Sunday, August 12, 2012

मंजिल की तालाश ...

पता नहीं कब तक मैं मंजिल की तलाश में इस तरह  भटकूँगा , कभी तो ऐसा लगे की रास्ता ही खुबसूरत है ,तो कभी एक खलिश सी , सिर्फ इसलिए कि कहीं तो है जहाँ मुझे पहुंचना है , बहुत जल्दी .कभी कभी बहुत खुश्क सा महसूस होता है , कहा करता था न कि राजस्थान की तपती रेत में बारिश की एक बूंद ढूंढ़ रहा हूँ ,पता नहीं ये तलाश भी कब तक पूरी होगी ....
ख्वाब को हकीकत में बदलना है , पता नहीं कब तक संभव होगा , क्यूँ कर मैं इतना अकिंचन होता जा रहा हूँ. कभी तो एकदम असहाय सा मासुस करता हूँ  तो कभी थोडा तुष्ट. और ये तुस्टी तभी आती है जब मेरा माज़ी कुरेदकर चला जाता है , हाँ वही माज़ी जब जिंदगी का हर दिन एक दू:स्वपन था , हर एक दिन तब स्याह  था और रातें कालिख भरी. अब तो थोडा उजाला जरुर है और इसी उजाले की बदौलत  तो मैं थोड़ी मुस्कराहट खरीद पाया हूँ .और तब याद आते हो तुम भी , हाँ तुम , काली स्याह रातों में तुम मेरे साथ थे ,मेरे साझीदार , बिना किसी उम्मीद  के , बिना किसी स्वार्थ के, आशा की एक किरण बनकर , और अब  हर चांदनी रात में तुम्हारी ख्वाहिश करता हूँ ....
और तब याद आते है मेरे हर सपने , एक अनाथाश्रम , एक वृधाश्रम और एक छोड़ा सा पागलखाना , जहाँ वैसे पागल जिनका कोई न हो , उनकी सेवा की जा सके....हाँ यही तो सपना है मेरा और शायद मेरी मंजिल भी ....एक तुम्हारे अलावा .....

 और हाँ एक नगमा जरुर शेयर करना चाहूँगा जिसे मैं कल शाम से ही सुनता जा रहा हूँ , उमराव जान का ये गीत जितना खुबसूरत है उतनी ही खूबसूरती से Coke Studio से कर्ष काले और मोनाली ठाकुर ने गाया है ....Thumps up for Coke Studio...

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