एक बहुत ही खूबसूरत रचना पढ़ी , दुष्यंत कुमार की.........
मुझे लिखना ,
वह नदी जो बह रही थी इस ओर !
छिन्न करती चेतना के राख के स्तूप ,
क्या अब भी वहीं है ?
बह रही है ?
--या गई है सूख वह
पाकर समय की धुप ?
प्राण ! कौतुहल बड़ा है ,
मुझे लिखना ,
श्वास देकर खाद
परती कड़ी धरती चीर
वृक्ष जो हमने उगाया था नदी के तीर
क्या अब भी खड़ा है ?
- या बहाकर ले गयी उसको नदी की धार
अपने साथ , परली पर ?
कवि क्या पूछना चाहते हैं , शायद उन भावनाओ के बारे में , जो दो व्यक्तिओ के अंतर्मन से जुड़े होते हैं , बड़ी मुश्किल हालत में और बड़े झंझावातों से बचाकर उन भावनाओं को सींचा जाता है , लेकिन वक़्त की दहलीज पर सबकुछ सूखता चला जाता है , निर्जन और बंजर रेगिस्तान , और जब माज़ी को तौला जाता है तो बस यही पूछने को रह जाता है , क्या अब भी कुछ बचा है या वक़्त के साथ सब कुछ शून्य के साथ अन्तर्निहित हो गया है। सच है मानव जीवन बड़ा ही विचित्र है और अदभुत भी , पर जो भी है भाई साब , खूबसूरत है।
मुझे लिखना ,
वह नदी जो बह रही थी इस ओर !
छिन्न करती चेतना के राख के स्तूप ,
क्या अब भी वहीं है ?
बह रही है ?
--या गई है सूख वह
पाकर समय की धुप ?
प्राण ! कौतुहल बड़ा है ,
मुझे लिखना ,
श्वास देकर खाद
परती कड़ी धरती चीर
वृक्ष जो हमने उगाया था नदी के तीर
क्या अब भी खड़ा है ?
- या बहाकर ले गयी उसको नदी की धार
अपने साथ , परली पर ?
कवि क्या पूछना चाहते हैं , शायद उन भावनाओ के बारे में , जो दो व्यक्तिओ के अंतर्मन से जुड़े होते हैं , बड़ी मुश्किल हालत में और बड़े झंझावातों से बचाकर उन भावनाओं को सींचा जाता है , लेकिन वक़्त की दहलीज पर सबकुछ सूखता चला जाता है , निर्जन और बंजर रेगिस्तान , और जब माज़ी को तौला जाता है तो बस यही पूछने को रह जाता है , क्या अब भी कुछ बचा है या वक़्त के साथ सब कुछ शून्य के साथ अन्तर्निहित हो गया है। सच है मानव जीवन बड़ा ही विचित्र है और अदभुत भी , पर जो भी है भाई साब , खूबसूरत है।
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