Monday, July 2, 2012

दादाजी का जाना और दीदी की शादी


ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही न था , दीदी की शादी के ठीक २ दिन पहले दादाजी का देहांत ....
मेरी जिंदगी का शायद सबसे बड़ा सदमा ,एक तरफ तो हम उसे अपने घर से विदा करा रहे थे , जिसने मुझे बड़े लड़ प्यार से रखा , और दूसरी तरफ उन्हें जो मुझे बड़े स्नेह से रखते थे ...दादाजी का आत्मीय  स्नेह और दीदी की ममता , एक ही बार में दोनों मेरी जिंदगी से गायब...
पर क्या करू, यही जिंदगी है , क्यों इतना दुःख होता है .....मन तो करता है की जार jaar होकर रो पडूँ, पर रो भी नहीं पता ......क्यूँ इतना शुष्क हो गया हूँ मैं ....

No comments:

Post a Comment

निष्पृह