पता नहीं कितनी बारिशें आकर गुजर गई , पर हर वो बारिश जिसमे हम और तुम साथ साथ भीगे थे , जिंदगी की अनमोल अभिव्यक्ति सी बन गई . जब भी ये बारिश , मुझे छुकर गुजरती है , मुझे वो लम्हा याद आ जाता है , मुझे वो तुम्हारा छोटा सा फूलो की छापों वाला छाता भी याद आता है , थोड़े हरे रंग का, हमारे और तुम्हारे साथ भींगने का साक्षी ..मुझे बारिश से बचाने को तुम और तुम्हे बचाने को मैं , और इसी बचाने की जद्दोजहद में हम दोनों भींग जाते थे ..मुझे याद है मैं हमेशा तुम्हारी बायीं तरफ होता था और तुम हमेशा मेरी दायीं तरफ। और जब हम अलग होते थे , एक दुसरे को छुकर मह्सुश करते थे कि "तुम " बहुत भींग गए हो. शायद तुम्हे याद नहीं होगा जब हम तुम तुम्हारे उसी छाते के नीचे होकर जा रहे रहे थे , अचानक जोरदार बारिश हो गयी और हमारा एक कदम भी बढ़ाना मुश्किल सा हो गया था ,तब हम कुछ देर रुके थे एक छप्पर के निचे और अचानक से बिजली बहुत जोरों से कडकी थी , और तुम सिमट गए थे मुझमे , जैसे मुझमे और तुझमे कोई फर्क ही न हो और तब मुझे ऐसा लगा था की सारी कायनात ही सिमट गया हो मुझमे ...पता नहीं क्यों मैं उस वक़्त के अहसासात को शब्दों में ढाल ही नहीं पाता ..प्रकृति का सबसे हसीन लम्हा था वो मेरे लिये, वो बारिश की पहली बूंद , वो बिजली का कडकना , और वो तेरा मुझमे सिमट जाना ......
जब भी ये बारिश की पहली बूंद पड़ती है मेरे जिस्म पे, हमेशा तुम्हारी यादो से तारो ताज़ा हो जाता हूँ , उन लम्हों से जो अव्यक्त है , अनकही है , फिर भी है जानी पहचानी सी ..हमेशा से मैं डरता रहा हूँ , डरता रहा हूँ तुम्हारे बारे में कुछ भी लिखने सुनने को , पर जब भी ये बारिश की बुँदे मुझ पर गिरती हैं . मैं शायद उछ्रिन्ख्ल हो जाता हूँ और खुद को नहीं रोक पाता . शब्द खुद ब खुद मूर्त रूप लेने लग जाते हैं .....हर बारिश के साथ तुम्हारी यादें जुडी हुई हैं ..और पता नही इतने साल गुजर जाने के बाद भी यही मनाता हूँ की मेरी हर बारिश गुजरे, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे साथ ..
"वाह रे खयाली पुलाव , साला कभी कभी बकलोली हम भी कर ही लेते हैं ..हा हा हा .."
"वाह रे खयाली पुलाव , साला कभी कभी बकलोली हम भी कर ही लेते हैं ..हा हा हा .."
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