Sunday, April 15, 2012

नाटक का पटाक्षेप

5 महीने से चल रहे नाटक   पर्दा गिरा और नाटक ख़तम ....सच में हम पर्दा गिरने का ही इन्तेजार कर रहे होते हैं ....कुछ किरदार बहुत ही नाटकीय होते हैं और कुछ बहुत ही सीधे साधे..बस इसी से तो नाटक बनता है ....और हर नाटक से कुछ  न कुछ सीखने को मिलता है ...और हर नाटक के बाद इन्सान थोडा और मजबूत होता है ...थोडा और अनुभवी ......सच कहूँ तो इस से उसे अगले नाटक को सही से करने की शक्ति मिलती है , चाहे किरदार कोई भी हो ....

और साला एक नाटक के ख़तम होने के बाद जिंदगी रूकती कहाँ है ...बस चलती  जाती है ...और हम नए नाटक के लिए तैयार हो रहे होते हैं...

बस इन्सान को खुद को तैयार रखना चहिये...हर किरदार में अपने आप को ढालने के लिए..और हर उस नाटक के लिए भी तैयार होना चहिये..जो भगवन उसके लिए चुनता है....


मैं तो अपना किरदार सही से निभाने की कोशिश कर रहा हूँ..बस यही पुछ ता हूँ की क्या आप भी इमानदार हैं..

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