इस बेतरतीब सी जिंदगी में कब कौन सी चीज़ कहाँ खड़ी हो जाये कुछ पता ही नहीं चलता , कुछ अप्र्तयशित जैसा ..और यही चीज़ जिंदगी को और बेतरतीब कर जाती है . जो भी हो इसे झेलना तो पड़ता ही है ..और तब थोड़ी energy मैं तुमसे ले लेता हूँ . रुखी सी जिंदगी में जिन्दा होने का अहसास जाग पड़ता है। थोड़ी सी खुश्की मिट जाती है ...थोडा सा तरोताजा हो लेता हूँ मैं हर उस चीज़ से झगड़ पड़ने को, जो शायद मुझे पीछे खींचती है ..मुझसे मेरे होने का मतलब पूछती है ......और उतनी ही शिद्दत सी उस सवाल का देता हूँ ..तेरे होने का मतलब ही तो मेरा होना है ..और फिर जिंदगी के सारे टेंशन ख़तम ..सब कुछ झेल लूँगा मैं अकेले ही ..सब कुछ ..हाँ फर्क तो सिर्फ यही पड़ेगा कि थोडा और खुष्क हो जाऊ मैं थोडा सा और रुखा ....लेकिन मेरी ये सदाबहार मुस्कराहट तो है ही मेरे ....
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