अब तक तो इस खुशफहमी में जी रहा था कि शायद मैं खुशियां बांटता हूँ लेकिन पहली बार ये भी पता चला कि मैं खुशियों पर नज़र लगता हूँ। चलो जी कम से कम पता तो चला.
अपनी बात करू तो मुझे खुद ही पता नहीं चलता कि मेरी खुशियां पता नहीं कहा गायब हो गयी है। कब कि तमन्ना थी शिर्डी जाऊ , लेकिन कोई उत्सुकता नहीं। गोआ गया कोई भी ख़ुशी नहीं , मुम्बई सम्मी के पास ,कुछ भी नहीं। फिर पहली हवाई यात्रा, फिर भी कुछ भी ख़ुशी नहीं। पता नहीं क्या हो गया है मेरी खुशियों को , या तो साला सारी खुशियां ही ख़तम हो गयी हैं या फिर मैंने मह्सुश करना ही बंद कर दिया है.
आज भी अहमदाबाद से आते वक़्त पता ही नहीं कैसा मह्सुश करने लग गया , सांचोर पहुंचते ही लगा कि इस बियाबान बंजर में एकदम अकेला , एकदम तनहा सा। ऐसा तो पहले कभी मह्सुश नहीं किया। कुछ भी करने का , या किसी से बात भी करने का मन नहीं होता , एकदम नहीं , खाना बनाने या फिर खाने का भी मन नहीं करता। सच है यार एक शुद्ध निगेहबानी छीन गयी तो कितना बेतरतीब सा और कितना असुरक्षित सा मह्सुश करने लग गया हूँ मैं।
जो कुछ भी हो , सिर्फ और सिर्फ यही सोच रहा हु कि मैं कभी भी किसी कि भी खुशियों को नज़र नहीं लगा सकता , कभी भी नहीं , कभी नहीं चाहे मेरी खुशियां ख़तम ही क्यों ना हो जाये और चाहे क्यों न मैं कुछ भी मह्सुश करना ही बंद कर दूँ.
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