Thursday, September 25, 2014

oh yes 26th Sept....one year gone...

Yup...This is the day when I joined bichawadi branch ,year ago.......A day before left Nimbahera to join this place..I was just counting..oh One month gone, three months gone and now A year...सच कहा गया है भाई , वक़्त कहाँ किसी के लिए रुकता है। … चूक जाते है तो बस हम।  सबकुछ गुजरता चला जाता है और हमे कुछ पता ही नहीं चलता।  जिंदगी ऐसी ही चलती है।

याद तो रह जाते है कुछ नमूने।  कभी जन्मदिन के बहाने तो कभी किसी बिखरे हुए पन्ने में कोई टूटा गुलाब का पत्ता हमे हमे बहुत कुछ याद दिला जाता है।  सच है यार एक साल पहले ,ठीक इसी दिन जब मैं निम्बाहेड़ा छोड़ आया था तो कभी ये ना सोचा था कि मैं इस कदर सांचोर से प्यार करने लगूंगा। पर प्यार तो मुझे हर उस जगह से हो ही जाता है जहाँ मुझे रहना होता है , पहले बारां फिर दिल्ली ,फिर भीलवाड़ा , निम्बाहेड़ा और अब सांचोर। 

हमेशा कहा करता हूँ , जहाँ जितना वक़्त अच्छा गुजर जाये, गुजार  लो , फिर पता नहीं क्या हो। अब यहाँ अच्छा वक़्त जितना गुजर जाये उतना बढ़िया।

ओह, प्यार से मुहब्बत शब्द भी याद हो आया।  वाहियात शब्द है। पर जो भी हो आजकल तो ऐसा लगता है जैसे मोहब्बत का एक जमाना गुजर गया।  हाँ जी गुजरते गुजरते तो सब कुछ ही गुजर,बिखर जाता है।  न तो जिंदगी में कोई कशिश है और न ही कोई खलिश। वक़्त के साथ अब तो ऐसा लगता है हम भी दराज़ हो रहे है।
कभी कभी जब मैं field में जाता हूँ तो रेगिस्तान के किसी धोरे पे अचानक ठिठक कर खड़ा हो जाता हूँ। निर्विकार ,निर्मोही।  यहाँ का एकाकी,अकेलापन , सूनापन अपना सा लगता है।  कभी कोई आवाज़ आती है दूर से ,किसी के गीतों की।  लोकगीतों की।  तो मैं समझ नहीं पाता , पूछता हूँ तो पता चलता है रेगिस्तानी निर्जीव जीवन में इन्ही लोकगीतों ने रंग भरा है। जिंदगी के विरानेपन को , तन्हाई को शब्दों में रंगा है।   हुह , ये रेगिस्तान , ये तन्हाई और ये रंग।  इस वीरानी जिंदगी में रंग वक़्त के साथ मज़ाक सा लगता है।

इन्ही रंगो को जब तौलता हूँ तो अचानक लगने लगता है वास्तव में जिंदगी खूबसूरत है। दूर दूर रेगिस्तान के टीले ,अपने आप को बचाये रखने की जद में जिंदगी और इसी जद्दोजहद में गीतों का रंग. जीवन का रंग। विरह की ना खत्म होने वाले पल और उन्ही पलो की वीरानी। माशा अल्लाह , अब तो ये रंग और ये गीत मेरे वजूद का हिस्सा है.। वो कहा करता था न मैं …………" तेरे बिना क्या वजूद मेरा "
और भी कहीं सुना था इन रेगिस्तानों में पहले कहीं नखलिस्तान हुआ करता था। सबके अपने रंग थे। बहारें थी। … ठीक अपनी तरह। …। हा हा हा।
हाँ जी मुकद्दर का भी अपना खेल होता है। अब ना तो किसी के फ़ोन आने का टेंशन होता है और ना ही किसी को फ़ोन करने का।  डर भी लगने लग जाता है किसी अशुभ की या किसी अपशगुन की। 27 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। अजीब तरह का टेंशन मुक्त रहने लग लगा हूँ और अकेला मस्त। पर शायद असुरक्षित भी। हाँ मैं हर वक़्त अपने आपको असुरक्षित मह्सुश करने लग गया हूँ …………………………………………बिन तेरे वास्तव में असुरक्षित हूँ मैं , मैं क्या मेरा पूरा वजूद भी । पर आदत तो डालनी पड़ती है। कहते है न किसी को इतना भी दूर मत करो की वो हमेशा के लिए दूर हो जाये …………………………………………आमीन।  












Saturday, September 20, 2014

Aloof, alone and isolated...

Once again started to feel isolated, alone aloof and abandoned.Yup and that's for true.How long you hold you emotions... month or more...it's almost a year...feeling lyk abandoned ...somewhere in this cruel world.....there is no one to tell me that i needed to tell them the sound of my room's lock..so that they may assure that m home...m safe n m good...I know life moves on that it must...but alas m human ...i can feel, i can cry ......have a heart ....having always in conflict with my brain ......

   May be I was not good, never was....got punished for my deeds...or may be the मेरे प्रारब्ध का फल ....may be....I don't know ..how bad i was in my previous birth ....so what..m paying my karma....being punished or being isolated ...may cut my कर्म फल....
   what I started to do...i started to be a runaway ...yes exactly this is the best word...m a runaway...मैं भाग रहा हूँ , खुद से और खुद के होने से। i miss my whole days....when i was missed n now m abandoned...abandoned..abandoned....

Thursday, September 4, 2014

गिरहें ....

पता नहीं कितने गिरहें अभी बाकी है। जिंदगी की कितनी परतें हैं और कितने गिरहें हैं ,पता ही नहीं चलता। और सारी गिरहें खोलना संभव ही नहीं है। आजकल तनहा होता हूँ और बेतरतीब सा भी , वक़्त भी ऐसे गुजर जाता है , कुछ पता ही नहीं चलता , अपने आप को busy रखना सीख रहा हूँ।  सच है की खाली वक़्त में बुरी यादें तो परेशान करती है , अच्छी यादें भी कम नहीं। 
   खैर हर गुजरते पल के साथ जिंदगी का एक कतरा गुजर जाता है।  हम जिन लम्हों के इन्तेजार में बरसों से खड़े होते हैं वो , इन्ही लम्हों में चुपचाप सा गुजर जाता है। तो बस सीखता हूँ , जिंदगी जीने की कला,लम्हों में जीने की कला और इन्हीं लम्हों में खुश रहने की कला। 
    जिनसे कुछ लिया उन्हें कुछ दे पौन पाऊं , किन्हीं के मुस्कुराने की वजह बन पाउ या बना पाऊं , उससे बड़ी इबादत क्या होगी। 

निष्पृह