Saturday, April 26, 2014

घर

घर , एक साल  हो गये , पिछले साल इसी टाइम भैया क़ी शादी मे गया था , वक़्त का तो जैसे पाता ही नहीं चालता , मानों पर लगा कर उङ रहा हो।  जनवरी की उथल पुथल के समय से ही घर जाने का सोच रहा था , जो अब सम्भव हुआ है , ट्रांसफर के बाद पहली बार घर जा रहा हूँ।  कुछ पल अपनी जिंदगी के पुरसुकून निकालने। 

Saturday, April 19, 2014

मुझे लिखना।

 एक बहुत ही खूबसूरत रचना पढ़ी , दुष्यंत कुमार की.........

मुझे लिखना ,
वह नदी जो बह रही थी इस ओर !
छिन्न करती चेतना के राख के स्तूप ,
क्या अब भी वहीं है ?
बह  रही है ?
--या गई है सूख वह
पाकर समय की धुप ?
प्राण ! कौतुहल बड़ा है ,
मुझे लिखना ,
श्वास देकर खाद
परती कड़ी धरती चीर
वृक्ष जो हमने  उगाया था नदी के तीर
क्या अब भी खड़ा है ?
- या बहाकर ले गयी उसको नदी की धार
अपने साथ , परली पर ?

कवि क्या पूछना चाहते हैं , शायद उन भावनाओ के बारे में , जो दो व्यक्तिओ के अंतर्मन से जुड़े होते हैं , बड़ी मुश्किल हालत में और बड़े झंझावातों से बचाकर उन भावनाओं को सींचा जाता है , लेकिन वक़्त की दहलीज पर सबकुछ सूखता चला जाता है , निर्जन और बंजर रेगिस्तान , और जब माज़ी को तौला जाता है तो बस यही पूछने को रह जाता है , क्या अब भी कुछ बचा है  या वक़्त के साथ सब कुछ शून्य के साथ अन्तर्निहित हो गया है।  सच है मानव जीवन बड़ा ही विचित्र है और अदभुत भी , पर जो भी है भाई साब , खूबसूरत है। 

Tuesday, April 15, 2014

गुमनाम है कोई , बदनाम है कोई.

20 साल बाद , हाँ यही नाम है ,बहुत पुरानी थ्रिलर है ,
और पता नहीं कितनी बार  सुन रखा है इस song को ,
रेडियो के गीतमाला में या फिर 10.30  के छायागीत प्रोग्राम में ,
और जितनी  बार सुनता हूँ  नया  ही होता है ,कभी पुराना  नहीं होता।
सच है रेडियो मेरी जिंदगी का हिस्सा रहा है और सदा रहेगा।                                                              
और जब जब मेरे जेहन में ये गीत गूंजता है, मुझे हमेशा जीने का एक नया सबक मिल जाता है.
और शायद जिंदगी की असलियत बयां कर जाता है :-                                                                                                                                                               
 गुमनाम है कोई , बदनाम है कोई, किसको खबर कौन  है वो ,अनजान है कोई......
किसको समझें हम अपना ,कल का नाम है एक सपना
आज अगर तुम जिन्दा हो , तो कल के लिए.....
कल के लिए माला जपना .......

पल दो पल की मस्ती है ,बस दो दिन की बस्ती है..
चैन  यहाँ पर महंगा है और मौत यहाँ .....
और मौत यहाँ पर सस्ती है ....

कौन बला तूफानी है , मौत को खुद हैरानी है ,
आये सदा विरानो से , जो पैदा हुआ
जो पैदा हुआ वो फ़ानी है .....
( फ़ानी -नश्वर )

निष्पृह