शुभ प्रभात सांचौर। शायद ये शब्द कहने मे मुझे १० दिन लग गए। थोडा वक़्त तो लगता है न किसी भी नए चीज़ को , नयी जगह को , नए परिवर्तन को स्वीकार करने में। और शायद ab main स्वीकार करने लगा हूँ सांचोर को, और अपनी प्यारी ब्रांच बिछावाड़ी को। हाँ खुश होने के लिए स्वीकार करना जरुरी है , और तब ही आप अपनी जिंदगी को सही चला सकते है क्यूनी आप न तो भूतकाल में जीते है और न ही भविष्य काल में, आपको जीना पड़ता है वर्तमान में , और आपको सिर्फ और सिर्फ अपने वर्तमान को बेहतर बनाना होता है..
25 th Sept, सुबह 10 बजे जब मैं निम्बहेरा से चला सांचौर । अपनी प्यारी बाइक पे मैं निकल पड़ा था अपनी मंजिल की तरफ, सांचोर , डोरिया चौराहा तक मैं शायद कांपता रहा, 15 km/ hour की स्पीड से मैं निकल रहा था , पर डोरिया से निकलते ही दिमाग में एक ही चीज़ वापस आई कि बस अब तो आगे की तरफ ही चलते जाना है। फिर उदयपुर , तेज बारिश में भींगता हुआ, फिर गोगुन्दा , स्वरूपगंज और अबू रोड , अबू रोड में चाय पी , और फिर आगे बढ़ चला सांचोर की तरफ , चम्बल की हरी भरी घाटी , फिर अरावली के पर्वत को छोड़ता हुआ मैं थार के , मारवाड़ के रेगिस्तानी इलाके में जा रहा था ! कहाँ हरे भरे खेत और कहाँ सिर्फ कीकर की झाड़ियाँ, शाम के 6.30 बजे मैं संचोरे पहुँच चूका था , और उसी होटल के कमरे से ye सब लिख रहा हूँ जहाँ मैं रुका। पुरे 8 घंटे का सफ़र बाइक पे मैंने पहली बार तय की, शायद mera पैर और पीठ भी पूरा दुखने लग गया था।
एक अजीब सा डर , मन को परेशां किये जा रहा था की पता नहीं जगह कैसा होगा , ब्रांच कैसी होगी, लोग कैसे होंगे। साँचोर मुख्य ब्रांच में भी मैं उसी दिन हो आया, लगा की जगह ठीक ठाक है तो सब कुछ सही ही होगा। अगली सुबह मैं अपनी ब्रांच के लिए चला , जहाँ शायद मेरे किस्मत के अगले 2 ya ३ साल लिखे जाने है ,26 की सुबह जब मैं बिछावाड़ी के लिए चला तो मैंने कुछ भी खाया नहीं था , एक कसबे की उम्मीद कर के मैं जा रहा था की वही कुछ खा लूँगा। पर जैसे जैसे मैं आगे बढ़ता गया मेरा दिल बैठता चला गया , एक छोटा सा देहाती, अर्ध रेगिस्तानी क़स्बा , और जब ब्रांच पहुंचा , मेरा दिल रोने को हो आया , लगा की कहाँ आ गया मैं , कहाँ मुझे फंसा दिया गया , फिर पीने को पानी भी नहीं , मेरा मन ,मेरा दिल, और मेरी इच्छा सब कुछ बैठता सा गया , दिन भर गला रुंधा सा रहा, ३, ४, लोगो से बात भी की , और sabne यही कहा की नए नए हो २,४ दिनों में सेट हो जाओगे फिर सब कुछ अच्छा लगने लगेगा , मौज करो तुम तो वहां पे , पर शायद मेरी उस दिन की मनः स्थिति को कोई समझ नहीं पा रहा था , लेकिन आज जब मैं यहाँ ९ दिन गुजर चूका हु , मुझे lagta है की सब सही थे यार, मेरा मन यहाँ लगना शुरू हो गया , लोग यहाँ अच्छे है , स्टाफ सपोर्टिव है और फालतू की मगजमारी नहीं है यार , आप आराम से ब्रांच यहाँ 5.30 तक बंद कर सकते हैं , बाकि का वक़्त तो आपका है। फिर मैंने यहाँ देखा की एजेंट्स का बोलबाला है , लेकिन ये सब भी बंद हो सकता है। एक सबसे अच्छे और बड़ी बात जो मुझे महसूस हुई ये की शायद मैं यहाँ जी सबसे निचला तबका है , सबसे गरीब और निरक्षर उनकी सेवा कर पाउँगा।
बस अब इतने दिन यहाँ गुजरने के बाद बहुत हल्का और फ्री महसूस कर रहा हूँ , २६थ की और आज के मनः स्थिति में अमूल चुल परिवर्तन हुआ है , और शायद एकदम ही परिवर्तित हो गया है। ब्रांच में लोकेश, प्रेम के साथ वैसा ही रिश्ता बन गया है जैसा शायद कृष्णा और प्रमोद के साथ था , और शायद इसी वजह से यहाँ अच्छा महसूस करना शुरू कर चूका हूँ , 20 किमी बाइक चला कर आने और जाने में थोड़ी परेशानी जरुर होती है , लेकिन ये थोड़े दिनों में एडजस्ट हो जायेगा। बस यही लिख कर सांचोर मैं तुम्हे नमस्कार करता हूँ की अगले कुछ दिन , जब तक मैं यहाँ हूँ , अच्छे गुजरे , खुशगवार गुजरे , बस और क्या , इतनी छोटी सी कामना तो मैं कर ही सकता हूँ न यार .
25 th Sept, सुबह 10 बजे जब मैं निम्बहेरा से चला सांचौर । अपनी प्यारी बाइक पे मैं निकल पड़ा था अपनी मंजिल की तरफ, सांचोर , डोरिया चौराहा तक मैं शायद कांपता रहा, 15 km/ hour की स्पीड से मैं निकल रहा था , पर डोरिया से निकलते ही दिमाग में एक ही चीज़ वापस आई कि बस अब तो आगे की तरफ ही चलते जाना है। फिर उदयपुर , तेज बारिश में भींगता हुआ, फिर गोगुन्दा , स्वरूपगंज और अबू रोड , अबू रोड में चाय पी , और फिर आगे बढ़ चला सांचोर की तरफ , चम्बल की हरी भरी घाटी , फिर अरावली के पर्वत को छोड़ता हुआ मैं थार के , मारवाड़ के रेगिस्तानी इलाके में जा रहा था ! कहाँ हरे भरे खेत और कहाँ सिर्फ कीकर की झाड़ियाँ, शाम के 6.30 बजे मैं संचोरे पहुँच चूका था , और उसी होटल के कमरे से ye सब लिख रहा हूँ जहाँ मैं रुका। पुरे 8 घंटे का सफ़र बाइक पे मैंने पहली बार तय की, शायद mera पैर और पीठ भी पूरा दुखने लग गया था।
एक अजीब सा डर , मन को परेशां किये जा रहा था की पता नहीं जगह कैसा होगा , ब्रांच कैसी होगी, लोग कैसे होंगे। साँचोर मुख्य ब्रांच में भी मैं उसी दिन हो आया, लगा की जगह ठीक ठाक है तो सब कुछ सही ही होगा। अगली सुबह मैं अपनी ब्रांच के लिए चला , जहाँ शायद मेरे किस्मत के अगले 2 ya ३ साल लिखे जाने है ,26 की सुबह जब मैं बिछावाड़ी के लिए चला तो मैंने कुछ भी खाया नहीं था , एक कसबे की उम्मीद कर के मैं जा रहा था की वही कुछ खा लूँगा। पर जैसे जैसे मैं आगे बढ़ता गया मेरा दिल बैठता चला गया , एक छोटा सा देहाती, अर्ध रेगिस्तानी क़स्बा , और जब ब्रांच पहुंचा , मेरा दिल रोने को हो आया , लगा की कहाँ आ गया मैं , कहाँ मुझे फंसा दिया गया , फिर पीने को पानी भी नहीं , मेरा मन ,मेरा दिल, और मेरी इच्छा सब कुछ बैठता सा गया , दिन भर गला रुंधा सा रहा, ३, ४, लोगो से बात भी की , और sabne यही कहा की नए नए हो २,४ दिनों में सेट हो जाओगे फिर सब कुछ अच्छा लगने लगेगा , मौज करो तुम तो वहां पे , पर शायद मेरी उस दिन की मनः स्थिति को कोई समझ नहीं पा रहा था , लेकिन आज जब मैं यहाँ ९ दिन गुजर चूका हु , मुझे lagta है की सब सही थे यार, मेरा मन यहाँ लगना शुरू हो गया , लोग यहाँ अच्छे है , स्टाफ सपोर्टिव है और फालतू की मगजमारी नहीं है यार , आप आराम से ब्रांच यहाँ 5.30 तक बंद कर सकते हैं , बाकि का वक़्त तो आपका है। फिर मैंने यहाँ देखा की एजेंट्स का बोलबाला है , लेकिन ये सब भी बंद हो सकता है। एक सबसे अच्छे और बड़ी बात जो मुझे महसूस हुई ये की शायद मैं यहाँ जी सबसे निचला तबका है , सबसे गरीब और निरक्षर उनकी सेवा कर पाउँगा।
बस अब इतने दिन यहाँ गुजरने के बाद बहुत हल्का और फ्री महसूस कर रहा हूँ , २६थ की और आज के मनः स्थिति में अमूल चुल परिवर्तन हुआ है , और शायद एकदम ही परिवर्तित हो गया है। ब्रांच में लोकेश, प्रेम के साथ वैसा ही रिश्ता बन गया है जैसा शायद कृष्णा और प्रमोद के साथ था , और शायद इसी वजह से यहाँ अच्छा महसूस करना शुरू कर चूका हूँ , 20 किमी बाइक चला कर आने और जाने में थोड़ी परेशानी जरुर होती है , लेकिन ये थोड़े दिनों में एडजस्ट हो जायेगा। बस यही लिख कर सांचोर मैं तुम्हे नमस्कार करता हूँ की अगले कुछ दिन , जब तक मैं यहाँ हूँ , अच्छे गुजरे , खुशगवार गुजरे , बस और क्या , इतनी छोटी सी कामना तो मैं कर ही सकता हूँ न यार .
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