Tuesday, April 27, 2021

निष्पृह

बहुत दिन हो गए और बहुत कुछ जीवन प्रवाह बह चूका। कुछ लिखा नहीं मैंने , वैसे लिखने को कुछ था भी नहीं। जीवन में जब तारतम्यता न हो तो वैसे ही मन निष्पृह हो जाता है। इच्छारहित। 

 

2 साल हुए शादी को , और नन्हा मुन्ना बाबू भी धरती पे आ चूका। याद करता हूँ , सितम्बर का महीना जो बहुत भयावह था। सोचता था लिखूंगा उस अनुभव को पर शायद अब तक मूड न बन पाने की वजह से लिख नहीं पाया। अब चूँकि अपने पास करने को कुछ हैं नहीं तो सोचता हूँ अपने अनुभव को ही शब्द रूप दूँ। 

बहुत दुःख होता है कि मैं एक ऐसी संस्था में काम कर रहा हूँ जिसने हमेशा मुझे पीड़ा ही दी है। हमेशा से , और लगभग तब से जब से मैं यहाँ आया , तबसे इसे छोड़ने का यत्र तत्र परयत्न कर रहा हूँ ,लेकिन किस्मत और भाग्य दोनों को यह मंजूर नहीं है। लगभग 12 साल हो आये , यहीं घुटता हूँ , पिसता हूँ , लेकिन छोड़ नहीं पता। कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है मेरे पास। 

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