पता नहीं कितने गिरहें अभी बाकी है। जिंदगी की कितनी परतें हैं और कितने गिरहें हैं ,पता ही नहीं चलता। और सारी गिरहें खोलना संभव ही नहीं है। आजकल तनहा होता हूँ और बेतरतीब सा भी , वक़्त भी ऐसे गुजर जाता है , कुछ पता ही नहीं चलता , अपने आप को busy रखना सीख रहा हूँ। सच है की खाली वक़्त में बुरी यादें तो परेशान करती है , अच्छी यादें भी कम नहीं।
खैर हर गुजरते पल के साथ जिंदगी का एक कतरा गुजर जाता है। हम जिन लम्हों के इन्तेजार में बरसों से खड़े होते हैं वो , इन्ही लम्हों में चुपचाप सा गुजर जाता है। तो बस सीखता हूँ , जिंदगी जीने की कला,लम्हों में जीने की कला और इन्हीं लम्हों में खुश रहने की कला।
जिनसे कुछ लिया उन्हें कुछ दे पौन पाऊं , किन्हीं के मुस्कुराने की वजह बन पाउ या बना पाऊं , उससे बड़ी इबादत क्या होगी।
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