Wednesday, December 7, 2011

पता नहीं ऐसा कैसे हो गया

जिंदगी में गलती तो हो ही जाती है , यार कितना भी अच्छा सोचो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो हो ही जाता है, जब वो वक़्त गुजर रहा होता है तब कुछ भी पता नहीं चलता, पर जब गुजर जाता है तो पता चलता है की क्या सही था और क्या गलत था, चलो कोई न , इस बार तो बच गया, बंगलोरे का सफ़र भी ठीक थक था, सम्मिउल्ला से मिला , हिमांशु से मिला , बंगलोरे में संदीप से मिला, ओर अच्छा ही गुजर गया पर जब भी में कहीं से वापस आता हूँ हमेशा अपन को एक उधेड़बुन में पाता हूँ,, में यहाँ क्यों, क्या मेरी जिंदगी की यही दशा हैं, मेरी मंजिल कहीं और है बस यूँ ही जिंदगी जीते जी गुजर देनी है, यार न या तो होना चाहिए, में यहाँ अपना वक़्त नहीं गुजरना चाहता और जैसा लगता ही नहीं है ,पाता नहीं कब तक अपना चल पाता
की क्या है तो क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है, पर यार ज्जिंदगी ऐसी ही चलती है तो गुजर जाती है , गुजर जाएगी!

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