क्यों इतना विरोधाभास है मुझमे ..समझ में ही नहीं आता मुझे ...आज अचानक से इच्छा हुई की कृपालु जी महाराज की शिष्या जगदीश्वरी देवी के प्रवचन में जाऊ , और चला गया ..क्यूँ अच्छाई और बुराई के बीच झूलता रहता हूँ ....विरोधाभासी ........कभी दारू मुर्गा पागलपंथी खिल्दंडा तो कभी शांत सौम्य भक्ति कथा श्रवक ...कभी batman सिरीज़ की movies देखता हूँ तो कभी मदर इंडिया या दो बीघा जमीन ........के एल सहगल और सुरैया तो कभी Coke Studio का fusion , भरे भरे और बावरी .....ब्रांच में भी ऐसा ही महसूस करता हूँ ...कभी तो किसी से ऐसे बात करता हूँ और उसकी समस्या ऐसे सुलझाता हूँ,जैसे मैं सबसे बढ़िया इन्सान हूँ , तो कभी किसी को ऐसे डांट कर भगा देता हु कि वो मुझे गलियां देता फिरे ....
खुद को समझना भी मुश्किल हो जाता है तब ..मैं ऐसा क्यूँ हूँ ...कुछ तो है जो मैं ढूंढ़ रहा हूँ ..कुछ ऐसे प्रश्नों का उत्तर जो मैं करता था कि हमे सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं ढूंढ़ना चाहिए ....पर आज मैं ढूंढ़ रहा हूँ .....हाँ ....मैं ही क्यूँ ? मैं ही क्यों ?...और तब ऐसा लगता है .....इसका उत्तर सिर्फ अध्यात्म दे सकता है ....Why we suffer ? शायद इसका कुछ भी जवाब मिले तो थोडा शांत हो जाऊ .....शांत धीर और गंभीर ......
खुद को समझना भी मुश्किल हो जाता है तब ..मैं ऐसा क्यूँ हूँ ...कुछ तो है जो मैं ढूंढ़ रहा हूँ ..कुछ ऐसे प्रश्नों का उत्तर जो मैं करता था कि हमे सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं ढूंढ़ना चाहिए ....पर आज मैं ढूंढ़ रहा हूँ .....हाँ ....मैं ही क्यूँ ? मैं ही क्यों ?...और तब ऐसा लगता है .....इसका उत्तर सिर्फ अध्यात्म दे सकता है ....Why we suffer ? शायद इसका कुछ भी जवाब मिले तो थोडा शांत हो जाऊ .....शांत धीर और गंभीर ......
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