Tuesday, June 18, 2013

बारिश की पहली बूंद

पता नहीं कितनी बारिशें आकर गुजर गई , पर हर वो बारिश जिसमे हम  और तुम साथ साथ भीगे थे , जिंदगी  की अनमोल अभिव्यक्ति सी बन  गई  . जब भी ये बारिश , मुझे छुकर गुजरती  है , मुझे वो लम्हा याद आ जाता है , मुझे वो तुम्हारा छोटा सा फूलो की छापों वाला छाता भी याद आता है , थोड़े हरे रंग का, हमारे और तुम्हारे साथ भींगने का साक्षी ..मुझे बारिश से बचाने को तुम और तुम्हे बचाने को मैं , और इसी बचाने की जद्दोजहद  में हम दोनों भींग जाते थे ..मुझे याद है मैं हमेशा तुम्हारी बायीं तरफ होता था और तुम हमेशा मेरी दायीं तरफ। और जब हम अलग होते थे , एक दुसरे को छुकर मह्सुश करते थे कि  "तुम " बहुत भींग  गए हो. शायद तुम्हे याद नहीं होगा जब हम तुम तुम्हारे उसी  छाते के नीचे होकर जा रहे रहे थे , अचानक जोरदार  बारिश हो गयी और हमारा एक कदम भी बढ़ाना मुश्किल सा हो गया था ,तब हम कुछ देर रुके थे एक छप्पर के निचे और अचानक से बिजली बहुत जोरों से कडकी थी , और तुम सिमट गए थे मुझमे , जैसे मुझमे और तुझमे कोई फर्क ही न हो और तब मुझे ऐसा लगा था की सारी कायनात ही सिमट गया हो मुझमे ...पता नहीं क्यों मैं उस वक़्त के अहसासात को शब्दों में ढाल ही नहीं पाता ..प्रकृति का सबसे हसीन लम्हा था वो मेरे लिये, वो बारिश की पहली बूंद , वो बिजली का कडकना , और वो तेरा मुझमे सिमट जाना ......

जब भी ये बारिश की पहली बूंद पड़ती है मेरे जिस्म पे, हमेशा तुम्हारी यादो से तारो ताज़ा हो जाता हूँ , उन लम्हों से जो अव्यक्त है , अनकही है , फिर भी है जानी  पहचानी सी ..हमेशा से मैं डरता रहा हूँ ,  डरता रहा हूँ तुम्हारे बारे में कुछ भी लिखने सुनने को , पर जब भी ये बारिश की बुँदे मुझ पर गिरती हैं . मैं  शायद उछ्रिन्ख्ल हो जाता हूँ और खुद को नहीं रोक पाता . शब्द  खुद ब खुद मूर्त रूप लेने लग जाते हैं .....हर बारिश के साथ तुम्हारी यादें जुडी हुई हैं ..और पता नही इतने साल  गुजर जाने के बाद भी यही मनाता हूँ की मेरी हर बारिश गुजरे, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे साथ ..

"वाह रे खयाली पुलाव , साला कभी कभी बकलोली हम भी कर ही लेते हैं ..हा हा हा .." 

Saturday, June 15, 2013

अजीब सी दुनिया .

काफी दिनों से कुछ लिखा नहीं और अब ऐसा कुछ लिखने का मन भी नहीं होता। ऐसा लगता है जैसे विचारों का प्रवाह ख़तम  सा हो गया हो ..खैर जो भी हो ..पर आज जो कुछ भी हुआ , ऐसा लगता है लिख लेना चाहिए , ताकि मुझे भी हमेशा याद रहे कि मैं एक ऐसे  इंस्टिट्यूट में काम करता हु जहाँ   बहुत गन्दी राजनीती चलती है . 

आज जितनी निराशा मुझे हुई वो शायद मैं बयां नहीं कर पाउँगा .ऐसा कोई भी  कैसे  कर सकता है या सोच  भी सकता है कि  अगर दो  लोगो को ब्रांच से विदा करना है तो  एक को पार्टी और  शुभकामना सहित  और एक को बस यु ही  बे आबरू . पता नहीं लोगो की इंसानियत  कहा ख़तम हो जाती है .मैं तो सिर्फ ये सोचता हु की अगर ऐसा आपके  साथ हो तो आपको कैसा मह्सुश होगा , तब शायद आप अपने आप को shattered मह्सुश करेंगे . मुझे तो ताज्जुब तब हुआ  पता चला की ये सब शर्मा सर की जानकारी में हुआ . और जब मैं  उनके पास गया सिर्फ ये पूछने की ऐसा कैसे हो रहा है और क्यों हो रहा है तो उनका जो उत्तर  था उसे शायद shameless कहने में मुझे तो कोई shame नहीं होगा . एक झटके में उनकी सारी image ही change हो चुकी थी . वो image जो पिछले 1 साल से मैंने अपने ज़ेहन में बैठा रखी थी . इतने साल बैंकिंग  में गुजरने के बाद और पता नहीं कितने  लोगो से आप मिले  होंगे ..क्या सही है और क्या  गलत है में रत्ती भर का भी फर्क नज़र नहीं आता और ना ही आपने थोड़े से भी सोचने की भी जरुरत नहीं समझी की उस बन्दे के ऊपर क्या गुजर रही होगी ...जब इन्सान का  गला भरी हो तब ही कुछ समझ में आता है .....मैं तो भगवान से बस यही दुआ करूँगा की कही कभी  भी ऐसा आपके  साथ न हो ..

जो भी हुआ , मुझे आत्मपरीक्षण पर ले आया है की मैं जहाँ बैठा हुआ हु और जहाँ नौकरी  कर रहा हु , अन्दर में बहुत ही गन्दी राजनीती है . जो आपको कभी भी बे आबरू और रुसवा कर सकती है और फिर ये भी सोचता हु ऐसे जगह में और ऐसे लोगो के बीच में काम करने का क्या फायदा , पर शायद अपने पास कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है ...जो भी हो हर चीज़ से , चाहे  वो अच्छी हो या बुरी , कुछ न कुछ सिखने को मिलता है ...और आज वाली घटना से , जिसने मेरे मन में अशांति भर  दिया है , कुछ न कुछ तो जरुर ही  सिखा होऊंगा ... 

Thursday, May 2, 2013

बेबश

क्यों कभी कभी खुद को बहुत बेबश सा महशुश करता हूँ, तो फिर सोचने लग जाता हूँ की क्यों मैं इतना कमज़ोर हु ...क्यों है इतनी बेबशी और क्यों हु इतना दबा कुचला सा मजबूर मैं ...क्यों हु ..

Friday, April 26, 2013

Love can reverse anything :)

was watching IPL match , but during AD time just changed the channel,  and came through a movie, named woman on top, firstly I din't like the title, but due to Penelope cruz or whatever may be the reason , I kept watching, and see what i found, found myself swimming in the sea of emotion..sometimes up or sometimes down..No one can separate two beautiful, loving pieces apart, Not even God.and what was the message..true love can reverse anything or everything...even a curse too :)...agree :)

Wednesday, April 10, 2013

हाँ हाँ मैं crazy हूँ .....

किसी को smile देना , किसी को खुश कर जाना ..अगर crazy है ..तो हाँ मैं crazy हूँ .. हाँ हाँ मैं crazy हूँ .....

कितना बढ़िया ad है ...मैं भी कभी कभी अपने इस पकाऊ नौकरी के बीच किसी किसी को खुश कर जाने का वक़्त निकल ही लेता हूँ..कुछ नाम जैसे विमला गोठवाल जी , जो सेवानिवृत शिक्षिका है ...और आज PVV  krishnan जी जो साउथ से है ..थोडा सा उन्हें हंसा दिया ....पर पता नहीं कितने लोग मुझसे नाराज़ होकर जाते होंगे ..पर उसका क्या ...आपको तो बस अच्छी चीजें ही याद रहनी चाहिए ......................

चलो इसी तरह अगर बेवजह खुशियाँ लुटाऊ तो , इन्ही छोटी छोटी खुशियों से ही अपनी जिंदगी खुबसूरत बनती चली जाएगी ....
Lovely...



Monday, April 8, 2013

बेतरतीब सी जिंदगी .

इस बेतरतीब सी जिंदगी में कब कौन सी चीज़  कहाँ खड़ी हो  जाये कुछ पता ही नहीं चलता , कुछ अप्र्तयशित जैसा ..और यही चीज़ जिंदगी को और बेतरतीब कर जाती  है . जो भी हो इसे झेलना  तो पड़ता ही है ..और         तब थोड़ी energy मैं  तुमसे ले लेता हूँ . रुखी सी जिंदगी में जिन्दा होने का अहसास जाग पड़ता है। थोड़ी सी खुश्की मिट जाती है ...थोडा सा तरोताजा हो लेता हूँ मैं हर उस चीज़ से झगड़ पड़ने  को, जो शायद मुझे पीछे खींचती है ..मुझसे मेरे होने का मतलब  पूछती है ......और उतनी ही शिद्दत सी उस सवाल का  देता हूँ ..तेरे  होने का मतलब ही तो मेरा होना है ..और फिर जिंदगी के सारे टेंशन ख़तम ..सब कुछ झेल लूँगा मैं अकेले ही ..सब कुछ ..हाँ फर्क तो सिर्फ यही पड़ेगा कि थोडा और खुष्क हो जाऊ मैं थोडा सा और रुखा ....लेकिन मेरी ये सदाबहार मुस्कराहट तो है ही मेरे  .... 

Tuesday, April 2, 2013

वही सूनापन वही अन्धकार ...


कल से ही एकदम सूना सूना सा महसूस कर रहा हु ..एकदम अकेला सा तनहा सा ..वापस निराशा के गर्त में डूबा हुआ . गहन अन्धकार में विलीन ...सोचा था वह पहुँच जाऊ जहाँ थोडा सकूँ मिलता है ..पर वह भी बेरुखी ..और शायद इसी का भागी हूँ मैं ..
    कभी कभी तो सोच सोच कर परेशां हो जाता हूँ मैं , क्यों ये जिदगी हमारे अनुसार नहीं चलती . थोडा भी , और वही होता रहता है जो हम नहीं चाहते कि हो...अचानक से जुल्फान कि शादी ..सोचता हु तो लगता है कि पागल हो जाऊंगा ..पागल , विक्षिप्त ..कुछ भी नहीं है मेरे पास , सिर्फ निराशा के ..विचलित सा  होता हुआ लगता है ..खुद का अस्तित्व , डगमगाता सा ....ये लड़ाई है दिए की और तूफान की.......फिर लगता है की मैंने सोचना ही छोड़ दिया है ..और सच है मेरे बचने का एकमात्र उपाय...न सोचोगे और न ही टेंशन होगा ...जैसा उपरवाला चाहता है वैसा ही होता है ..
        पर वक़्त का क्या , वो तो बस निकालता चला जाता है , न तो कुछ नया और न की कुछ रचनात्मक ..और ऐसा पशुवत जिंदगी का मोल भी क्या ..कभी तो सिर्फ तुम्हारे होने के के अहसास से ही ऐसा लगता है है की सब कुछ पूरा है पूरा, करीने से सजा हुआ , और फिर तुम्हारे उसी बेरुखी से ऐसा लगता है सब कुछ चलवा , बस एक प्रतिबिम्ब , और कुछ भी नहीं ....
    मेरे हर वक़्त मजबूत होने की कुछ तो वजह होनी चाहिए न और कभी कभी एकदम बेबस सा कमजोर होने की कुछ परिणिति ...सच तो ये भी है की मुझे कोई चीज़ जो शायद तुम्हारी है , बिखरने नहीं देती ...और कभी तो लगता है कि कब का मैं टूटकर बिखर चूका हूँ कई टुकडो में ..और हर टुकड़ा जैसे मेरी फितरत पे हँसता है ..और जब ये टुकड़ा मुझपर हँसता है तो माज़ी में चला जाता हु ...हाँ वही माज़ी ...जहा मेरा सब कुछ बिखर पड़ा है ...कुछ जार जार हो चुके सपने और कुछ दम तोडती महत्वाकंछाये...
   पता नहीं कब तक ऐसा चलता रहेगा सब कुछ ..जहाँ मैं अपनी खुद की एक मासूम मुस्कराहट के लिए तडपता रहूँगा ..और इन खोखली हंसी का आवरण जो अपने अस्तित्व के ऊपर ओढ़ रखा है निकाल फेकुंगा...अब तो हर वक़्त बस नकारात्मक विचारो का आना जाना लगा रहता है ..निराशा की लहरे बस यहाँ वहां  डोलती रहती है ..जिंदगी जैसे ठहराव पे आ पड़ी हो , ठीक किसी पुराने तालाब के गंदले पानी की तरह ....और ठीक मैं इन्तेजार कर रहा हूँ मानसून के उस फुहार का जो सब कुछ नया कर जाये ...इस गंदले पानी को स्वच्छ कर  जाये , एक नया जीवन एक नया उमंग भर जाये ....और शायद उसी बदलाव का इन्तेजार है मुझे ..जहाँ कुछ रचनात्मक हो , जहा आशावाद हो और आगे बढ़ने का और कुछ नया करने का उमंग ......
      पर अभी तो गहन अन्धकार है , मायूसी है , आने वाले चार पांच महीनो का हिसाब किताब ...पता नहीं मैं कैसे अपनी सब जिम्मेदारिया निभा पाउँगा...बस तुम्हारा ही सहारा है ....

निष्पृह