काश तुम्हे शब्दों में मैं बांध पाता, तुझे ढाल पाता। पर मुझे पता है तुम्हें शब्दों में कभी परिभाषित कर ही नहीं पाया और शायद ताउम्र नहीं कर पाउँगा। जिंदगी में कुछ चीज़े जरुर ऐसी होती है जिन्हे शब्दों की जरुरत होती ही नहीं, निःशब्द , और उनका निःशब्द होना ही बेहतर होता है। कभी वक़्त मिले तो शेखर की " शशी " को जरुर पढ़ना।।।
मैं सोचता था ,यदि ऐसा न होकर वैसा होता , और वैसा होता ,और वैसा होता ,तो ......पर आज सोचता हूँ कि नहीं ,आज लगभग मांग रहा हूँ कि यदि कुछ हो तो ऐसा ही हो , छाया ,हम -तुम भी ऐसे ही हो -अलग पर सदा एक दूसरे की ओर अग्रसर होने में सचेष्ट ,साधारण अभिधा में गैर पर वास्तव में अखंड विश्वास में बंधे , धमनी के एक .........कर्म में तुम हो , चिरंतन प्रेरणा -चिरंतन क्यूंकि मुक्त और -मोक्षदा .......अज्ञेय (शेखर एक जीवनी से )
मोक्षदा , ये शब्द शायद तुम्हे आकर देने की छोटी सी कोशिश होगी। हाँ शायद मोक्षदा ही हो तुम , जब जिंदगी की सतरंगी छटाओं में झूम रहा होता हूँ तो छोड़ देते हो मुझे मुक्त , निर्मुक्त। शायद ये अहसाश दिलाने के लिए कि मेरे लिए तुम कभी भी बंधन का रूप कभी नहीं बने। और जब जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तो में बेतरतीब हो रहा होता हूँ तो पता नहीं कहाँ से pop-up बन कर सामने आ जाते हो ," मैं हूँ न रे "। और इन शब्दों में मुझे जिंदगी जैसे वापस मिल जाती है। कोई शिकायत भी नहीं और न ही कोई उम्मीद । … No expectation n no demand".....पता नहीं किस मिटटी के बने हो तुम। लोग मुझे कहते है , जिंदगी को ऐसे गुजारने के लिए तुम ऊर्जा कहाँ से लाते हो। और मैं यही सवाल तुमसे पूछा करता हूँ , और तब पाता हूँ कि जिंदगी का हुनर तुमसे ही पाया है , सारी ऊर्जा वही से तो पाता हूँ। मोक्षदा.......मुझे याद आने लगता है कि कितनी बार जिंदगी में बिखरा हूँ मैं ,शीशे के टुकड़े की तरह चकनाचूर , और हर बार इन टूटे टुकड़ो को अपने ही हाथों से जमा किया है तुमने , संजोया है , और हर बार मैंने अपने हर टुकड़े से तुम्हारी हाथो को जख्मी किया है। मेरे टुकड़ो को जमा करने में तुम्हारी अंगुलिया खून से सरोबार हो जाती थी , फिर भी तुम रुके नहीं। हर बार मुझे ही चुनौती दी, चाहे जितनी बार बिखरना है बिखर , मैं यहीं हूँ , तुझे समेटने के लिए। और कोई शिकायत भी नहीं , कोई उम्मीद भी नहीं। तुम्हारा दोषी हुँ मैं और तुम मोक्षदा ........क्यों तुम भगवान बन रहे हो, एक बार सिर्फ एक बार तो शिकायत कर , जीतेन्द्र तेरे बिखरे टुकड़े मुझे दर्द पहुंचाते है , कम से कम मुझे तेरे इंसान होने का भरम तो हो। कभी कभी तो डर लगने लगता है कि कही तेरी इबादत करने ना लग जॉन मैं। और शायद इबादत भी कर लू तो भी तुम्हारी कोई चीज़ तुम्हे कभी वापस नहीं कर पाउँगा। शायद खून का एक बूंद भी नहीं जो तुमने मुझे समेटने में गिराए थे।
मोक्षदा .......तुम्हारा दोषी हूँ मैं , सज़ा दो मुझे।
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