कल से ही एकदम सूना सूना सा महसूस कर रहा हु ..एकदम अकेला सा तनहा सा ..वापस निराशा के गर्त में डूबा हुआ . गहन अन्धकार में विलीन ...सोचा था वह पहुँच जाऊ जहाँ थोडा सकूँ मिलता है ..पर वह भी बेरुखी ..और शायद इसी का भागी हूँ मैं ..
कभी कभी तो सोच सोच कर परेशां हो जाता हूँ मैं , क्यों ये जिदगी हमारे अनुसार नहीं चलती . थोडा भी , और वही होता रहता है जो हम नहीं चाहते कि हो...अचानक से जुल्फान कि शादी ..सोचता हु तो लगता है कि पागल हो जाऊंगा ..पागल , विक्षिप्त ..कुछ भी नहीं है मेरे पास , सिर्फ निराशा के ..विचलित सा होता हुआ लगता है ..खुद का अस्तित्व , डगमगाता सा ....ये लड़ाई है दिए की और तूफान की.......फिर लगता है की मैंने सोचना ही छोड़ दिया है ..और सच है मेरे बचने का एकमात्र उपाय...न सोचोगे और न ही टेंशन होगा ...जैसा उपरवाला चाहता है वैसा ही होता है ..
पर वक़्त का क्या , वो तो बस निकालता चला जाता है , न तो कुछ नया और न की कुछ रचनात्मक ..और ऐसा पशुवत जिंदगी का मोल भी क्या ..कभी तो सिर्फ तुम्हारे होने के के अहसास से ही ऐसा लगता है है की सब कुछ पूरा है पूरा, करीने से सजा हुआ , और फिर तुम्हारे उसी बेरुखी से ऐसा लगता है सब कुछ चलवा , बस एक प्रतिबिम्ब , और कुछ भी नहीं ....
मेरे हर वक़्त मजबूत होने की कुछ तो वजह होनी चाहिए न और कभी कभी एकदम बेबस सा कमजोर होने की कुछ परिणिति ...सच तो ये भी है की मुझे कोई चीज़ जो शायद तुम्हारी है , बिखरने नहीं देती ...और कभी तो लगता है कि कब का मैं टूटकर बिखर चूका हूँ कई टुकडो में ..और हर टुकड़ा जैसे मेरी फितरत पे हँसता है ..और जब ये टुकड़ा मुझपर हँसता है तो माज़ी में चला जाता हु ...हाँ वही माज़ी ...जहा मेरा सब कुछ बिखर पड़ा है ...कुछ जार जार हो चुके सपने और कुछ दम तोडती महत्वाकंछाये...
पता नहीं कब तक ऐसा चलता रहेगा सब कुछ ..जहाँ मैं अपनी खुद की एक मासूम मुस्कराहट के लिए तडपता रहूँगा ..और इन खोखली हंसी का आवरण जो अपने अस्तित्व के ऊपर ओढ़ रखा है निकाल फेकुंगा...अब तो हर वक़्त बस नकारात्मक विचारो का आना जाना लगा रहता है ..निराशा की लहरे बस यहाँ वहां डोलती रहती है ..जिंदगी जैसे ठहराव पे आ पड़ी हो , ठीक किसी पुराने तालाब के गंदले पानी की तरह ....और ठीक मैं इन्तेजार कर रहा हूँ मानसून के उस फुहार का जो सब कुछ नया कर जाये ...इस गंदले पानी को स्वच्छ कर जाये , एक नया जीवन एक नया उमंग भर जाये ....और शायद उसी बदलाव का इन्तेजार है मुझे ..जहाँ कुछ रचनात्मक हो , जहा आशावाद हो और आगे बढ़ने का और कुछ नया करने का उमंग ......
पर अभी तो गहन अन्धकार है , मायूसी है , आने वाले चार पांच महीनो का हिसाब किताब ...पता नहीं मैं कैसे अपनी सब जिम्मेदारिया निभा पाउँगा...बस तुम्हारा ही सहारा है ....
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