एक बहुत ही खुबसूरत कविता पढ़ी ...गजाननं माधव मुक्तिबोध जी की ...
लिख रहा हूँ ............
पता नहीं ,कब ,कौन ,कहाँ , किस ओर मिले ,
किस साँझ मिले , किस सुबह मिले !!
यह राह जिंदगी की ,
जिससे जिस जगह मिले, है ठीक वही ,
बस वही अहाते मेहंदी के ,
जिनके भीतर है कोई घर ,
बाहर प्रसन्न पीली कनेर ,
बरगद ऊँचा ,जमीं गीली ,
मन जिन्हें देखकर कल्पना करेगा जाने क्या !!
तब बैठ एक गंभीर वृक्ष के तले
टटोला मन , जिससे जिस छोर मिले ,
कर अपने अपने तप्त अनुभवों की तुलना
घुलना मिलना ....
अपनी धकधक में दर्दीले फैले -फैलेपन की मिठास ,
या निह्स्वत्मक विकास का युग
जिसकी मानव गति को सुनकर
तुम दौडोगे प्रत्येक व्यक्ति के
चरण तले जनपथ बनकर !!
वे आस्थाये तुमको दरिद्र करवाएंगी
की दैन्य ही भोगोगे पर ,तुम अनन्य होगे ..
प्रसन्न होगे ...
आत्मीय एक छवी तुम्हे नित्य भटकाएगी
जिस जगह , जहाँ जो छोर मिले ले जाएगी ..
पता नहीं ..कब , कौन ,कहाँ , किस ओर मिले।.......
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