तुम इतना सोचते हो इसलिए ही ये शब्द तुम्हारे आस पास ही भटकता रहता है।
    बैंकिंग में हूँ तो थोड़ा बहुत अर्थशास्त्र भी पढ़ लेता हूँ , तो बहोत पहले पढ़ी थी ,Cycle of poverty ,गरीबी का दुःश्चक्र ,कहते है गरीबी जब एक बार पीछा पकड़ लेती है तो कितनी भी कोशिश करो ख़तम नहीं होती ,चलती रहती है ,चलती रहती है जब तक कोई बहरी प्रभाव न पड़े. कम से कम ३ पीढ़ियों तक ,चाहे कोई कितना भी क्यों न कमा ले।  तीन पीढ़ियों तक तो वो परिवार भुखमरिया ही बना रहेगा। अब सोचता हूँ कितना बड़ा अनुभव रहा होगा और कितना सच्चा अनुभव रहा होगा इस थ्योरी को लिखने वाले का।
        चलो अब बात कुछ और भी करते हैं ,चलो बहुत कमाने लग गए ,खूब पैसा फिर भी ये भुखमरियागिरि कभी ख़तम नहीं होगी , क्यूंकि जो अनुभव इस दुष्चक्र में पड़  चुका होता है वो कभी पीछा नहीं छोड़ेगा।  पैसे खूब कमा लोगे लेकिन ट्रैन के जनरल डिब्बे में ही सफर करना ज्यादा अच्छा लगेगा ,अपनापन तो वहीँ मह्सुश होगा न। एयरपोर्ट की 15 ,20 हज़ार तनख्वाह वालो से तो आप बात ही नहीं कर पाएंगे ,भुखमरियागिरी  आड़े जाएगी न। डोमिनोस या केएफसी से आर्डर करने से ज्यादा बेहतर सड़क के किनारे लगे थडियो और ठेलो का स्वाद ही भला लगेगा। रेमंड्स ,लेवाइस ,लाइफस्टाइल के शोरूम से बेहतर तो वही फुटपाथिया कपडा ,हाँ जी सही पकडे हैं रांची मेन रोड हनुमान मंदिर के पीछे 100 रुपया ,100 रूपया वाला कपडा ही मन को भायेगा। भुखमरिया गिरी ही है भाई।
  बस बहुत लम्बा निबंध लिखा जा सकता है , ये जो शब्द चस्पा हैं न जिंदगी में , बहुत लम्बा। और लिखूंगा भी लेकिन अभी नहीं फिर कभी।

Monday, April 17, 2017

Thanks to Almighty

M home,remembering all stuff went through for last 10 years,agony,pain,suffering.although it's 10 years and m still standing under the electricity pole in front of my house,counting stars...thanking almighty for all these years standing by me side ,making me strong,strong enough to bring smile on the faces of my family...m not the day dreamer m content with what I have and ...I thank God Almighty for the same...

निष्पृह