क्या करूँ भाई कुछ समझ मैं नहीं आता , कहाँ जाऊं क्या करूँ कैसे करूँ, एक अजीब सी बैचैनी से मैं परेसान हुआ जाता हूँ ,यार क्या मतलब है इस लाइफ का कहाँ ढूँढू इसका मतलब, या नहीं ढूँढू, करूँ तो मैं क्या करूँ, यार कुछ तो करना होगा ,मतलब तो निकलना ही पड़ेगा भाई नहीं तो बेमतलब हो जाएगी पूरी जिंदगी, कहाँ है मंजिल, कहाँ है रास्ता , कुछ तो पता चले , अरे हाँ कुछ तो पता चले , निम्बहेरा की जिंदगी , कैसी है जिंदगी कैसा है सफ़र , क्या पैसा कमाना और पेट पलना यही जिंदगी होती है
क्या ऐसा ही सब कुछ चलता रहेगा या कुछ बदलाव भी होंगे , जब मैं अकेला होता हूँ तो बहुत सरे प्रश्नों का जवाब ढूंढता हूँ या बस टाइम पास करता हूँ कुछ पता ही नहीं चल पता, पता नहीं कब पता चलेगा! पता नहीं कब तक मैं वो सारी चीजें करूँगा जो बचपन से मेरे सपने रहे हैं, अभी तो ऐसा लगता है की कुछ भी नहीं हो पायेगा , कुछ भी नहीं, ..अब भगवन ही मुझे रास्ता दिखा सकते हैं ...तो यार दिखाओ न ...नहीं तो मैं ऐसा ही V चैनल ही देखता रह जाऊंगा ! यार मुझे कुछ और भी देखना है और कुछ करना भी है ......पर पता नहीं का तक!
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