Thursday, December 25, 2014

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया ……

बेगम अख्तर को सुनिए ,
सच कहता हूँ , जब आप एकदम अकेले होंगे , तो आपको ये एक पूरी  दुनिया बख्सता है

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया ……
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

यु तो  हर शाम उम्मीदों  गुजर जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया



Sunday, December 21, 2014

सपने .....

किसी ने सही कहा है ,सपने वो नहीं होते जो आप सोकर देखते हो।
सपने तो वो होते है जो आपको सोने नहीं देते। ..

एक नयी शुरुआत करनी है अब
फिरसे अपने सपने के लिए 

Tuesday, October 7, 2014

एक बहुत बुरा सपना।

आज रात करीब 1.30 मेरी नींद खुल गयी , क्यूंकि मैं एक बहुत बुरा सपना देख रहा था। मैं अचानक से काफी डर गया और काफी देर तक मैं उसी सपने के बारे में सोचने लगा। एक खूबसूरत लड़की,मेरी मंझली बहन , बैंक का कोई अधिकारी और वो 2 लोग जो बाद में दैत्य बन गए थे। फिर जब नींद नहीं आ रही थी तो मैं टीवी खोलकर कुंगफू पांडा देखने लग गया और फिर वापस करीब 3 बजे के आस पास मुझे नींद आई

सुबह जब मैं जागा तो मेरा सर दुखने लगा था ,शायद मैं ये सोच कर भी डरा की पता नहीं इस सपने का क्या मतलब है ,पता नहीं क्या सूचित कर रहा है ये सपना। या   पता नहीं कोई रूह पास से होकर गुजर गया हो। अभी interpretation of dreams पढ़ रहा था। ये धोखे की सम्भावना व्यक्त कर रहा है ,मुझे सावधान रहना है। 

Saturday, October 4, 2014

Oh, won't you stay with me? Cause you're all I need

Oh Beautiful song....

Oh, won't you stay with me?
Cause you're all I need

http://www.youtube.com/watch?v=pB-5XG-DbAA

Thursday, September 25, 2014

oh yes 26th Sept....one year gone...

Yup...This is the day when I joined bichawadi branch ,year ago.......A day before left Nimbahera to join this place..I was just counting..oh One month gone, three months gone and now A year...सच कहा गया है भाई , वक़्त कहाँ किसी के लिए रुकता है। … चूक जाते है तो बस हम।  सबकुछ गुजरता चला जाता है और हमे कुछ पता ही नहीं चलता।  जिंदगी ऐसी ही चलती है।

याद तो रह जाते है कुछ नमूने।  कभी जन्मदिन के बहाने तो कभी किसी बिखरे हुए पन्ने में कोई टूटा गुलाब का पत्ता हमे हमे बहुत कुछ याद दिला जाता है।  सच है यार एक साल पहले ,ठीक इसी दिन जब मैं निम्बाहेड़ा छोड़ आया था तो कभी ये ना सोचा था कि मैं इस कदर सांचोर से प्यार करने लगूंगा। पर प्यार तो मुझे हर उस जगह से हो ही जाता है जहाँ मुझे रहना होता है , पहले बारां फिर दिल्ली ,फिर भीलवाड़ा , निम्बाहेड़ा और अब सांचोर। 

हमेशा कहा करता हूँ , जहाँ जितना वक़्त अच्छा गुजर जाये, गुजार  लो , फिर पता नहीं क्या हो। अब यहाँ अच्छा वक़्त जितना गुजर जाये उतना बढ़िया।

ओह, प्यार से मुहब्बत शब्द भी याद हो आया।  वाहियात शब्द है। पर जो भी हो आजकल तो ऐसा लगता है जैसे मोहब्बत का एक जमाना गुजर गया।  हाँ जी गुजरते गुजरते तो सब कुछ ही गुजर,बिखर जाता है।  न तो जिंदगी में कोई कशिश है और न ही कोई खलिश। वक़्त के साथ अब तो ऐसा लगता है हम भी दराज़ हो रहे है।
कभी कभी जब मैं field में जाता हूँ तो रेगिस्तान के किसी धोरे पे अचानक ठिठक कर खड़ा हो जाता हूँ। निर्विकार ,निर्मोही।  यहाँ का एकाकी,अकेलापन , सूनापन अपना सा लगता है।  कभी कोई आवाज़ आती है दूर से ,किसी के गीतों की।  लोकगीतों की।  तो मैं समझ नहीं पाता , पूछता हूँ तो पता चलता है रेगिस्तानी निर्जीव जीवन में इन्ही लोकगीतों ने रंग भरा है। जिंदगी के विरानेपन को , तन्हाई को शब्दों में रंगा है।   हुह , ये रेगिस्तान , ये तन्हाई और ये रंग।  इस वीरानी जिंदगी में रंग वक़्त के साथ मज़ाक सा लगता है।

इन्ही रंगो को जब तौलता हूँ तो अचानक लगने लगता है वास्तव में जिंदगी खूबसूरत है। दूर दूर रेगिस्तान के टीले ,अपने आप को बचाये रखने की जद में जिंदगी और इसी जद्दोजहद में गीतों का रंग. जीवन का रंग। विरह की ना खत्म होने वाले पल और उन्ही पलो की वीरानी। माशा अल्लाह , अब तो ये रंग और ये गीत मेरे वजूद का हिस्सा है.। वो कहा करता था न मैं …………" तेरे बिना क्या वजूद मेरा "
और भी कहीं सुना था इन रेगिस्तानों में पहले कहीं नखलिस्तान हुआ करता था। सबके अपने रंग थे। बहारें थी। … ठीक अपनी तरह। …। हा हा हा।
हाँ जी मुकद्दर का भी अपना खेल होता है। अब ना तो किसी के फ़ोन आने का टेंशन होता है और ना ही किसी को फ़ोन करने का।  डर भी लगने लग जाता है किसी अशुभ की या किसी अपशगुन की। 27 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। अजीब तरह का टेंशन मुक्त रहने लग लगा हूँ और अकेला मस्त। पर शायद असुरक्षित भी। हाँ मैं हर वक़्त अपने आपको असुरक्षित मह्सुश करने लग गया हूँ …………………………………………बिन तेरे वास्तव में असुरक्षित हूँ मैं , मैं क्या मेरा पूरा वजूद भी । पर आदत तो डालनी पड़ती है। कहते है न किसी को इतना भी दूर मत करो की वो हमेशा के लिए दूर हो जाये …………………………………………आमीन।  












Saturday, September 20, 2014

Aloof, alone and isolated...

Once again started to feel isolated, alone aloof and abandoned.Yup and that's for true.How long you hold you emotions... month or more...it's almost a year...feeling lyk abandoned ...somewhere in this cruel world.....there is no one to tell me that i needed to tell them the sound of my room's lock..so that they may assure that m home...m safe n m good...I know life moves on that it must...but alas m human ...i can feel, i can cry ......have a heart ....having always in conflict with my brain ......

   May be I was not good, never was....got punished for my deeds...or may be the मेरे प्रारब्ध का फल ....may be....I don't know ..how bad i was in my previous birth ....so what..m paying my karma....being punished or being isolated ...may cut my कर्म फल....
   what I started to do...i started to be a runaway ...yes exactly this is the best word...m a runaway...मैं भाग रहा हूँ , खुद से और खुद के होने से। i miss my whole days....when i was missed n now m abandoned...abandoned..abandoned....

Thursday, September 4, 2014

गिरहें ....

पता नहीं कितने गिरहें अभी बाकी है। जिंदगी की कितनी परतें हैं और कितने गिरहें हैं ,पता ही नहीं चलता। और सारी गिरहें खोलना संभव ही नहीं है। आजकल तनहा होता हूँ और बेतरतीब सा भी , वक़्त भी ऐसे गुजर जाता है , कुछ पता ही नहीं चलता , अपने आप को busy रखना सीख रहा हूँ।  सच है की खाली वक़्त में बुरी यादें तो परेशान करती है , अच्छी यादें भी कम नहीं। 
   खैर हर गुजरते पल के साथ जिंदगी का एक कतरा गुजर जाता है।  हम जिन लम्हों के इन्तेजार में बरसों से खड़े होते हैं वो , इन्ही लम्हों में चुपचाप सा गुजर जाता है। तो बस सीखता हूँ , जिंदगी जीने की कला,लम्हों में जीने की कला और इन्हीं लम्हों में खुश रहने की कला। 
    जिनसे कुछ लिया उन्हें कुछ दे पौन पाऊं , किन्हीं के मुस्कुराने की वजह बन पाउ या बना पाऊं , उससे बड़ी इबादत क्या होगी। 

Monday, August 18, 2014

अन्यमनस्क।

एक बार फिर से अन्यमनस्क सा महसूस करने लगा हूँ मैं।  पिछले कुछ दिनों की लगातार भागादौड़ी ने भी मुझे परेशान कर दिया है। पर जब तक जिंदगी है तब तक परेशानी साथ साथ ही लगी है।

  20 जून से लगातार ही घूम दौड़ रहा हुँ मैं। सांचोर से जोधपुर ,फिर दिल्ली ,पटना ,नालंदा ,राजगीर ,बोधगया और फिर चंदवा।  चंदवा से वापस सांचोर , सांचोर से जोधपुर , फिर वापस सांचोर ,और पिछले सप्ताह बीकानेर और पिछले 3 दिनों से मेरा माउंट आबू प्रवास। और अब एकदम थका सा महसूस कर रहा हु , फिर भी इस सप्ताहांत में मुझे जयपुर जाना है , जाना ही होगा ,मज़बूरी है। पर अब एकदम सोच रखा है अब इस साल के बाकी बचे महीनों में कहीं भी नहीं जाऊंगा।

कुछ और चीज़ें भी मुझे याद कर लेना चाहिए। घर में हुई 27 जुलाई की घटना ने मुझे एक नए तरह के डर से रूबरू कराया।  एक ऐसा डर जिसने मेरे खुद के होने के अहसास को ही झकझोर कर रख दिया। सच है डर  बहुत जरुरी है। एक वक़्त को तो ऐसा लगा जैसा कि मेरा सब कुछ ख़तम ,मेरा खुद का वुज़ूद भी। मेरी इतने सालों की मेहनत सिर्फ और सिर्फ बेमानी थी बाकि कुछ भी नहीं था। पर ये भी सच है कि कुछ चीज़ो को होने से आप रोक नहीं सकते ,वो अपनी नियति के के मुताबिक घटेंगी ही घटेंगी। बस अब आपको उनको स्वीकार कर के चलना है।

ऐसे सच नहीं है कि आपके साथ हमेशा बुरा ही होता है। अच्छा भी होता है। परसों की ही बात ले , रात के 10 बज रहे थे और साथ में रिमझिम बारिश , जब हम माउंट आबू पहुंचे थे , पूरा आबू ठसाठस भरा हुआ था ना तो हमें कोई होटल मिल रहा था और ना ही कोई मकान और हम जहाँ तहाँ भटक रहे थे कि कहाँ रात काटी जाये और अचानक अपना गेस्ट हाउस दिख गया , बिना बुकिंग के भी हमने निवेदन किया और हमे ठिकाना मिल गया। अकस्मात् ही शीश उस विधाता के आगे झुक जाते है। धन्यवाद और प्रार्थना साथ साथ ही गुंजायमान हो उठते हैं। और साथ ही  मन ये भी बोल उठता है कि कहीं न कहीं प्रारब्ध में कुछ पुण्य कर्म संचित तो जरूर हैं।  

Sunday, July 13, 2014

Nothing

Sometimes i feel tat m not happy nor m i sad. What i feel, nothing. nothing like just nothing,  a hollow. It's almost impossible to explain. Just sitting in a corner of my dark room and wondering, why m i here.why m doing all these. Why m i not able to keep myself busy .
  This all hush hush of branch and banking.freaking , I just wanted to quit. 
Why m I so afraid ?I remember in my whole life I always used to be afraid. afraid of something or may be anything. I want to be free , want to be out of this freaking word..."being afraid"...........

Thursday, July 3, 2014

Just me :)

Sometime I think what I expect , Why I wonder here n there without any purpose ...i spend whole night just awake n what I expect, I travel 600 kms without a break , what is my expectations?I sit in a corner in loud sound without getting noticed , inside alone and may be outside?Why I punish myself? or m i selfish?Oh what I expect? May be nothing, or may be a smile back :) ...so that i could feel rejuvenated , or to feel that m "Alive" .. being alive is more important than anything. Isn't It?

Anyway faces change, lives change and what ?life moves on with some memories cherished for ever..for ever...I always use to say this human life is just made of emotions and feeling , nothing else. You can't judge a thing with your profit and loses. It's all about emotions...and most importantly, what You show. You let them to come out or you make them to die inside you.....I assume second is the best....Suffer ! and when you suffer , suffer joyfully.Suffering brings out best of you.Your best human face.best human emotions...Love , affection, sympathy , joy ,pity, everything comes with a suffering...

And when u suffer, n suffer joyfully...life brings colors...and that makes life b'ful, colorful.So waht , m enjoying my colorful life n b'ful life...:)  

Just a closing note...Keep always smiling :) make people happy who are around you. Make the world b'ful and colorful........

Stop somewhere in your regular moving life, Love someone like hell, cherish the memories for ever, share the dreamz, feel all those good emotions , bring best of you and then what, Move forward with all those memories cherished for ever.......move forward...move forward.....that's the life my small little boy...move forward :)

Life if beautiful and it always will be ....

Saturday, June 7, 2014

Change..

We are always afraid of change, it may be translated in change in your professional front or may be in your personal....the fear...we have to overcome...we must accept the changes which comes in the way of life...may be a change can change ur life 4 forever..

Saturday, April 26, 2014

घर

घर , एक साल  हो गये , पिछले साल इसी टाइम भैया क़ी शादी मे गया था , वक़्त का तो जैसे पाता ही नहीं चालता , मानों पर लगा कर उङ रहा हो।  जनवरी की उथल पुथल के समय से ही घर जाने का सोच रहा था , जो अब सम्भव हुआ है , ट्रांसफर के बाद पहली बार घर जा रहा हूँ।  कुछ पल अपनी जिंदगी के पुरसुकून निकालने। 

Saturday, April 19, 2014

मुझे लिखना।

 एक बहुत ही खूबसूरत रचना पढ़ी , दुष्यंत कुमार की.........

मुझे लिखना ,
वह नदी जो बह रही थी इस ओर !
छिन्न करती चेतना के राख के स्तूप ,
क्या अब भी वहीं है ?
बह  रही है ?
--या गई है सूख वह
पाकर समय की धुप ?
प्राण ! कौतुहल बड़ा है ,
मुझे लिखना ,
श्वास देकर खाद
परती कड़ी धरती चीर
वृक्ष जो हमने  उगाया था नदी के तीर
क्या अब भी खड़ा है ?
- या बहाकर ले गयी उसको नदी की धार
अपने साथ , परली पर ?

कवि क्या पूछना चाहते हैं , शायद उन भावनाओ के बारे में , जो दो व्यक्तिओ के अंतर्मन से जुड़े होते हैं , बड़ी मुश्किल हालत में और बड़े झंझावातों से बचाकर उन भावनाओं को सींचा जाता है , लेकिन वक़्त की दहलीज पर सबकुछ सूखता चला जाता है , निर्जन और बंजर रेगिस्तान , और जब माज़ी को तौला जाता है तो बस यही पूछने को रह जाता है , क्या अब भी कुछ बचा है  या वक़्त के साथ सब कुछ शून्य के साथ अन्तर्निहित हो गया है।  सच है मानव जीवन बड़ा ही विचित्र है और अदभुत भी , पर जो भी है भाई साब , खूबसूरत है। 

Tuesday, April 15, 2014

गुमनाम है कोई , बदनाम है कोई.

20 साल बाद , हाँ यही नाम है ,बहुत पुरानी थ्रिलर है ,
और पता नहीं कितनी बार  सुन रखा है इस song को ,
रेडियो के गीतमाला में या फिर 10.30  के छायागीत प्रोग्राम में ,
और जितनी  बार सुनता हूँ  नया  ही होता है ,कभी पुराना  नहीं होता।
सच है रेडियो मेरी जिंदगी का हिस्सा रहा है और सदा रहेगा।                                                              
और जब जब मेरे जेहन में ये गीत गूंजता है, मुझे हमेशा जीने का एक नया सबक मिल जाता है.
और शायद जिंदगी की असलियत बयां कर जाता है :-                                                                                                                                                               
 गुमनाम है कोई , बदनाम है कोई, किसको खबर कौन  है वो ,अनजान है कोई......
किसको समझें हम अपना ,कल का नाम है एक सपना
आज अगर तुम जिन्दा हो , तो कल के लिए.....
कल के लिए माला जपना .......

पल दो पल की मस्ती है ,बस दो दिन की बस्ती है..
चैन  यहाँ पर महंगा है और मौत यहाँ .....
और मौत यहाँ पर सस्ती है ....

कौन बला तूफानी है , मौत को खुद हैरानी है ,
आये सदा विरानो से , जो पैदा हुआ
जो पैदा हुआ वो फ़ानी है .....
( फ़ानी -नश्वर )

Monday, March 31, 2014

Wednesday, March 26, 2014

6 महीने पूरे हुए सांचौर में

6 महीने पूरे हुए सांचौर में , पता ही नहीं  चला कि कैसे वक़्त निकल गया। 26 सितम्बर से कब 26 मार्च हो गया।  सच कहा गया है जिंदगी कभी रूकती नहीं , अनवरत चलती रहती है। चूक जाते हैं तो बस हम।  कभी खुद  पहचानने में या फिर या फिर कभी दुसरो को पहचानने में। देखते देखते पूरी जिंदगी ऐसे ही निकल जाती है।  बस खुद के लिए कुछ अच्छे पल निकाल लो या फिर कुछ अच्छे , बेहतरीन पल बुन लो। इन बेहतरीन पलों से ही तो जिंदगी बनती है , बाकी तो क्या है , जिंदगी ऐसे भी चलती रही है और वैसे भी चलती रहेगी।

 छोड़ो सनम काहे का गम , हँसते रहो , खिलते रहो।
मिट जायेगा सारा ग़िला , हमसे गले मिलते रहो :)

Saturday, March 22, 2014

Too lonely...

Sometimes I started to feel too lonely....too lonely...then what should i do..just listen songs...

In the darkest night hour..
I'll search through the crowd..
Your face is all that I see..
I'll give you everything..
baby love me lights out...
love me like XO...

Monday, March 10, 2014

बहुत बुरा हूँ मैं। ..

कभी कभी  मुझे अपने बहुत बुरे होने का अहसाश होता है , जब आप जब किसी का दिल दुखाते हो , वो भी जान बुझ कर। पर शायद जब आप किसी का दिल दुखाते तो सबसे जयादा तकलीफ खुद को ही होती है ,क्यूंकि तब तन्हाई में आपके अँधेरे कमरे का एक कोना आपके आंसुओ से भी सींची जाती है। ।लेकिन जिंदगी ऐसे ही चलती रहती है। .. It has been well said na ...Sometimes it good to be bad ...

Saturday, February 15, 2014

16 फ़रवरी।

 जिंदगी में वापस ये 16 फ़रवरी।  8 साल। .

Monday, February 3, 2014

तुम.....

काश तुम्हे शब्दों में मैं बांध पाता, तुझे ढाल पाता।  पर मुझे पता है तुम्हें शब्दों में कभी परिभाषित कर ही नहीं पाया और शायद ताउम्र नहीं कर पाउँगा। जिंदगी में कुछ चीज़े जरुर ऐसी होती है जिन्हे शब्दों की जरुरत होती ही नहीं, निःशब्द , और उनका निःशब्द होना ही बेहतर होता है। कभी वक़्त मिले तो शेखर की " शशी " को जरुर पढ़ना।।।

  मैं सोचता था ,यदि ऐसा न होकर वैसा होता , और वैसा होता ,और वैसा होता ,तो ......पर आज सोचता हूँ कि नहीं ,आज लगभग मांग रहा हूँ कि यदि कुछ हो तो ऐसा ही हो , छाया ,हम -तुम भी ऐसे ही हो -अलग पर सदा एक दूसरे की ओर अग्रसर होने में सचेष्ट ,साधारण अभिधा में गैर पर वास्तव में अखंड विश्वास में बंधे , धमनी के एक .........कर्म में तुम हो , चिरंतन प्रेरणा -चिरंतन क्यूंकि मुक्त और -मोक्षदा .......अज्ञेय (शेखर एक जीवनी से )

मोक्षदा , ये शब्द शायद तुम्हे आकर देने की छोटी सी कोशिश होगी।  हाँ शायद मोक्षदा ही हो तुम , जब जिंदगी की सतरंगी छटाओं में झूम रहा होता हूँ तो छोड़ देते हो मुझे मुक्त , निर्मुक्त। शायद ये अहसाश दिलाने के लिए कि मेरे लिए तुम कभी भी बंधन का रूप कभी नहीं बने। और जब जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तो में बेतरतीब हो रहा होता हूँ तो पता नहीं कहाँ से pop-up बन कर सामने आ जाते हो ," मैं हूँ न रे "। और इन शब्दों  में मुझे  जिंदगी जैसे वापस मिल जाती है। कोई शिकायत भी नहीं और न ही कोई उम्मीद । … No expectation n no demand".....पता नहीं किस मिटटी के बने हो तुम।  लोग मुझे कहते है , जिंदगी को ऐसे गुजारने के लिए तुम ऊर्जा  कहाँ से लाते हो।  और मैं यही सवाल तुमसे पूछा करता हूँ ,  और तब पाता  हूँ कि जिंदगी का हुनर तुमसे ही पाया है , सारी ऊर्जा वही से तो पाता हूँ।  मोक्षदा.......मुझे याद आने लगता है कि कितनी बार जिंदगी में बिखरा हूँ मैं ,शीशे के टुकड़े की तरह चकनाचूर , और हर बार इन टूटे टुकड़ो को अपने ही हाथों से जमा किया है तुमने , संजोया है , और हर बार मैंने अपने हर टुकड़े से  तुम्हारी हाथो को जख्मी किया है। मेरे टुकड़ो को जमा करने में तुम्हारी अंगुलिया खून से सरोबार हो जाती थी , फिर भी तुम रुके नहीं।  हर बार मुझे ही चुनौती दी, चाहे जितनी बार बिखरना है बिखर , मैं यहीं हूँ , तुझे समेटने के लिए।   और कोई शिकायत भी नहीं , कोई उम्मीद भी नहीं। तुम्हारा दोषी हुँ मैं और तुम मोक्षदा ........क्यों तुम भगवान बन रहे हो, एक बार सिर्फ एक बार तो शिकायत कर , जीतेन्द्र तेरे बिखरे टुकड़े मुझे दर्द पहुंचाते है , कम से कम मुझे तेरे इंसान होने का भरम तो हो।  कभी कभी तो डर लगने लगता है कि कही तेरी इबादत करने ना  लग जॉन मैं।  और शायद इबादत भी कर लू तो भी तुम्हारी कोई चीज़ तुम्हे कभी वापस नहीं कर पाउँगा।  शायद खून का एक बूंद भी नहीं जो तुमने मुझे समेटने में गिराए थे। 
मोक्षदा .......तुम्हारा दोषी हूँ मैं , सज़ा दो मुझे। 




















Friday, January 24, 2014

the worst days....

पिछले तीन दिनों से मैं बहुत परेशां हूँ , एक तो वो २२ का रात में मुझे किसी ने कॉल किया और फिर परेशां किया , फिर कल एक चिड़िया मेरे बाइक के निचे आकर मर गयी और आज सुबह मेरी वजह से मेरे पीछे चल रहा बाइक सवार गिर कर घायल हो गया , और आज दिन में एक बन्दे ने मेरी झूठी शिकायत करी जिसकी वजह से मैं अभी भी परेशां सा महसुश कर रहा हुँ।  पता नहीं क्यों हो रहा है कुछ समझ में नहीं आ रहा है .पर सब कुछ बुरा नहीं होता , कुछ न कुछ अच्छा जरुर होता है और कोई न कोई अच्छा इंसान  जरुर   आस पास होता है , उम्मेद सिंह , आज यहाँ पर बैठा है और मेरे लिए खाना बना रहा है और सिर्फ यहाँ इसलिए है कि मैं  परेशां न रहूँ।।। सच है खुदा भी कभी कभी मेरे लिए नेमत बख्शता है। 

Tuesday, January 21, 2014

2014..Plz be good yar!

I don't know..what's going to happen with me in 2014.It was the very first day, was in Goa with best pals , wondering on beach..but deep inside there was just a hollow...somewhere mourning for something.....sitting on some rock ..idly watching the waves..coming n going ..asking God for the purpose of my existence, my nonchalance ... I use to say there are some questions, better not to be answered....but i again started to ask those questions to Almighty.....Why me?  why me ?..........And the soul gives me the best answer ..you are the chosen one ....
Just to cajole yourself..make yourself pleased...what's the purpose of my existence..just to wonder here n there in dusky desert of Rajasthan n earn some money...just to satisfy your social needs..where m I, just loosing my life , loosing my time..beginning of this year, i started to think abruptly about my life..started t feel like am in shackle, n wanted to break these shackles..i wanted to quit , quit this Job...this freaking bank...this freaking job...where m chained ...
Sometimes i feel like crying...but can't...i have to keep the promise..i see all around of myself, there is no one ..no one..m alone in this creepy desert....searching for just a drop of water..alas ..I lost everything, want to quit..just want to be home..in the arms of mom....crying like a newborn ...
So this is the starting of 2014...In the branch too , i feel , it's full of selfish person, everyone having their own reasons...n m having to no one to share a bit of it...it's only 22 days n m doomed...how's it gonna rest of 2014...please 2014 have mercy..be good...for God's sake !  

Thursday, January 9, 2014

खुशियां

अब तक तो इस खुशफहमी में जी रहा था कि शायद मैं खुशियां बांटता हूँ लेकिन पहली बार ये भी पता चला कि मैं खुशियों पर नज़र लगता हूँ।  चलो जी कम से कम पता तो चला.

अपनी बात करू तो मुझे खुद ही पता नहीं चलता कि मेरी खुशियां पता नहीं कहा गायब हो गयी है। कब कि तमन्ना थी शिर्डी जाऊ , लेकिन कोई उत्सुकता नहीं।  गोआ गया कोई भी ख़ुशी नहीं , मुम्बई सम्मी के पास ,कुछ भी नहीं।  फिर पहली हवाई यात्रा, फिर भी कुछ भी ख़ुशी नहीं। पता नहीं क्या हो गया है मेरी खुशियों को , या तो साला सारी खुशियां ही ख़तम हो गयी हैं या फिर मैंने मह्सुश करना ही बंद कर दिया है.

आज भी अहमदाबाद से आते वक़्त पता ही नहीं कैसा मह्सुश करने लग गया , सांचोर पहुंचते ही लगा कि इस बियाबान बंजर में एकदम अकेला , एकदम तनहा सा।  ऐसा तो पहले कभी मह्सुश नहीं किया। कुछ भी करने का , या किसी से बात भी करने का मन नहीं होता , एकदम नहीं , खाना बनाने या फिर खाने का भी मन नहीं करता। सच है यार एक शुद्ध निगेहबानी छीन गयी तो कितना बेतरतीब सा और कितना असुरक्षित सा मह्सुश करने लग गया हूँ मैं। 

जो कुछ भी हो , सिर्फ और सिर्फ यही सोच रहा हु कि मैं कभी भी किसी कि भी खुशियों को नज़र नहीं लगा सकता , कभी भी नहीं , कभी नहीं चाहे  मेरी खुशियां ख़तम ही क्यों ना हो जाये और चाहे क्यों न मैं कुछ भी मह्सुश करना ही बंद कर दूँ.

निष्पृह