अभी अभी पढ़ा है "बानाभत्तकी आत्मकथा",प्रमुदित होता हूँ और आह्लादित भी ,अर्चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कितने सौम्यक तरीके से बर्णन किया है अत्यंत ही मनोहारी है ,कभी कभी कभी तो समझ ही नहीं पता हूँ की सही में हिंदी में इतने शब्द हैं की ,अर्थ भी समझ से परे हो जाता है !
पर बहुत ही अच्छे तरीके से कहानी लिखी गयी है , तू जब किसी के लिए मरे तो फिर मरे, तुझे न राजा की चिंता हो न प्रजा की न धर्मं का न जगत का और न ही किसी और चीज़ का ,जो तुझे धर्मसंगत लगता है वही सच है ,और हाँ सुन सच भी एक ही होता है
नारी पूजा है और हर नारी मैं देव बासता है ,वैराग्य के साधको को ये क्यों नहीं समझ में आता की जिस धर्मं को आधार बनाकर बैराग्य धारण करते हैं क्या नारी शोभनि का अपमान नहीं है !जीवन कभी असफल नहीं होता होता है टी उसका उद्देश्य और कुछ भी नहीं ,अपवित्र कुछ भी नहीं होता !!
बहुत साडी चीज है जो मैं लिखा चाहता हूँ परन्तु अभी लिख नहीं प् रहा हूँ बहुत सरे उद्धरण मैंने पढ़े पर कोई भी शुद्ध रूप से याद नहीं कर प् रहा हूँ !
मौका मिला तो बहुत कुछ लिखूंगा !!
अभी बहुत सी भावनाएं आती हैं और जाती है ,मुझे भी समझ में नहीं आता की आखिर एस अहो क्यों रहा है,तिरस्कार किसी चीज़ का समाधान नह है ,पैर मुझे समझ में नहीं आ रहा है की ऐसा क्यों हो रहा है..मन में कोंपले फूटने का मतलब क्या होता है और तब जब आप जान रहे होते है की कुछ गलत सा अहसाह आपके अन्दर उत्पन्न हो रहा है...आखिर ऐसा क्यों होता है...क्यों दिल और दिमाग में हमेशा य्युध की स्तिथि बनी होती है। मन चंचल होता है बुत इतना भी चंचल नहीं होना चाहिए ...और ये भटकाव क्यों होता है मैं हमेशा से इसी प्रश्न का उत्तर धुन्धता फिर रहा हूँ ..मन में अजीब सी बैचनी होती है और दिमाग बहुत साडी बातें करता है ,पैर सच जब तक सामने होता है हमेशा परेसान करता है ...पल दो पल की बैचैनी मह्सुश कर रहा हूँ ...दिल इसे कुछ और नाम देना चाहता है और दिमाग कुछ और .....दिमाग कहता है बस कुछ पल की भावना है इसमें उत्तेजित होने वी कोई बात नहीं और नही प्रस्फुटित होने की.....दिल कहता है "कुछ और " है...भावनाएं बड़ी बिकट हैं और मैं अभी इसे प्रकृति के हाथ में छोड़ देता हूँ .....शम्भवाय होकर रहेगा अन्यथा जो भगवन की मर्जी .....पता नहीं ऐसी भावनाएं कितनी बात आती हैं और जाती हैं मैं भगवन से पुचता हूँ क्यों बंद नहीं करा देते ऐसी भावनायों का उत्पात ..क्यों नहीं शांत कर देते मेरी तृष्णा को और क्यों नहीं बना देते मुझे पवित्र ........पवित्रे बनाने की आश में !!!!
धन्ये महाराज धन्ये !!
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