Monday, August 18, 2014

अन्यमनस्क।

एक बार फिर से अन्यमनस्क सा महसूस करने लगा हूँ मैं।  पिछले कुछ दिनों की लगातार भागादौड़ी ने भी मुझे परेशान कर दिया है। पर जब तक जिंदगी है तब तक परेशानी साथ साथ ही लगी है।

  20 जून से लगातार ही घूम दौड़ रहा हुँ मैं। सांचोर से जोधपुर ,फिर दिल्ली ,पटना ,नालंदा ,राजगीर ,बोधगया और फिर चंदवा।  चंदवा से वापस सांचोर , सांचोर से जोधपुर , फिर वापस सांचोर ,और पिछले सप्ताह बीकानेर और पिछले 3 दिनों से मेरा माउंट आबू प्रवास। और अब एकदम थका सा महसूस कर रहा हु , फिर भी इस सप्ताहांत में मुझे जयपुर जाना है , जाना ही होगा ,मज़बूरी है। पर अब एकदम सोच रखा है अब इस साल के बाकी बचे महीनों में कहीं भी नहीं जाऊंगा।

कुछ और चीज़ें भी मुझे याद कर लेना चाहिए। घर में हुई 27 जुलाई की घटना ने मुझे एक नए तरह के डर से रूबरू कराया।  एक ऐसा डर जिसने मेरे खुद के होने के अहसास को ही झकझोर कर रख दिया। सच है डर  बहुत जरुरी है। एक वक़्त को तो ऐसा लगा जैसा कि मेरा सब कुछ ख़तम ,मेरा खुद का वुज़ूद भी। मेरी इतने सालों की मेहनत सिर्फ और सिर्फ बेमानी थी बाकि कुछ भी नहीं था। पर ये भी सच है कि कुछ चीज़ो को होने से आप रोक नहीं सकते ,वो अपनी नियति के के मुताबिक घटेंगी ही घटेंगी। बस अब आपको उनको स्वीकार कर के चलना है।

ऐसे सच नहीं है कि आपके साथ हमेशा बुरा ही होता है। अच्छा भी होता है। परसों की ही बात ले , रात के 10 बज रहे थे और साथ में रिमझिम बारिश , जब हम माउंट आबू पहुंचे थे , पूरा आबू ठसाठस भरा हुआ था ना तो हमें कोई होटल मिल रहा था और ना ही कोई मकान और हम जहाँ तहाँ भटक रहे थे कि कहाँ रात काटी जाये और अचानक अपना गेस्ट हाउस दिख गया , बिना बुकिंग के भी हमने निवेदन किया और हमे ठिकाना मिल गया। अकस्मात् ही शीश उस विधाता के आगे झुक जाते है। धन्यवाद और प्रार्थना साथ साथ ही गुंजायमान हो उठते हैं। और साथ ही  मन ये भी बोल उठता है कि कहीं न कहीं प्रारब्ध में कुछ पुण्य कर्म संचित तो जरूर हैं।  

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