खाली बैठा हू और काफी दिनों से कुछ लिखा भी नहीं , अपने विचारो को शब्दों का मूर्त रूप देने का ये बढ़िया वक़्त होता है जब आप खाली बैठे हो ...तो सोचा क्यूँ न कुछ बकलोली किया जाये , ऐसे भी आजकल मैंने खुद को खुद में ढाल लिया है , न कहीं आता हू न ही कहीं जाता हू बस कमरे को ही मैंने अपनी जिंदगी बना लिया है , और ऐसे में लिखना बड़ा सुकून देता है और सब से बड़ी बात तो ये की वक़्त बड़े आराम से गुजर जाता है ...
कुछ पत्रिकाए पढ़ रहा हूँ , आहा जिंदगी , हाँ इसके पिछले अंक कृष्ण और इश्क पे थे और इस महीने ये दर्शन पर केन्द्रित है , महान दार्शनिक सुकरात पर बहुत कुछ लिखा है . अच्छा लगता है ये जानकर के हज़ार साल पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य पर खुद को स्वाहा कर दिया...कहा है न पाने से बड़ी चीज़ तो खोना होता है ...जो खोया सो पाया ....
पर साला अब खोना अब कहाँ होता है बस पाने की दौड़ बाकी है और बस इसी पाने की दौड़ में पूरी दुनिया भागी जा रही है , खोने का सिद्धांत ही निरर्थक हो गया है..बस पाना है चाहे जैसे भी हो.. पैसे , प्यार, हर सांसारिक सुख और तो और अब भगवान को भी लोग जैसे तैसे पाना चाहते है ..खोना कहाँ है ..और यहीं पर पता हू थोडा आत्मिक सुकून , भक्ति , कुछ दिन पहले जगतगुरु कृपालु जी महाराज की शिष्य के प्रवचन पे गया था ...लगा अब भी थोडा खोने का भाव बाकी है , खुद को खोने का ..निःस्वार्थ ,अपने आप को कृष्ण पे लगा देना , बिने कुछ पाने की कामना किये ..और यह बड़ा परम भाव है ..रामानुज का विशिष्टाद्वैत भगवन और भक्त को ऐसे ही देखते हैं जैसे सूर्य और सूर्य से प्रदीप्त प्रकाश रश्मियाँ .पर हम जैसे लोगो को कभी कभी तो चार्वाक का दर्शन ही जीवन दर्शन सा लगता है , यावत जीवेत , सुखं जीवेत ....पापी हो या पुण्यात्मा , सूर्य कभी भेदभाव नहीं करता , सामान भाव से प्रकाश देता है और जल भी किसी पापी को उतना ही मिटा लगता है जितना किसी पुण्यात्मा को ..मतलब कर्मा का कोई मतलब नहीं होता और प्रारब्ध सिर्फ ब्राह्मणों के दिमाग की उपज..जीवन एक ही बार मिलता है और फिर सब कुछ यही पर ख़तम ..तो फिर वर्तमान में जियो ..पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ ही नहीं होती और न ही पाप पुण्य जैसे कोई चीज़ ..जो अच्छा लगे खुद को वही करो , पाप पुण्य से ऊपर उठाकर , समाज और संस्कार से ऊपर उठकर .....साला ये तो भ्रस्त कर देगा ..हाँ पर यही तो चीज़ है जो इन्सान के अन्दर सदियों से बैठी दबी कुचली इच्छाओं को बाहर की तरफ लती हैं ..और फिर ओशो तो यही कहते हैं , न तो कुछ अच्छा होता है और न ही बुरा . ये सब कुछ इन्सान का खुद का गढ़ा बुना है। जो तुम्हे अचछा लगे बस वही करो .यार ये दर्शन भी पता नहीं कहाँ खिंच लता है ..अगले पच्चीस सालो तक बहुत बकलोली करनी पड़ेगी तभी दर्शन पर कुछ लिख पाउँगा ...
पर हाँ इश्किया होने के लिए इतने लम्बे इन्तेजार की जरुरत नहीं..क्योंकि यहाँ कोई भावना सदियों से दबी कुचली हुई नहीं है और न ही उसे ऐसे रहने की जरुरत पड़ी , जब भी और जहा भी इसे लगा , खुलकर बाहर आ गयी ..अब देख लो कृष्ण और राधा ...और सदियों के बाद मीरा , और मैं खुशकिस्मत के मीरा की नगरी में बैठा हूँ , जहाँ के जर्रे जर्रे में मीरा का असीम प्रेम है , कृष्ण के लिए , मीरा मंदिर का चक्कर भी कभी कभार लगा आया करता हूँ , चित्तौड़ में और एक साधिका है जो वही मीरा के सबद सुनाती है , और मैं चुपचाप कोने में बैठकर सुना करता हूँ...मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥...और "मीरा" के प्रभु गिरधर नागर, हरस हरस जश गायो।.....बस बस ..यही तो सुकून है , खुद का खो जाना ..और क्या ..फिर मोबाईल की घंटी बजती है और मैं वापस इसी दुनिया में आ जाता हूँ , वही बैंक और वही वीभत्स जालिम दुनिया , वही मैं और तुम ...
पर सच बताऊँ तुम्हारा होना भी बहुत मायने रखता है , और मुझे तो कभी किसी दूसरी दुनिया में जाने की जरुरत ही नहीं पड़ती , जब तुम पास होते हो ..हाँ मेरी दूसरी , तीसरी और चौथी दुनिया भी तुम्ही हो ..हर गम , दुःख अवसाद , सब कुछ तुम्हारे पास आते ही छू मंतर , ये जादू नहीं तो और क्या है ..सब कुछ अच्छा सा लगने लगता है सब कुछ अच्छा सा होने लगता है ...रंग बिरंगी ये दुनिया और भी हसीं हो जाती है .हाँ जब तुम पास होते हो ..और कभी कभी तो ऐसे सिर्फ तुम्हारे पास होने के अहसास से ही होना शुरु हो जाता है..ये भी बड़ी नेमत है खुद का इशिकिया होना और इसके लिए बड़ा अनुभव भी जरुरी नहीं ..बस अन्दर से एक आवाज आनी चाहिए इश्किया इश्किया ....कुछ दिनों पहले एक दोस्त से बाते कर रहा था , और वो अपने एक दोस्त की बाते मुझे सुनाये जा रहा था , मैंने कहा यार वो तेरे लिए इतना कुछ करता है , सब सहता है सब सुनता है फिर शायद हदों तक तुमसे मुहब्बत भी , फिर तुम क्यों नहीं सोचते उसके बारे में ...और पता है उसका उत्तर क्या था ..यार उसके लिए ये आवाज ..इश्किया इश्किया वाली अन्दर से कभी आती नहीं ...हा हा हा ..सच है यार ये आवाज तो अन्दर से आनी चाहिए ..ड्रम ढोल और नगाड़े भी बजने चाहिए , पर नहीं बजती तो इसका कुछ किया भी नहीं जा सकता ....माहौल भी तो बदलना चाहिए ...ये नीरस जगह कब एस्किमो वाला टुन्ड्रा प्रदेश में बदल जाये या फिर अफ्रीका का वाइल्ड लाइफ सफारी ...पता नहीं न ..पर ये तो होना चाहिए न ..पर भावनायो में सच्चाई होनी चाहिए , कामना नहीं ..और यही कामना तो हर जगह इन्सान को गिरा देती है , जहाँ कामना आया , वह से इश्किया गायब, भाग जाता है ये इश्किया भी......इतने सालों से तुम्हे देख रहा हूँ ....एक चीज़ जो अब तक नहीं बदली है वो है ...No Demand , No Expectation and No Complaint ..जहाँ भी रहा मैं और जो कुछ भी सही गलत किया मैंने ....तुम्हारी ये No Demand , No Expectation and No Complaint वाली चीज़ हर वक़्त मुझे हरा देती है ...कभी कोई शिकवा नहीं, कोई गिला या शिकायत नै , सब कुछ स्वीकार होता है तुम्हे ...और यही से तो रूहानी शुरुआत होती है इश्किया इश्किया वाली...कुछ रूहानी और कुछ रूमानी सी..
कहा न की आज मैं बड़ी वाली बकलोली करने वाला हू ..हा हा हा

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