Monday, November 28, 2011

रेगिस्तान की रेत

कभी कभी मैं सोचता हूँ कि मैं कहाँ आ गया , और कहाँ जा रहा हूँ , न तो कोई मंजिल है और न ही कोई रास्ता, बस जीना है तो जिए जारहाहूँ, क्या यही होताहै जिंदगी का मतलब , सोचता हूँ नहीं ऐसा तो कभी नहीं,फिर मैं क्यों हूँ , क्यों हूँ मैं यहाँ , और क्या कर रहा हूँ, बैंक कि जिंदगी एकदम से नीरस होता जा रहा है, रेगिस्तान में पड़ी रेत कि तरह अपनी जिंदगी भी खुरदुरी होती जा रही है, पता नहीं मैं कहाँ पहुचुन्गा, शायद कहीं भी नहीं......पढाई भी अब नहीं कर पता और व्यावासिक जिंदगी मैं कहीं भी सुकून नहीं है , थोड़ी बहुत रुखाई मेरे व्यवहार में भी झलकना शुरू हो गया है, मैं खुद बदलता जा रहा हूँ शनैः शनैः , जो कि मुझे भी पता नहीं चल प् रहा है , हर किसी से झगड़ पड़ता हूँ , मन में थोड़ी सी भी शांति नहीं है , लगता है मैं धीरे धीरे घमंडी भी होता जा रहाहूँ, ऐसा परिवर्तन मुझे लगता है मेरे कार्यक्षेत्र की वजह से हो रहा है , हर सेकंड एक ऐसा बंद आता है जिसे अपनी परेशानी होती है और हर किसी के साथ मैं एक सा नहीं हो सकता , निम्बहेरा में ऐसा ये भी लगता है की यहाँ जायदा झगडे वाले लोग ही रहते हैं , अब मैं घर में भी ऐसे ही बात करने लगा हूँ जैसे मैं बहुत खिझा हुआ हूँ , हाँ बहुत खिझा हुआ , जबकि मुझे ऐसा नहीं होना चाहिए , मैं स्वार्थी भी होता जा रहा हूँ , पल पल जबकि पहले मैं ऐसा नहीं हुआ करता था, इस बदलाव को मैं रोकना चाहता हूँ , प्रभु प्लस मेरी मदद करो , मैंने हमेशा से ही विनती की है , की मैं कहीं पे भी रहूँ , मेरे पांव हमेशा जमीं पे ही होने चाहिए , और कभी भी घमंड मुझे छु न पाए , पर मुझे लगता है की मेरी विनती में कहीं चुक हो रही है , कुछ छुट ता सा लगता है ......

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