Tuesday, January 15, 2013

नैराश्य....

कभी कभी तो  हारे हुए  खिलाडी की तरह महसुस करने लगता हूँ ..शायद मैं हार मानने वालो में नहीं हूँ , फिर भी कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे कुछ  बचा ही नहीं ..इतनी बेबसी क्यों है मेरी जिंदगी में ..हमेशा  से यही चाहा कि मैं खुद भी खुश रहू और उन्हें भी मुस्कुराता देखू जो मुझसे जुड़े हैं ..पर ये कभी भी हो नहीं पाता , न तो मैं खुश रह पता हूँ और न ही कोई ख़ुशी बाँट पाता हूँ ..शायद मेरी फितरत ही ऐसी है ..पिछले 5 सालों से मैं बड़े जद्दोजहद की साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़  रहा हूँ , प्रकृति से . और हर दिन जब बिस्तर पे सोने को जाता हूँ ,एक कतरा अपने अस्तित्व को खो चुका होता हूँ ..तिल तिल कर ....कहते है न की प्रारब्ध का फल तो भोगना ही है ....पता नहीं मेरे प्रारब्ध में कितना कुछ छुपा हुआ है ...
फिर भी हर हार के बाद पता नहीं क्यों ऐसा लगता है की थोडा मजबूत और हुआ हूँ , प्रकृति के हर थपेड़े को हंसकर आत्मसात करने के लिए। क्यूंकि मुझे लगता है हर लम्हा जो गुजर जाता है , अच्छा या बुरा , मेरे अस्तित्व का हिस्सा बन जाता है ..मेरे होने का सबब ..और फिर मैं कह जाता हूँ , थोड़ी और मुसीबतें/परेशानियाँ दो मुझे ताकि हर वक़्त परख सकू मैं अपने आप को ...पता है आपकी  सारी अच्छाईँ तभी निकल कर आती है जब आप बुरे वक़्त में हो। बस इतनी ही विनती है की प्रभु थोड़ी शक्ति और दो मुझे ताकि सब कुछ झेल जाऊ मैं ..सब कुछ ..कहीं पढ़ा था मैंने की .. हमे इस चीज़ की प्रार्थना नहीं करनी चाहिए की , हमारी मुसीबतें कम कर दो , हमे विनती तो  ये करनी चाहिए की हमे थोडा और शक्ति दे दो की बड़ी मुसीबते भी झेल जाऊ।बस यही कामना है .. 
                   नैराश्य से ओत -प्रोत ..

Saturday, January 5, 2013

कुछ बातें तुम्हारी..



कुछ दिनों पहले की बात है
तुमने कहा ..मैं तो बेवकूफ हूँ , पागल हूँ, मैं अगर तेरा दामन छोड़ दू तो क्या तुम भी मेरा दामन छोड़ दोगे......और मैंने सोचने लगा..कुछ दिनों पहले हुए चीजों से मैं शर्मिंदा होने लगता हूँ ......नहीं रे पागल , तू तो मेरा वजूद है , मेरे जीने की वजह ...अधुरा हु मैं तेरे बिना ....तेरे बिना तो खुद का होना भी खुद का न होना है ... और सोचता हूँ इस प्रश्न को कोई औचित्य ही नहीं है .इस प्रश्न का उत्तर तो तुम्हारे पास होना ही चाहिए..

Saturday, December 29, 2012

एक नई शुरुआत ...

एक नई शुरुआत, बस अब हमेशा मम्मी पापा के साथ रहूँगा ..कल से पापा और मम्मी दोनों मेरे साथ निम्बहेरा में रहेंगे ...अब थोड़ी उनकी सेवा कर पाउँगा ...

Monday, November 5, 2012

अच्छा -बुरा


तुम बुरे होने का नाटक कर सकते, पर बुरे नहीं हो सकते ...
तुम अच्छे होने का नाटक कर सकते हो , पर अच्छे हो नहीं सकते ...
अच्छा और बुरा , तुम्हारे खुद के होने पे होता है , नाटक पर कभी नहीं ...

Saturday, October 20, 2012

बड़ी वाली बकलोली...


खाली बैठा हू और काफी दिनों से कुछ लिखा भी नहीं , अपने विचारो को शब्दों का मूर्त रूप देने का ये बढ़िया वक़्त होता है जब आप खाली  बैठे हो ...तो सोचा क्यूँ न कुछ बकलोली किया जाये , ऐसे भी आजकल मैंने खुद को खुद में ढाल लिया है , न कहीं आता हू न ही कहीं जाता हू बस कमरे को ही मैंने अपनी जिंदगी बना लिया है , और ऐसे में लिखना  बड़ा सुकून देता है और सब से बड़ी बात तो ये की  वक़्त बड़े आराम से गुजर जाता है ...

कुछ पत्रिकाए पढ़ रहा हूँ , आहा जिंदगी , हाँ इसके  पिछले  अंक कृष्ण और इश्क पे थे और इस महीने ये  दर्शन पर केन्द्रित  है , महान दार्शनिक सुकरात पर बहुत कुछ लिखा है . अच्छा लगता है ये जानकर के हज़ार साल पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य पर खुद को स्वाहा कर दिया...कहा  है न पाने से बड़ी चीज़ तो खोना होता है ...जो खोया सो पाया ....

पर साला अब खोना अब कहाँ होता है बस पाने की दौड़ बाकी है और बस इसी पाने की दौड़ में पूरी दुनिया भागी जा रही है , खोने का सिद्धांत  ही निरर्थक हो गया है..बस पाना है चाहे जैसे भी हो.. पैसे , प्यार, हर सांसारिक सुख और तो और अब भगवान को भी लोग जैसे तैसे पाना चाहते है ..खोना कहाँ है ..और यहीं पर पता हू थोडा आत्मिक सुकून , भक्ति , कुछ दिन पहले जगतगुरु कृपालु जी महाराज की शिष्य के प्रवचन पे गया था ...लगा अब भी थोडा खोने का भाव बाकी   है , खुद को खोने का ..निःस्वार्थ ,अपने आप को कृष्ण पे लगा देना , बिने कुछ पाने की कामना किये ..और यह बड़ा परम भाव है ..रामानुज का विशिष्टाद्वैत भगवन और भक्त  को ऐसे ही देखते हैं जैसे सूर्य और सूर्य से प्रदीप्त  प्रकाश रश्मियाँ .पर हम जैसे लोगो को कभी कभी  तो चार्वाक का दर्शन ही जीवन दर्शन सा लगता है , यावत जीवेत , सुखं जीवेत ....पापी हो या पुण्यात्मा , सूर्य कभी भेदभाव नहीं करता , सामान भाव से प्रकाश  देता है और जल भी किसी पापी को उतना ही मिटा लगता है जितना किसी पुण्यात्मा को ..मतलब कर्मा का कोई मतलब नहीं होता और प्रारब्ध सिर्फ ब्राह्मणों के दिमाग की उपज..जीवन एक ही बार मिलता है और फिर सब कुछ यही पर ख़तम ..तो फिर वर्तमान में जियो ..पुनर्जन्म जैसी  कोई चीज़ ही नहीं होती और न ही पाप पुण्य जैसे कोई चीज़ ..जो अच्छा लगे खुद को वही करो , पाप पुण्य से ऊपर उठाकर , समाज और संस्कार से ऊपर उठकर  .....साला ये तो भ्रस्त  कर देगा ..हाँ पर यही तो चीज़ है जो इन्सान के अन्दर सदियों से बैठी दबी कुचली इच्छाओं को बाहर की तरफ लती हैं ..और फिर ओशो तो यही कहते हैं , न तो कुछ अच्छा होता है और न ही बुरा . ये सब कुछ इन्सान का खुद का गढ़ा  बुना है। जो तुम्हे अचछा लगे बस वही करो  .यार ये दर्शन भी पता नहीं कहाँ खिंच लता है ..अगले पच्चीस सालो तक बहुत बकलोली करनी पड़ेगी तभी दर्शन पर कुछ लिख पाउँगा ...

पर हाँ  इश्किया होने के लिए इतने लम्बे इन्तेजार की जरुरत नहीं..क्योंकि यहाँ कोई भावना सदियों से दबी कुचली हुई नहीं है और न ही उसे ऐसे रहने की जरुरत पड़ी , जब भी और जहा भी इसे लगा , खुलकर बाहर आ गयी ..अब देख लो कृष्ण और राधा ...और सदियों के बाद मीरा , और  मैं खुशकिस्मत के मीरा की नगरी में बैठा हूँ , जहाँ के जर्रे जर्रे में मीरा का असीम प्रेम है , कृष्ण के लिए , मीरा मंदिर का चक्कर भी कभी कभार लगा आया करता हूँ , चित्तौड़  में और एक साधिका है जो वही मीरा के सबद सुनाती  है , और मैं चुपचाप  कोने में बैठकर सुना करता हूँ...मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥...और  "मीरा" के प्रभु गिरधर नागर, हरस हरस जश गायो।.....बस बस ..यही तो सुकून है , खुद का खो जाना ..और क्या ..फिर मोबाईल की घंटी बजती है और मैं वापस इसी दुनिया में आ जाता हूँ , वही बैंक और वही वीभत्स जालिम दुनिया , वही मैं और तुम ...

पर सच बताऊँ  तुम्हारा होना भी बहुत मायने रखता है , और मुझे तो कभी किसी दूसरी दुनिया में जाने की जरुरत ही नहीं पड़ती , जब तुम पास होते हो ..हाँ मेरी दूसरी , तीसरी और चौथी दुनिया भी तुम्ही हो ..हर गम , दुःख अवसाद , सब कुछ तुम्हारे पास आते ही छू मंतर , ये जादू नहीं तो और क्या है ..सब कुछ अच्छा सा लगने लगता है सब कुछ अच्छा  सा होने लगता है ...रंग बिरंगी ये दुनिया और भी हसीं हो जाती है .हाँ जब तुम पास होते हो ..और कभी कभी तो ऐसे सिर्फ तुम्हारे पास होने के अहसास से ही होना शुरु हो जाता है..ये भी बड़ी नेमत है खुद का इशिकिया होना और इसके लिए बड़ा अनुभव भी जरुरी  नहीं  ..बस अन्दर से एक आवाज आनी चाहिए  इश्किया इश्किया ....कुछ दिनों पहले एक दोस्त से बाते कर रहा था ,  और वो अपने एक दोस्त की बाते मुझे सुनाये जा रहा था , मैंने कहा यार वो तेरे लिए इतना कुछ करता है , सब सहता है सब सुनता है फिर शायद हदों तक तुमसे मुहब्बत भी , फिर तुम क्यों नहीं सोचते उसके बारे में ...और पता है उसका उत्तर क्या था ..यार उसके लिए ये आवाज ..इश्किया इश्किया वाली अन्दर से कभी आती नहीं ...हा हा हा ..सच है यार ये आवाज तो अन्दर से आनी चाहिए ..ड्रम ढोल और नगाड़े भी बजने चाहिए , पर नहीं बजती तो इसका कुछ किया भी नहीं जा सकता ....माहौल  भी तो बदलना चाहिए ...ये नीरस जगह कब एस्किमो वाला  टुन्ड्रा प्रदेश में बदल जाये या फिर अफ्रीका का वाइल्ड लाइफ सफारी ...पता नहीं न ..पर ये तो होना चाहिए न ..पर भावनायो में सच्चाई होनी चाहिए , कामना नहीं ..और यही कामना तो हर जगह इन्सान को गिरा देती है , जहाँ कामना आया , वह से इश्किया गायब, भाग जाता है ये इश्किया भी......इतने सालों  से तुम्हे देख रहा हूँ ....एक चीज़ जो अब तक नहीं बदली है  वो है ...No Demand , No Expectation and No Complaint ..जहाँ  भी रहा मैं और जो कुछ भी सही गलत किया मैंने ....तुम्हारी ये No Demand , No Expectation and No Complaint वाली चीज़ हर वक़्त मुझे हरा देती है ...कभी कोई शिकवा नहीं, कोई गिला या शिकायत नै , सब कुछ स्वीकार होता है तुम्हे ...और यही से तो रूहानी शुरुआत होती है इश्किया इश्किया वाली...कुछ रूहानी और कुछ रूमानी सी..

कहा न की आज मैं बड़ी वाली बकलोली करने वाला हू ..हा हा हा







Monday, October 8, 2012

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती ...अजमेर

 पीर साब के दरबार में ये मेरी दूसरी हाजरी थी ...पिछले साल जनवरी में मैं गया था , उस वक़्त भी जय मेरे साथ था और इस बार की भी दस्तक उसी के साथ ...कोई प्लान नहीं बस जाना है तो जाना है , शम्भू  भी आया था जयपुर और मैंने कहा भी की अजमेर आ जाये ..ख्वाजा के दर पर ..पर एन मौके पर उसकी तबियत ख़राब हो गयी ..और आज जब पता चल रहा है की उसकी तबियत बहुत ही ख़राब हो गयी है ..

सच कहूँ तो दरगाह  के अन्दर बहुत शांति महसूस होती है , बहार के कोलाहल से अनादर का वातावरण एकदम से शांत ..मैं बैठ जाता हु चुपचाप , एकदम शांत , बाहर और अन्दर भी...बस कव्वाली की आवाज आ रही है ..पुरसुकून है ...सूफियो में बड़ी ताकत होती है ..और ये ताकत महसूस कर रहा होता हु ..सजदे  में खुद ब खुद सर झुक जाता है और दुआ में हाथ खुद ब खुद उठ जाते हैं..यहाँ हिन्दू होना या मुसलमान होना कोई भी मायने नहीं रखता ...मायने रखता है तो सिर्फ खुद का खुद होना ...सूफी संतो में और भक्ति संप्रदाय के संतो में यही समानता है ..खुद को खुदा के साथ मिला देना ...और और महसूस करना बहुत बड़ी नेमत है .....

अब देखता हूँ छोटी सी दुआ की है पता नहीं कब तक कुबूल होती है और कब तक मुझे दरगाह पर जाने का तीसरा मौका मिलता है .......ख्वाजा मेरे ख्वाजा ...

निष्पृह