Sunday, November 3, 2013

Prisoner of past

पिछला लेख लिखे करीब  महीने भर हो गए। यहाँ आये हुए महीने और 10 दिन हो गए। पता ही नहीं चलता ही के जिंदगी कैसे निकलती चली जाती है।  सब कुछ छूटता सा चला जाता है और जिंदगी अपनी मौज में आगे बढ़ती चली जाती है।  पीछे अगर कुछ छूटता है  तो  सिर्फ यादें।  कुछ बुरी यादें  फिर कुछ अच्छी यादें। हमेशा   से मेरी आदत रही है कि बुरी चीज़ों को और बुरी यादों को छोड़ कर आगे बढ़ता चला जाऊ।  पर शायद ये हो नहीं पाता , हम हमेशा prisoner of past बने रहते हैं , भुत के गुलाम और शायद हमेशा बने रहेंगे ,पुरानी चीज़ें और बुरी चीज़ें , पुरानी यादें और पुरानी बातें,कहीं न कहीं , कभी न कभी आपके वर्तमान को परेशां करती रही है और हमेशा से करती रहेंगी, हम भाग नहीं सकते और न ही भूल सकते है।

लेकिन हम ऐसे भी तो जिंदगी नहीं गुजार सकते न। सब कुछ जो गया बिता है आखिर वो हमारे वुजूद का हिस्सा होता है , आपके होने का सबब , the proof of your existence . anyway जिंदगी तो ऐसे ही यादों से बनती चली  जायेगी , कुछ नए लोग आपकी जिंदगी का हिस्सा बनते चले जायेंगे और कुछ पुराने लोग छूटते चले जायेंगे।

आज दीपावली है और सोच रहा हु कि शायद कितने सालो से दीपावली में अपने घर पर नहीं हूँ , गुस्सा आता है कि क्यों मैं ये जॉब कर रहा हूँ , घर से इतनी दूर के किसी त्यौहार में घर नहीं जा पाता , अकेला हूँ और ऐसा लग रहा है कि मुझे mummy -papa के पास घर में होना चाहिए , पर कुछ कर भी नहीं सकता न। सिवाए बोर होने के और गुस्सा होने के।  लेकिन इस से तो खुद का ही नुकसान करूँगा ना।

एक अच्छी चीज़ तो ये है कि अभी चुन्नी लाल सर आये थे और दीपावली अपने घर में मानाने का आमंत्रण दे गए , अच्छा लगा यार , इस अनजाने प्रदेश में जब कहीं से भी अपनेपन की थोड़ी सी बू आती है तो ऐसा लगता है जैसे पूरा संसार मिल गया हो। चलो कोई ना happy Dipawali  

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