Monday, October 8, 2012

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती ...अजमेर

 पीर साब के दरबार में ये मेरी दूसरी हाजरी थी ...पिछले साल जनवरी में मैं गया था , उस वक़्त भी जय मेरे साथ था और इस बार की भी दस्तक उसी के साथ ...कोई प्लान नहीं बस जाना है तो जाना है , शम्भू  भी आया था जयपुर और मैंने कहा भी की अजमेर आ जाये ..ख्वाजा के दर पर ..पर एन मौके पर उसकी तबियत ख़राब हो गयी ..और आज जब पता चल रहा है की उसकी तबियत बहुत ही ख़राब हो गयी है ..

सच कहूँ तो दरगाह  के अन्दर बहुत शांति महसूस होती है , बहार के कोलाहल से अनादर का वातावरण एकदम से शांत ..मैं बैठ जाता हु चुपचाप , एकदम शांत , बाहर और अन्दर भी...बस कव्वाली की आवाज आ रही है ..पुरसुकून है ...सूफियो में बड़ी ताकत होती है ..और ये ताकत महसूस कर रहा होता हु ..सजदे  में खुद ब खुद सर झुक जाता है और दुआ में हाथ खुद ब खुद उठ जाते हैं..यहाँ हिन्दू होना या मुसलमान होना कोई भी मायने नहीं रखता ...मायने रखता है तो सिर्फ खुद का खुद होना ...सूफी संतो में और भक्ति संप्रदाय के संतो में यही समानता है ..खुद को खुदा के साथ मिला देना ...और और महसूस करना बहुत बड़ी नेमत है .....

अब देखता हूँ छोटी सी दुआ की है पता नहीं कब तक कुबूल होती है और कब तक मुझे दरगाह पर जाने का तीसरा मौका मिलता है .......ख्वाजा मेरे ख्वाजा ...

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