Friday, October 21, 2011

शहर में हूँ मैं तेरे , आके जरा मिल तो ले

बहुत प्यारे शब्दों का इस्तेमाल किया है , सुनता हूँ इन गानों को तो कुछ अपनेपन की अनुभूति होती है, पर तो यहाँ अपनापन है और ही अपना शहर , लगत है कितना पीछे छुट गया है अपना शहर और अपने लोग, सच कहूँ तो जीने का मकसद भी छूटता नज़र आता है , एक छोटी सी जिंदगी मैं अपने लोगों से ईतना दूर होकर जीना भी मुश्किल लगता है , आत्मीयता की एक बूंद के लिय भी यहाँ जिंदगी तरस सी जाती है , और हम इसी बूंद की तलाश में कई और मायने भी ढूनन्धने लग जाते हैं, और मैं भी इसका अपवाद नहीं हो सकता , और मैं भी इसी को तलाश करने लगता हूँ, पर अब लगता है की थोड़ी सी प्रतिबद्धत तो ही गयी है , साल पहले जो भटकाव होता था अब नहीं होता, हाँ सच है वो भटकाव नहीं होता, नहीं खुबसूरत चेहेरों पे भी नहीं...
खैर छोड़ो कुछ अपने शहर की बातें तो करूँ, आपना शहर अब अपना नहीं रहा , नाही अब ये शहर मुझे अपना मनाता है , बस एक अजनबी सा बर्ताव करता है, कहता है तुम्हे कल सुबह ही तो जाना है और मैं अकड़
कर रह जाता हूँ , काश मैं तुम्हे हक से अब भी आपना ही शहर कह पता , रांची भी शायद कुछ अपनी जैसी ही थी ,पर यहाँ राजस्थान मैं भटकते भटकते अपने अस्तित्व की पहचान भी खो चूका हूँ,
और क्या क्या लिखूं , कुछ तो लिखना ही हैं , हमेश सी ही गुरुवार अच्छा नहीं हो रहा हैं, कल तत्काल का टिकेट भी नहीं हुआ, और टिकेट, देखता हूँ की एक भी कन्फर्म होता हैं या नहीं, नहीं हो तो बहुत मुस्किल होगी जाने में, वो यात्रा भी याद जय हैं जो , इसी समय में , और इसी ट्रेन में हुई थी, हा हा हा बड़ा मजेदार वाक्य हुआ था , लगता ही नहीं की साल पुरे गुजर गए, यार ऐसे देखते ही देखते पूरी जिंदगी गुजर जाएगी..

Saturday, October 15, 2011

लैपटॉप

आखिर मैंने लैपटॉप ले ही लिया...२००९ से प्लान बना रहा था कभी ये इसु तो कभी वो इसु, चलता ही जा रहा था और अंत में मुझे लैपटॉप नसीब हो ही गया, बैंक की दुआ से..औत आज इन्टरनेट का कनेक्शन भी ले लिया, देखता हूँ अब मैं इसका कितना सार्थक उपयोग कर पता हूँ.......कब से एक बहाना धुंध रहा थे की मेरे पास लैपटॉप नहीं है अब वो बहाना भी ख़तम...
एकचअ है शायद अब कुछ रचनातमक कर paun

Sunday, October 2, 2011

Nimbahera

Nimbahera......
Yahan jab se main aaya hun..aisa lagata hai ki kuch bhi mere sath accha nahi ho raha hai...
kal parson ka hi problem..aur yahan rahane ka problem...2-3 days se khane ka problem.....then i feel being spritual..yar sac hai aisa hi hota hai life main , aur hum kuch bhi nahi kar sakte , bus mukdarshak hi bane rahte hain.....

It's life..and we must enjoy each nad every Moment of life....

Friday, June 17, 2011

अंतिम ट्रेनिंग बीकानेर में

हाँ यहाँ अब अंतिम ट्रेनिंग है...अब पता नहीं कब इन सारे दोस्तों से मिलना हो ! जिंदगी का एक अच्छा मौका मैंने गँवा दिया सिर्फ और सिर्फ अपनी बेवकूफी से , अगर थोडा सा भी गंभीर होता तो मैं आज मुस्कुरा रहा होता...चलो ओर भगवन की मर्जी से होता है...और सबसे बड़ी बात तो ये की मैं अपने अन्दर आये परिवर्तन को महसूस कर रहा हूँ...बाकि सारे ट्रेनिंग में मैंने अपने आपको सबसे अलग थलग रखा और हमेशा अपने कोम्फोर्ट ज़ोन में रहा...लेकिन इस बार मैं बहुत सारे लोगो से बात की और नए दोस्त बनाये और इस बार खुद पे केन्द्रित न रह कर मैं लोगों पे केन्द्रित रहा...
हैदराबाद में हुए बेहविऔर साइंस के क्लास में कुछ जो भी सिखा था अब उसकी परिपालना कर रहा हूँ और अब आचा भी फील कर रहा हूँ...जिंदगी को देखने का नजरिया बदल रहा है और यही सबसे सुखद परिवर्तन है...और मैं इसका आनंद उठा रहा हूँ....इस बार ऐसे लोगो से भी घुला और मिला जिनसे मैं दूर रहने की कोशिश करता था...सच है की दुनिया में ओर लोग अच्छे होते हैं ,,,अगर आप अच्छे हो तो....जिंदगी जीने का नया नजरिया मुबारक....

Saturday, May 28, 2011

अच्छा महसूस नहीं हो रहा

यार पता नहीं ऐसा क्यों होता है की जिंदगी के सफ़र में हम नए लोगों से मिलते हैं और एक अनकहा सम्बन्ध जोड़ लेते हैं...यहाँ २७ लोगों से मिला और मिला क्या एक पूरी फमिलीय ही बना ली , सिर्फ २८ दिनों में ....ऐसा क्यों होता हैं....क्यों भावनाएं , रिश्ते समबन्ध और जज्बात परेसान करते हैं ...... क्यों हम जिंदगी के सफ़र में इसे ऐसे ले लेता हैं , मैं समझता हूँ की ऐसी फीलिंग , बहुत बार आती है और हम वापस अपने नोर्मल लाइफ में चले जाते हैं....बुत कुछ दिनों का जो transition period hota hain, bahut dukh dai hota है, ये अहसास क्यों होता है हम समझ ही नहीं पते हैं ...

Friday, May 27, 2011

I wept after a long time for myself!!!

पता नहीं कितने दिनों के बाद मैं खुद के लिए रोया.....ये self assessment ke classes ने
तो माथा ही ख़राब कर दिया है ! पर सच है मैं सोच रहा था और समझ रहा था , मैं पहले ऐसा नहीं हुआ करता था , I remember my school day...I used to be a good and eneregetic guy and was lyk a motivator... par dhire dhire jis tarah mera patan पतन हुआ मैं खुद ही अचंभित हो रहा हूँ....बीच में बहुत सारी परेसानिया आईं और मैं धीरे धीरे उनमे खुद को ढालता चला गया फिर कभी खुद पे ध्यान ही नहीं दिया, मैं पढ़ाकू बनता चलता गया और खुद को कमजोर करता चला गया , जीतनी नकारात्मक प्रवृतिया थी आती चली गयीं .....अब मैं ध्यान देता हूँ तो पता हूँ उन परेसनियों के दिनों में मेरी सारी सकारात्मक ऊर्जा थी ओर चली गई , मेरे मूल्य खोते चले गए और मुझे कुछ पता ही नहीं चला ....मैं स्व-केन्द्रित होता चला गया, अकेला पन का चोला पता नहीं कब मैंने ढँक लिया, भीड़ से और लोगो से एक दुरी बनता चला गया...ऐसा तो नहीं था मैं , हर वक़्त नकारात्मक सोचना , अपने आप को कम कर आंकना और हमेशा से एक दर....एक भय ....
भयाक्रांत मैं कभी अपने आप को समझ ही नहीं पाया...ठुकराए जाने का डर ,हार जाने का डर ,पता नहीं कितने डर मैंने खुद से पल लिए ...मेरे सरे निर्णय इसी डर से आक्रांत होने लगे और मैं अपनी पहचान खोने लगा...और फिर शुरू हुआ अपने आप को सामने लेन का खेल और फिर ओर कुछ नकरातमक , विस्वास की कमी होने लगी और अभी तक मैं इसी भय मैं फंसा हुआ हूँ...हमेशा से डरपोक बना रहता हूँ , की पता नहीं की कल क्या हो॥ हर वक़्त सबके बारे में नकारात्मक सोचता हूँ , नकारात्मक बोलता हूँ और isi attention grabbing ke chakkar me ....dost kam aur dushman jayada banne lage और आब महसूस करता हूँ की कहाँ गलती हुई.....
आज के क्लास में पता चला की यहाँ गलती हुई और मैं अपने बचपन में चला गया....और फुट फुट कर रोया.....कभी कभी लगता है आंसू में आप ओर कुछ भुला देते हैं ......
थैंक्स उ स्टेट बैंक टीम की उन्होंने ये महसूस कराया की तुम वो नहीं हो जो तुम सोचते हो....कुछ और ही हो ...इतिहास को पीछे छोड़ कर तुम्हे आगे बढ़ाना है और अपनी हर चीज़ पूरी करनी है....कुछ चीजों का निर्णय लिया है ...और अआब उनपे ही आगे बढ़ना हैं ...फिर से वही अपने आप को आगे लाना है और हमेशा आशावादी बनना है !!!

निष्पृह