कभी कभी तुम ऐसा सवाल पूछ लेते हो कि मैं एकदम से सोच में पड जाता हूँ . और तुम्हारा ये सवाल कि " मैं क्यों हमेशा खुश रहता हूँ या खुश लगता हु", ने सचमुच मुझे सोचने को मजबूर कर दिया कि वास्तव में ऐसा है क्या और अगर ऐसा है तो क्यों है? क्या मैं सचमुच हमेशा खुश रहता हूँ , खुश रहने की कोशिश करता हूँ या फिर बस यूँ ही ...जो भी हो कभी कभी नोटिस करता हूँ मुझे लोग ब्रांच में भी कह जाते हैं कि , हमेशा ही मुझे लोग मुस्कुराता हुआ पाते है , कुछ दिन पहले की बात है , बैंक में नए नए ज्वाइन किये एक बन्दे ने मुझसे कहा की बैंक में सिर्फ मुझे सी हँसता , मुस्कुराता और खुश पाया है , बाकी सब लोगो को हमेशा सीरियस पाया है ..
चलो जो भी हो ,अब तो मुझे तुम्हारे प्रश्न का भी तो ढूँढना है कि क्यों मैं इतना मस्त रहता हूँ, सबसे पहली बात तो ये है कि "I accept everything as it comes in life ", जो जैसा है उसको उसी रूप में स्वीकार करता हूँ/ या फिर उसी रूप में स्वीकार करने की कोशिश करता हूँ .क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है जैसे ही मैंने किसी चीज़ को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश की , उसका स्वरुप ही बिगड़ जाता है ...उसे उसके खुद के रूप में ही रहने देता हूँ और उसके हिसाब से ही खुद को ढालने की जुगत में लग जाता है , तुम्हे पता है तुम हमेशा कहा करते हो की मैं वही कहता हू जो सामनेवाला सुनना चाहता है , बस यही जुगत है , खुश रहने का जुगाड़ .....
दूसरी चीज़ जो मुझे लगता है की मुझे खुश रखने में सहायक होता है वो एक वाक्य में समाहित है .."Never expect anything from anyone, because expectations hurt ".. मुझे याद आता है ३ साल पहले का एक वाकया , मेरे किसी दोस्त ने मुझसे कहा था की उसके roomies उसका care नहीं करते , इसलिए वो दुखी है, मैंने उससे सिर्फ यही कहा था कि तुम, ये expect करते हो कि वो तुम्हारा care करे, और जब वो तुम्हारा care नहीं करते तो तुम्हे हर्ट होता है . ऐसा करो कि ये expectation ही छोड़ दो ...और उसके बाद से मेरे उस दोस्त ने इस चीज़ की शिकायत शायद ही कभी की हो ..हाँ ये सच है , और जिंदगी का सबसे बड़ा फंडा ...
तीसरी चीज़ , हमेशा से हम ये कहते फिरते हैं कि , ये बंदा बुरा है या ये बंदी बुरी है क्यूंकि हो सकता है कि उसने तुम्हें harm किया हो .पर ये सच नहीं की वो हर किसी के लिए बुरा हो, मैं तो ये सोचता हु की जब कोई खुद को harm नहीं कर सकता तो किसी दुसरे को क्या harm करेगा ..So I always use to think everyone is good .".. वो भी अच्छा है जिसने मेरी भलाई की और वो भी जिसने नुकसान पहुँचाया ...और जब मैं इस वाक्य को दुहराता हूँ, अन्दर से एक शक्ति मिलती है उस बन्दे के लिए भी अच्छा सोचने और अच्छा करने को जिसने जाने , अनजाने में मेरा अहित किया . और मैं समझाता हूँ दुनिया में इस से बड़ी भावना कोई हो ही नहीं सकती ..तो खुश रहने का ये था तीसरा फंडा ...
इन फंडो को छोड़कर कुछ और कहूँगा , मेरी जिंदगी भी अब तक ऐसी गुजरी है की , खुश रहना तो बनता है यार , याद आता है 2006 फ़रवरी , जब सब तरफ अँधेरा था,तब मुझे एक रोशनी की किरण भी याद आती है जिसने मुझे भरोशा दिया था खुद पे भरोशा रखने का , नहीं तो मैं पता नहीं कहाँ टूटकर बिखरा हुआ होता । ..मुझे 2007 याद आता है , जब मैं पागल सा हुआ करता था , ये सोच सोच कर की graduation के बाद क्या करूँगा , कहाँ जाऊंगा . साधनविहीन विपन्न ..ख़ुदा ने नेमत बक्शी , सारे दरवाजे खुद ही खोल दिए .. मैं चेहरों की मुस्कान खरीदना चाहता था , जो कितने सालों पहले जाने कहाँ खो गयी थी ..और उपरवाले ने मेरी हर मुराद बक्शी ...मैं उड़ना चाहता था , उसने मुझे पंख बक्शे ....और मैं हँसना चाहता था उसने मुझे मुस्कराहट बक्शी ..और अब मैं उसकी इबादत इसी मुस्कराहट से करता हूँ ..
एक और वजह से मेरे खुश रहने का , निश्चिंतता , हाँ ये भी बड़ी चीज़ है ,मैं हमेशा निश्चिंत होता हूँ कि हाँ यहाँ कोई तो है जो मेरे पास होगा ..even in the darkest hour of my life, to hold my hand and assure me , के "मैं हूँ ना "..पता है उसे मेरी सारी बुराइयाँ पता होती है पर वो हमेशा मेरी बुराइयों में मेरी अच्छाई ढूंढ़ लाता है ...है न कमाल की बात ...और मुझे भी ऐसा लगता है की कोई तो है जहाँ मैं अपनेसारे दुःख गम विषाद समेट सकता हूँ ..हर वो लम्हा समेट सकता हु जहाँ मैं बहुत खुश होकर अपनी हंसी प्रस्फुटित की थी या फिर हर उस लम्हे को बाँट सकता हूँ जब मैंने अपनी आंसुओं से फिजाओं को रुलाया होगा .. तन्हा सा अकेला सा ..और इसी अकेलेपन का साक्षी वो , हर टूटते बिखरते सपनो का साक्षी ..वो भी तो बड़ी वजह है ...मेरे खुश रहने का ...
और रह गयी बात खुशिया ढूंढ़ने की तो हर छोटी चीज़ में कोशिश करता हूँ, खुशियाँ ढूंढ़ लु. ब्रांच में आने वाली वो रिटायर्ड टीचर या फिर वो साउथ इंडिया के वो अंकल ..इनको थोड़ी देर हंसाकर भी खुश हो लेता हूँ ..या फिर वो पेंशनर अंकल जिनके पेंशन में 1 रूपया का फर्क है ..कल ही गया था बड़ी सादरी ब्रांच , बैंक के कम से ,वहां भी एक गांववाला काफी देर से बैठा था , और जब मैंने उसे समझाया तो दुआएं दी मुझे उसने, खुश होने का एक और वजह , इस अजनबी देश में गर्मी में तपती रेत और उसपर बारिश की पहली बूंद, तब मैंने ऐसा ही कुछ मह्सुश किया ..कुछ तो नेमत बक्शी है उपरवाले ने ...वही घंटाघर चोराहे से गुजरने लगा तो पाया की , कहाँ था मैं चंदवा में , और कहाँ आ गया मैं राजस्थान में, और आया ही नहीं इसे मह्सुश भी कर रहा हूँ ...ये नेमत नहीं तो क्या है ...मैंने इबादत न करूँ तो क्या करूँ ..मैं खुश ना रहूँ तो क्या करूँ ...
और भी कई वजहें हो सकती है मेरे खुश रहने के , पर मुझे लगता है तुम्हे तुम्हारा उत्तर मिल गया होगा . ना मिला हो तो फिर पूछना ...मेरे मूड में आकर लिखने को 2 कप चाय और 2 ,3 घंटे का वक़्त चाहिए ....कम से कम मेरे ब्लॉग में एक पोस्ट तो बढेगा ..हा हा हा ...
चलो जो भी हो ,अब तो मुझे तुम्हारे प्रश्न का भी तो ढूँढना है कि क्यों मैं इतना मस्त रहता हूँ, सबसे पहली बात तो ये है कि "I accept everything as it comes in life ", जो जैसा है उसको उसी रूप में स्वीकार करता हूँ/ या फिर उसी रूप में स्वीकार करने की कोशिश करता हूँ .क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है जैसे ही मैंने किसी चीज़ को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश की , उसका स्वरुप ही बिगड़ जाता है ...उसे उसके खुद के रूप में ही रहने देता हूँ और उसके हिसाब से ही खुद को ढालने की जुगत में लग जाता है , तुम्हे पता है तुम हमेशा कहा करते हो की मैं वही कहता हू जो सामनेवाला सुनना चाहता है , बस यही जुगत है , खुश रहने का जुगाड़ .....
दूसरी चीज़ जो मुझे लगता है की मुझे खुश रखने में सहायक होता है वो एक वाक्य में समाहित है .."Never expect anything from anyone, because expectations hurt ".. मुझे याद आता है ३ साल पहले का एक वाकया , मेरे किसी दोस्त ने मुझसे कहा था की उसके roomies उसका care नहीं करते , इसलिए वो दुखी है, मैंने उससे सिर्फ यही कहा था कि तुम, ये expect करते हो कि वो तुम्हारा care करे, और जब वो तुम्हारा care नहीं करते तो तुम्हे हर्ट होता है . ऐसा करो कि ये expectation ही छोड़ दो ...और उसके बाद से मेरे उस दोस्त ने इस चीज़ की शिकायत शायद ही कभी की हो ..हाँ ये सच है , और जिंदगी का सबसे बड़ा फंडा ...
तीसरी चीज़ , हमेशा से हम ये कहते फिरते हैं कि , ये बंदा बुरा है या ये बंदी बुरी है क्यूंकि हो सकता है कि उसने तुम्हें harm किया हो .पर ये सच नहीं की वो हर किसी के लिए बुरा हो, मैं तो ये सोचता हु की जब कोई खुद को harm नहीं कर सकता तो किसी दुसरे को क्या harm करेगा ..So I always use to think everyone is good .".. वो भी अच्छा है जिसने मेरी भलाई की और वो भी जिसने नुकसान पहुँचाया ...और जब मैं इस वाक्य को दुहराता हूँ, अन्दर से एक शक्ति मिलती है उस बन्दे के लिए भी अच्छा सोचने और अच्छा करने को जिसने जाने , अनजाने में मेरा अहित किया . और मैं समझाता हूँ दुनिया में इस से बड़ी भावना कोई हो ही नहीं सकती ..तो खुश रहने का ये था तीसरा फंडा ...
इन फंडो को छोड़कर कुछ और कहूँगा , मेरी जिंदगी भी अब तक ऐसी गुजरी है की , खुश रहना तो बनता है यार , याद आता है 2006 फ़रवरी , जब सब तरफ अँधेरा था,तब मुझे एक रोशनी की किरण भी याद आती है जिसने मुझे भरोशा दिया था खुद पे भरोशा रखने का , नहीं तो मैं पता नहीं कहाँ टूटकर बिखरा हुआ होता । ..मुझे 2007 याद आता है , जब मैं पागल सा हुआ करता था , ये सोच सोच कर की graduation के बाद क्या करूँगा , कहाँ जाऊंगा . साधनविहीन विपन्न ..ख़ुदा ने नेमत बक्शी , सारे दरवाजे खुद ही खोल दिए .. मैं चेहरों की मुस्कान खरीदना चाहता था , जो कितने सालों पहले जाने कहाँ खो गयी थी ..और उपरवाले ने मेरी हर मुराद बक्शी ...मैं उड़ना चाहता था , उसने मुझे पंख बक्शे ....और मैं हँसना चाहता था उसने मुझे मुस्कराहट बक्शी ..और अब मैं उसकी इबादत इसी मुस्कराहट से करता हूँ ..
एक और वजह से मेरे खुश रहने का , निश्चिंतता , हाँ ये भी बड़ी चीज़ है ,मैं हमेशा निश्चिंत होता हूँ कि हाँ यहाँ कोई तो है जो मेरे पास होगा ..even in the darkest hour of my life, to hold my hand and assure me , के "मैं हूँ ना "..पता है उसे मेरी सारी बुराइयाँ पता होती है पर वो हमेशा मेरी बुराइयों में मेरी अच्छाई ढूंढ़ लाता है ...है न कमाल की बात ...और मुझे भी ऐसा लगता है की कोई तो है जहाँ मैं अपनेसारे दुःख गम विषाद समेट सकता हूँ ..हर वो लम्हा समेट सकता हु जहाँ मैं बहुत खुश होकर अपनी हंसी प्रस्फुटित की थी या फिर हर उस लम्हे को बाँट सकता हूँ जब मैंने अपनी आंसुओं से फिजाओं को रुलाया होगा .. तन्हा सा अकेला सा ..और इसी अकेलेपन का साक्षी वो , हर टूटते बिखरते सपनो का साक्षी ..वो भी तो बड़ी वजह है ...मेरे खुश रहने का ...
और रह गयी बात खुशिया ढूंढ़ने की तो हर छोटी चीज़ में कोशिश करता हूँ, खुशियाँ ढूंढ़ लु. ब्रांच में आने वाली वो रिटायर्ड टीचर या फिर वो साउथ इंडिया के वो अंकल ..इनको थोड़ी देर हंसाकर भी खुश हो लेता हूँ ..या फिर वो पेंशनर अंकल जिनके पेंशन में 1 रूपया का फर्क है ..कल ही गया था बड़ी सादरी ब्रांच , बैंक के कम से ,वहां भी एक गांववाला काफी देर से बैठा था , और जब मैंने उसे समझाया तो दुआएं दी मुझे उसने, खुश होने का एक और वजह , इस अजनबी देश में गर्मी में तपती रेत और उसपर बारिश की पहली बूंद, तब मैंने ऐसा ही कुछ मह्सुश किया ..कुछ तो नेमत बक्शी है उपरवाले ने ...वही घंटाघर चोराहे से गुजरने लगा तो पाया की , कहाँ था मैं चंदवा में , और कहाँ आ गया मैं राजस्थान में, और आया ही नहीं इसे मह्सुश भी कर रहा हूँ ...ये नेमत नहीं तो क्या है ...मैंने इबादत न करूँ तो क्या करूँ ..मैं खुश ना रहूँ तो क्या करूँ ...
और भी कई वजहें हो सकती है मेरे खुश रहने के , पर मुझे लगता है तुम्हे तुम्हारा उत्तर मिल गया होगा . ना मिला हो तो फिर पूछना ...मेरे मूड में आकर लिखने को 2 कप चाय और 2 ,3 घंटे का वक़्त चाहिए ....कम से कम मेरे ब्लॉग में एक पोस्ट तो बढेगा ..हा हा हा ...
i knew u very well sir.. and thats the life if u accept everything as it comes, besides it becomes the hell... so live either life or hell
ReplyDeletekeep smiling the best remedies of every disease :)