Thursday, September 13, 2012

मन की किताब से तुम, मेरा नाम ही मिटा देना.......

मन की किताब से तुम, मेरा नाम ही मिटा देना.......

बंदिनी फिल्म का ये गाना , जिसे गुलज़ार साब ने लिखा है, जब भी सुनता हूँ एक अजीब सी हलचल  सी मच जाती है ..पता नहीं किस भाव से लिखा गया गया है ये song और उसी शिद्दत से गाया भी  गया है ...
कहते है न कि, अपने आप को स्वीकार करना बहुत मुश्किल भरा काम है, अपनी अच्छाइयों से इतर अपनी बुराइयों को स्वीकार करना , शायद ये इंसानों से तो संभव नहीं है ...

मैं सब कुछ भूल कर  वर्तमान में जीने लगता हु ,खुश और मस्त ,पर  आज कुछ लोगो से मिला तो ये अहसाह हुआ , अपने बुरे होने का , और ये भी महसूस भी हुआ ....जब आप खुद को किसी और कि जगह पर रख कर देखते हैं तब ही आपको उस बन्दे की  तकलीफ , दर्द  का अहसास होता है, दुःख तो तब और होता है जब न चाहते हुए भी  आपकी वजह से कोई दुखी हो, आपकी वजह से किसी की मुस्कराहट छिन जाये ...... कुछ नहीं बस इतना ही कह सकता हूँ ....

मन कि किताब से तुम , मेरा नाम ही मिटा देना 
गुण तो न था कोई भी , अवगुण मेरे भुला देना ..
अवगुण मेरे भुला देना .....................................

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