बहुत प्यारे शब्दों का इस्तेमाल किया है , सुनता हूँ इन गानों को तो कुछ अपनेपन की अनुभूति होती है, पर न तो यहाँ अपनापन है और न ही अपना शहर , लगत है कितना पीछे छुट गया है अपना शहर और अपने लोग, सच कहूँ तो जीने का मकसद भी छूटता नज़र आता है , एक छोटी सी जिंदगी मैं अपने लोगों से ईतना दूर होकर जीना भी मुश्किल लगता है , आत्मीयता की एक बूंद के लिय भी यहाँ जिंदगी तरस सी जाती है , और हम इसी बूंद की तलाश में कई और मायने भी ढूनन्धने लग जाते हैं, और मैं भी इसका अपवाद नहीं हो सकता , और मैं भी इसी को तलाश करने लगता हूँ, पर अब लगता है की थोड़ी सी प्रतिबद्धत तो आ ही गयी है २, ३ साल पहले जो भटकाव होता था अब नहीं होता, हाँ सच है वो भटकाव अ नहीं होता, नहीं खुबसूरत चेहेरों पे भी नहीं...
खैर छोड़ो कुछ अपने शहर की बातें तो करूँ, आपना शहर अब अपना नहीं रहा , नाही अब ये शहर मुझे अपना मनाता है , बस एक अजनबी सा बर्ताव करता है, कहता है तुम्हे कल सुबह ही तो जाना है और मैं अकड़
कर रह जाता हूँ , काश मैं तुम्हे हक से अब भी आपना ही शहर कह पता , रांची भी शायद कुछ अपनी जैसी ही थी ,पर यहाँ राजस्थान मैं भटकते भटकते अपने अस्तित्व की पहचान भी खो चूका हूँ,
और क्या क्या लिखूं , कुछ तो लिखना ही हैं , हमेश सी ही गुरुवार अच्छा नहीं हो रहा हैं, कल तत्काल का टिकेट भी नहीं हुआ, और ४ टिकेट, देखता हूँ की एक भी कन्फर्म होता हैं या नहीं, नहीं हो तो बहुत मुस्किल होगी जाने में, वो यात्रा भी याद आ जय हैं जो , इसी समय में , और इसी ट्रेन में हुई थी, हा हा हा बड़ा मजेदार वाक्य हुआ था , लगता ही नहीं की १ साल पुरे गुजर गए, यार ऐसे देखते ही देखते पूरी जिंदगी गुजर जाएगी..
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