Sunday, September 22, 2013

वह अब भी मिलती है. .

वह अब भी मिलती है. .
सुबह बनकर , शाम बनकर
और अक्सर नज़्मे बनकर
और हम कितनी देर
एक दूजे को देखते रहे हैं
और मिलकर अपनी अपनी नज्मे
जिंदगी को सुनाते  है।
     इमरोज़। 

Monday, September 9, 2013

झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नहीं।

जगजीत सिंह जी का गाया ये song जब जब सुनता हूँ,  अजीब सी सिहरन होती है दिलो दिमाग मे. हर वक़्त ये पूछ पड़ता हूँ, दबा दबा सा सही इनमे प्यार है के नहीं। ।  तू अपने दिल की जवां धडकनों को गिन के बता  , मेरी तरह बेकरार है की नहीं। ।  और इस गाने का एक अंतरा जो बहुत ही दिल के करीब है , जब भी कमजोर हो रहा होता हूँ तो गुनगुना लेता हु। .. 
          तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को.. 
          तुझे भी अपने पे ही ऐतबार है के नहीं....

          

Saturday, August 24, 2013

Suffering .

Sometime u suffer for unknown reason and sum time u suffer for being good...It well said that the price of being good is paid by you and being bad is paid by others....so what just suffer...and when u suffer...suffer joyfully.

Friday, August 2, 2013

फिर वही अँधेरा।।

फिर वही बेबशी। फिर वही वाहियात पन। क़्यु मैं समेट नहीं पाता हु लम्हों को। …फ़िर वही अँधेरा। 

Sunday, June 23, 2013

क्यों मैं इतना खुश सा रहता हूँ..

कभी कभी तुम  ऐसा सवाल पूछ लेते हो कि मैं एकदम से सोच में पड जाता हूँ . और तुम्हारा ये सवाल कि " मैं क्यों हमेशा खुश रहता हूँ या खुश लगता हु", ने सचमुच मुझे सोचने को मजबूर कर दिया कि  वास्तव में ऐसा है क्या और अगर ऐसा है तो क्यों है? क्या मैं सचमुच हमेशा खुश रहता हूँ , खुश रहने की कोशिश करता हूँ या फिर बस यूँ ही ...जो भी हो कभी कभी नोटिस करता हूँ मुझे लोग ब्रांच में भी कह जाते हैं कि , हमेशा ही मुझे लोग मुस्कुराता हुआ पाते है , कुछ दिन पहले की बात है , बैंक में नए नए ज्वाइन किये एक बन्दे ने मुझसे कहा की बैंक में सिर्फ मुझे सी हँसता , मुस्कुराता और खुश पाया है , बाकी सब लोगो को हमेशा सीरियस पाया है ..
                       चलो जो भी हो ,अब तो मुझे तुम्हारे प्रश्न का  भी तो ढूँढना है कि क्यों मैं इतना मस्त रहता  हूँ, सबसे पहली बात तो ये है कि "I accept everything as it comes in life ", जो जैसा है उसको उसी रूप में स्वीकार करता हूँ/ या फिर उसी रूप में स्वीकार करने की कोशिश करता हूँ .क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है जैसे ही मैंने किसी चीज़ को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश की , उसका स्वरुप ही बिगड़ जाता है ...उसे उसके खुद के रूप में ही रहने देता  हूँ और उसके हिसाब से ही खुद को ढालने की जुगत में लग जाता है , तुम्हे पता है तुम हमेशा कहा करते हो की मैं वही  कहता हू जो सामनेवाला सुनना चाहता है , बस यही जुगत है , खुश रहने का जुगाड़ .....
                     दूसरी चीज़ जो मुझे लगता है की मुझे खुश रखने में सहायक होता है वो एक वाक्य में समाहित है .."Never expect anything from anyone, because expectations hurt ".. मुझे  याद आता है ३ साल पहले का एक वाकया , मेरे किसी दोस्त ने मुझसे कहा था की उसके roomies उसका care नहीं करते , इसलिए वो दुखी है, मैंने उससे सिर्फ यही कहा था कि तुम, ये expect करते हो कि  वो तुम्हारा care  करे, और जब वो तुम्हारा care नहीं करते तो तुम्हे हर्ट होता है . ऐसा करो कि ये expectation ही छोड़ दो ...और उसके बाद से मेरे उस दोस्त ने इस चीज़ की शिकायत शायद ही कभी की हो ..हाँ ये सच है , और जिंदगी का सबसे बड़ा फंडा ...
                     तीसरी चीज़ , हमेशा से हम ये कहते फिरते  हैं कि , ये बंदा बुरा है या ये बंदी बुरी है क्यूंकि हो सकता है कि उसने तुम्हें harm किया हो .पर ये सच नहीं की वो हर किसी के लिए बुरा हो, मैं तो ये सोचता हु की जब कोई खुद को harm  नहीं कर सकता तो किसी दुसरे को क्या harm  करेगा ..So I always use to think everyone is good .".. वो भी अच्छा है जिसने मेरी भलाई की और वो भी जिसने नुकसान पहुँचाया ...और जब मैं इस वाक्य को दुहराता हूँ, अन्दर से एक शक्ति मिलती है उस बन्दे के लिए भी अच्छा सोचने और अच्छा करने को जिसने जाने , अनजाने में मेरा अहित किया . और मैं समझाता हूँ दुनिया में इस से बड़ी भावना कोई हो ही नहीं सकती ..तो खुश रहने का ये था तीसरा  फंडा ...
                    इन फंडो को छोड़कर कुछ और कहूँगा , मेरी जिंदगी भी अब तक ऐसी गुजरी है की , खुश रहना तो बनता है यार , याद  आता है 2006 फ़रवरी , जब सब तरफ अँधेरा था,तब मुझे एक रोशनी की किरण भी याद आती है जिसने मुझे भरोशा दिया था खुद पे भरोशा रखने का , नहीं तो मैं पता नहीं कहाँ टूटकर बिखरा हुआ होता ।   ..मुझे 2007  याद आता है , जब मैं पागल सा हुआ करता था , ये सोच सोच कर की graduation के बाद क्या करूँगा , कहाँ जाऊंगा . साधनविहीन विपन्न ..ख़ुदा ने नेमत बक्शी , सारे दरवाजे खुद ही खोल दिए .. मैं चेहरों की मुस्कान खरीदना चाहता था , जो कितने सालों पहले जाने कहाँ खो गयी थी ..और उपरवाले ने मेरी हर  मुराद बक्शी ...मैं उड़ना चाहता था , उसने मुझे पंख बक्शे ....और मैं हँसना चाहता था उसने मुझे मुस्कराहट बक्शी ..और अब मैं उसकी इबादत इसी मुस्कराहट से करता हूँ ..
                  एक और  वजह से मेरे खुश रहने का , निश्चिंतता ,  हाँ ये भी बड़ी चीज़ है ,मैं हमेशा निश्चिंत होता हूँ कि हाँ यहाँ कोई तो है जो मेरे पास होगा ..even in the darkest hour of my life, to hold my hand and assure me , के  "मैं हूँ ना "..पता है उसे मेरी सारी बुराइयाँ पता होती है पर वो हमेशा मेरी बुराइयों में मेरी अच्छाई ढूंढ़ लाता है ...है न कमाल  की बात ...और मुझे भी ऐसा लगता है की कोई तो है जहाँ मैं अपनेसारे  दुःख गम विषाद समेट  सकता हूँ ..हर वो लम्हा समेट  सकता हु जहाँ मैं बहुत खुश होकर अपनी हंसी प्रस्फुटित की थी या फिर हर उस लम्हे को बाँट सकता हूँ जब मैंने अपनी आंसुओं से फिजाओं को रुलाया होगा .. तन्हा सा अकेला सा ..और इसी अकेलेपन का साक्षी वो , हर टूटते बिखरते सपनो का साक्षी ..वो भी तो बड़ी वजह है ...मेरे खुश रहने का ...
                    और रह गयी बात खुशिया ढूंढ़ने की तो हर छोटी चीज़ में कोशिश करता हूँ, खुशियाँ ढूंढ़ लु. ब्रांच में आने वाली वो रिटायर्ड टीचर या फिर वो साउथ इंडिया के वो अंकल ..इनको थोड़ी देर हंसाकर  भी खुश हो लेता हूँ ..या फिर वो पेंशनर अंकल जिनके पेंशन में  1 रूपया का फर्क है ..कल ही गया था बड़ी सादरी ब्रांच , बैंक  के कम से ,वहां भी एक गांववाला काफी देर से बैठा था , और जब मैंने उसे समझाया तो दुआएं दी मुझे उसने, खुश होने का एक और वजह , इस अजनबी देश में गर्मी में तपती रेत  और उसपर बारिश की पहली बूंद, तब मैंने ऐसा ही कुछ मह्सुश किया ..कुछ तो नेमत बक्शी है उपरवाले ने ...वही घंटाघर चोराहे से गुजरने लगा तो पाया की , कहाँ था मैं चंदवा में , और कहाँ आ गया मैं राजस्थान में, और आया ही नहीं इसे मह्सुश भी कर रहा हूँ ...ये नेमत नहीं तो क्या है ...मैंने इबादत न करूँ तो क्या करूँ ..मैं खुश ना रहूँ तो क्या करूँ ...
                              और भी कई वजहें  हो सकती है मेरे खुश रहने के , पर मुझे लगता है तुम्हे तुम्हारा उत्तर मिल गया होगा . ना  मिला हो तो फिर पूछना ...मेरे मूड में आकर लिखने को 2 कप चाय और 2 ,3 घंटे का वक़्त चाहिए ....कम से कम मेरे ब्लॉग में एक पोस्ट तो बढेगा ..हा हा हा ...
                              

Tuesday, June 18, 2013

बारिश की पहली बूंद

पता नहीं कितनी बारिशें आकर गुजर गई , पर हर वो बारिश जिसमे हम  और तुम साथ साथ भीगे थे , जिंदगी  की अनमोल अभिव्यक्ति सी बन  गई  . जब भी ये बारिश , मुझे छुकर गुजरती  है , मुझे वो लम्हा याद आ जाता है , मुझे वो तुम्हारा छोटा सा फूलो की छापों वाला छाता भी याद आता है , थोड़े हरे रंग का, हमारे और तुम्हारे साथ भींगने का साक्षी ..मुझे बारिश से बचाने को तुम और तुम्हे बचाने को मैं , और इसी बचाने की जद्दोजहद  में हम दोनों भींग जाते थे ..मुझे याद है मैं हमेशा तुम्हारी बायीं तरफ होता था और तुम हमेशा मेरी दायीं तरफ। और जब हम अलग होते थे , एक दुसरे को छुकर मह्सुश करते थे कि  "तुम " बहुत भींग  गए हो. शायद तुम्हे याद नहीं होगा जब हम तुम तुम्हारे उसी  छाते के नीचे होकर जा रहे रहे थे , अचानक जोरदार  बारिश हो गयी और हमारा एक कदम भी बढ़ाना मुश्किल सा हो गया था ,तब हम कुछ देर रुके थे एक छप्पर के निचे और अचानक से बिजली बहुत जोरों से कडकी थी , और तुम सिमट गए थे मुझमे , जैसे मुझमे और तुझमे कोई फर्क ही न हो और तब मुझे ऐसा लगा था की सारी कायनात ही सिमट गया हो मुझमे ...पता नहीं क्यों मैं उस वक़्त के अहसासात को शब्दों में ढाल ही नहीं पाता ..प्रकृति का सबसे हसीन लम्हा था वो मेरे लिये, वो बारिश की पहली बूंद , वो बिजली का कडकना , और वो तेरा मुझमे सिमट जाना ......

जब भी ये बारिश की पहली बूंद पड़ती है मेरे जिस्म पे, हमेशा तुम्हारी यादो से तारो ताज़ा हो जाता हूँ , उन लम्हों से जो अव्यक्त है , अनकही है , फिर भी है जानी  पहचानी सी ..हमेशा से मैं डरता रहा हूँ ,  डरता रहा हूँ तुम्हारे बारे में कुछ भी लिखने सुनने को , पर जब भी ये बारिश की बुँदे मुझ पर गिरती हैं . मैं  शायद उछ्रिन्ख्ल हो जाता हूँ और खुद को नहीं रोक पाता . शब्द  खुद ब खुद मूर्त रूप लेने लग जाते हैं .....हर बारिश के साथ तुम्हारी यादें जुडी हुई हैं ..और पता नही इतने साल  गुजर जाने के बाद भी यही मनाता हूँ की मेरी हर बारिश गुजरे, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे साथ ..

"वाह रे खयाली पुलाव , साला कभी कभी बकलोली हम भी कर ही लेते हैं ..हा हा हा .." 

Saturday, June 15, 2013

अजीब सी दुनिया .

काफी दिनों से कुछ लिखा नहीं और अब ऐसा कुछ लिखने का मन भी नहीं होता। ऐसा लगता है जैसे विचारों का प्रवाह ख़तम  सा हो गया हो ..खैर जो भी हो ..पर आज जो कुछ भी हुआ , ऐसा लगता है लिख लेना चाहिए , ताकि मुझे भी हमेशा याद रहे कि मैं एक ऐसे  इंस्टिट्यूट में काम करता हु जहाँ   बहुत गन्दी राजनीती चलती है . 

आज जितनी निराशा मुझे हुई वो शायद मैं बयां नहीं कर पाउँगा .ऐसा कोई भी  कैसे  कर सकता है या सोच  भी सकता है कि  अगर दो  लोगो को ब्रांच से विदा करना है तो  एक को पार्टी और  शुभकामना सहित  और एक को बस यु ही  बे आबरू . पता नहीं लोगो की इंसानियत  कहा ख़तम हो जाती है .मैं तो सिर्फ ये सोचता हु की अगर ऐसा आपके  साथ हो तो आपको कैसा मह्सुश होगा , तब शायद आप अपने आप को shattered मह्सुश करेंगे . मुझे तो ताज्जुब तब हुआ  पता चला की ये सब शर्मा सर की जानकारी में हुआ . और जब मैं  उनके पास गया सिर्फ ये पूछने की ऐसा कैसे हो रहा है और क्यों हो रहा है तो उनका जो उत्तर  था उसे शायद shameless कहने में मुझे तो कोई shame नहीं होगा . एक झटके में उनकी सारी image ही change हो चुकी थी . वो image जो पिछले 1 साल से मैंने अपने ज़ेहन में बैठा रखी थी . इतने साल बैंकिंग  में गुजरने के बाद और पता नहीं कितने  लोगो से आप मिले  होंगे ..क्या सही है और क्या  गलत है में रत्ती भर का भी फर्क नज़र नहीं आता और ना ही आपने थोड़े से भी सोचने की भी जरुरत नहीं समझी की उस बन्दे के ऊपर क्या गुजर रही होगी ...जब इन्सान का  गला भरी हो तब ही कुछ समझ में आता है .....मैं तो भगवान से बस यही दुआ करूँगा की कही कभी  भी ऐसा आपके  साथ न हो ..

जो भी हुआ , मुझे आत्मपरीक्षण पर ले आया है की मैं जहाँ बैठा हुआ हु और जहाँ नौकरी  कर रहा हु , अन्दर में बहुत ही गन्दी राजनीती है . जो आपको कभी भी बे आबरू और रुसवा कर सकती है और फिर ये भी सोचता हु ऐसे जगह में और ऐसे लोगो के बीच में काम करने का क्या फायदा , पर शायद अपने पास कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है ...जो भी हो हर चीज़ से , चाहे  वो अच्छी हो या बुरी , कुछ न कुछ सिखने को मिलता है ...और आज वाली घटना से , जिसने मेरे मन में अशांति भर  दिया है , कुछ न कुछ तो जरुर ही  सिखा होऊंगा ... 

निष्पृह