Tuesday, January 21, 2014

2014..Plz be good yar!

I don't know..what's going to happen with me in 2014.It was the very first day, was in Goa with best pals , wondering on beach..but deep inside there was just a hollow...somewhere mourning for something.....sitting on some rock ..idly watching the waves..coming n going ..asking God for the purpose of my existence, my nonchalance ... I use to say there are some questions, better not to be answered....but i again started to ask those questions to Almighty.....Why me?  why me ?..........And the soul gives me the best answer ..you are the chosen one ....
Just to cajole yourself..make yourself pleased...what's the purpose of my existence..just to wonder here n there in dusky desert of Rajasthan n earn some money...just to satisfy your social needs..where m I, just loosing my life , loosing my time..beginning of this year, i started to think abruptly about my life..started t feel like am in shackle, n wanted to break these shackles..i wanted to quit , quit this Job...this freaking bank...this freaking job...where m chained ...
Sometimes i feel like crying...but can't...i have to keep the promise..i see all around of myself, there is no one ..no one..m alone in this creepy desert....searching for just a drop of water..alas ..I lost everything, want to quit..just want to be home..in the arms of mom....crying like a newborn ...
So this is the starting of 2014...In the branch too , i feel , it's full of selfish person, everyone having their own reasons...n m having to no one to share a bit of it...it's only 22 days n m doomed...how's it gonna rest of 2014...please 2014 have mercy..be good...for God's sake !  

Thursday, January 9, 2014

खुशियां

अब तक तो इस खुशफहमी में जी रहा था कि शायद मैं खुशियां बांटता हूँ लेकिन पहली बार ये भी पता चला कि मैं खुशियों पर नज़र लगता हूँ।  चलो जी कम से कम पता तो चला.

अपनी बात करू तो मुझे खुद ही पता नहीं चलता कि मेरी खुशियां पता नहीं कहा गायब हो गयी है। कब कि तमन्ना थी शिर्डी जाऊ , लेकिन कोई उत्सुकता नहीं।  गोआ गया कोई भी ख़ुशी नहीं , मुम्बई सम्मी के पास ,कुछ भी नहीं।  फिर पहली हवाई यात्रा, फिर भी कुछ भी ख़ुशी नहीं। पता नहीं क्या हो गया है मेरी खुशियों को , या तो साला सारी खुशियां ही ख़तम हो गयी हैं या फिर मैंने मह्सुश करना ही बंद कर दिया है.

आज भी अहमदाबाद से आते वक़्त पता ही नहीं कैसा मह्सुश करने लग गया , सांचोर पहुंचते ही लगा कि इस बियाबान बंजर में एकदम अकेला , एकदम तनहा सा।  ऐसा तो पहले कभी मह्सुश नहीं किया। कुछ भी करने का , या किसी से बात भी करने का मन नहीं होता , एकदम नहीं , खाना बनाने या फिर खाने का भी मन नहीं करता। सच है यार एक शुद्ध निगेहबानी छीन गयी तो कितना बेतरतीब सा और कितना असुरक्षित सा मह्सुश करने लग गया हूँ मैं। 

जो कुछ भी हो , सिर्फ और सिर्फ यही सोच रहा हु कि मैं कभी भी किसी कि भी खुशियों को नज़र नहीं लगा सकता , कभी भी नहीं , कभी नहीं चाहे  मेरी खुशियां ख़तम ही क्यों ना हो जाये और चाहे क्यों न मैं कुछ भी मह्सुश करना ही बंद कर दूँ.

Tuesday, December 10, 2013

इम्तेहान

कभी कभी इम्तेहान देता रहता हु , खुद के होने का इम्तेहान , कभी चुप रहकर और कभी तो खुद पर हंसकर।  सच तो ये है कि इतनी टेंशन है जिंदगी में कि अगर हर चीज़ को सीरियसली लिया जाये तो जिंदगी बहुत कड़वी हो जायेगी। हम कभी कभी तो इंसान कि तरह व्यव्हार करते है , और कभी मशीन कि तरह।  पर सच तो ये है कि इंसान बन कर रहना बहुतो को परेशां कर सकता है , फिर बेहतर होता है कि मशीन ही बने रहो , लेकिन ऐसा भी नहीं हो सकता ना,

बस हँसते रहो , झेलते रहो :)  

Wednesday, December 4, 2013

दम दम मलंग मलंग , है इश्क़ मेरा

दम मलंग मलंग, दम दम मलंग मलंग , है इश्क़ मेरा
इश्क़ लबो पे , इश्क़ दुआ में ,
जिस्म में, रूह में ,इश्क़ रवा रवा रवा ,
इश्क़ नज़र में इश्क़ बशर में.
अक्श में रक्श  में , इश्क़े निशां निशां  निशां। .
दम मलंग मलंग , इश्क़ है मलंग मेरा। …


वास्तव में इश्क़ तो रूहानी होता है , और अब इश्क़ को मलंग का शब्द दिया है। ।शायद ये मलंग शब्द सूफी है। सूफियो ने इसे अपना अहसास दिया है तो ये गाना बहुत प्यारा बन बैठा है। सच तो ये है इश्क़ को कोई सा भी नाम दे दो, इश्क़ तो इश्क़ ही रहेगा। आवारा इश्क़ , बंजारा इश्क़ और पता नहीं क्या क्या। सबसे बड़ी बात तो ये है कि आप इस मलंग इश्क़ को कैसे मह्सुश करते हो। और जब आप इश्क़ में होते हो तो शायद खोना , पाना बड़ी बात नहीं होती , और जब ये सोचते हो के ऐसा क्यों हो रहा है तो फिर वो इश्क़ मलंग नहीं रह पाता , सच तो ये है कि वो इश्क़ ही नहीं रह पता। बस इश्क़ में इश्क़िया। ..

Sunday, November 3, 2013

Prisoner of past

पिछला लेख लिखे करीब  महीने भर हो गए। यहाँ आये हुए महीने और 10 दिन हो गए। पता ही नहीं चलता ही के जिंदगी कैसे निकलती चली जाती है।  सब कुछ छूटता सा चला जाता है और जिंदगी अपनी मौज में आगे बढ़ती चली जाती है।  पीछे अगर कुछ छूटता है  तो  सिर्फ यादें।  कुछ बुरी यादें  फिर कुछ अच्छी यादें। हमेशा   से मेरी आदत रही है कि बुरी चीज़ों को और बुरी यादों को छोड़ कर आगे बढ़ता चला जाऊ।  पर शायद ये हो नहीं पाता , हम हमेशा prisoner of past बने रहते हैं , भुत के गुलाम और शायद हमेशा बने रहेंगे ,पुरानी चीज़ें और बुरी चीज़ें , पुरानी यादें और पुरानी बातें,कहीं न कहीं , कभी न कभी आपके वर्तमान को परेशां करती रही है और हमेशा से करती रहेंगी, हम भाग नहीं सकते और न ही भूल सकते है।

लेकिन हम ऐसे भी तो जिंदगी नहीं गुजार सकते न। सब कुछ जो गया बिता है आखिर वो हमारे वुजूद का हिस्सा होता है , आपके होने का सबब , the proof of your existence . anyway जिंदगी तो ऐसे ही यादों से बनती चली  जायेगी , कुछ नए लोग आपकी जिंदगी का हिस्सा बनते चले जायेंगे और कुछ पुराने लोग छूटते चले जायेंगे।

आज दीपावली है और सोच रहा हु कि शायद कितने सालो से दीपावली में अपने घर पर नहीं हूँ , गुस्सा आता है कि क्यों मैं ये जॉब कर रहा हूँ , घर से इतनी दूर के किसी त्यौहार में घर नहीं जा पाता , अकेला हूँ और ऐसा लग रहा है कि मुझे mummy -papa के पास घर में होना चाहिए , पर कुछ कर भी नहीं सकता न। सिवाए बोर होने के और गुस्सा होने के।  लेकिन इस से तो खुद का ही नुकसान करूँगा ना।

एक अच्छी चीज़ तो ये है कि अभी चुन्नी लाल सर आये थे और दीपावली अपने घर में मानाने का आमंत्रण दे गए , अच्छा लगा यार , इस अनजाने प्रदेश में जब कहीं से भी अपनेपन की थोड़ी सी बू आती है तो ऐसा लगता है जैसे पूरा संसार मिल गया हो। चलो कोई ना happy Dipawali  

Thursday, October 3, 2013

शुभ प्रभात सांचौर।

शुभ प्रभात सांचौर। शायद ये शब्द कहने मे मुझे १० दिन लग गए। थोडा वक़्त तो लगता है न किसी भी नए चीज़ को , नयी जगह को , नए परिवर्तन को स्वीकार करने में। और शायद ab main स्वीकार करने लगा हूँ सांचोर को, और अपनी प्यारी ब्रांच बिछावाड़ी को।  हाँ खुश होने के लिए स्वीकार करना जरुरी है , और तब ही आप अपनी जिंदगी को सही चला सकते है क्यूनी आप न तो भूतकाल में जीते है और न ही भविष्य काल  में, आपको जीना पड़ता है वर्तमान में , और आपको सिर्फ और सिर्फ अपने वर्तमान को बेहतर बनाना होता है..

25 th Sept, सुबह 10 बजे जब मैं निम्बहेरा से चला सांचौर ।  अपनी प्यारी बाइक पे मैं निकल पड़ा था अपनी मंजिल की तरफ, सांचोर , डोरिया चौराहा तक मैं शायद कांपता रहा, 15 km/ hour की स्पीड से मैं निकल रहा था , पर डोरिया से निकलते ही दिमाग में एक ही चीज़ वापस आई कि बस अब तो आगे की तरफ ही चलते जाना है। फिर उदयपुर , तेज बारिश में भींगता हुआ, फिर गोगुन्दा , स्वरूपगंज और अबू रोड , अबू रोड में चाय पी , और फिर आगे बढ़ चला सांचोर की तरफ , चम्बल की हरी भरी घाटी , फिर अरावली के पर्वत को छोड़ता हुआ मैं थार के , मारवाड़ के रेगिस्तानी इलाके में जा रहा था ! कहाँ हरे भरे खेत और कहाँ सिर्फ कीकर की झाड़ियाँ, शाम के 6.30 बजे मैं संचोरे पहुँच चूका था , और उसी होटल के कमरे से ye सब लिख रहा हूँ जहाँ मैं रुका। पुरे 8 घंटे का सफ़र बाइक पे मैंने पहली बार तय की, शायद mera पैर और पीठ भी पूरा दुखने लग गया था।

एक अजीब सा डर , मन को परेशां किये जा रहा था की पता नहीं जगह कैसा होगा , ब्रांच कैसी होगी, लोग कैसे होंगे। साँचोर मुख्य ब्रांच में भी मैं उसी दिन हो आया, लगा की जगह ठीक ठाक  है तो सब कुछ सही ही होगा। अगली सुबह मैं अपनी ब्रांच के लिए चला , जहाँ शायद मेरे किस्मत के अगले 2 ya ३ साल लिखे जाने है ,26 की सुबह जब मैं बिछावाड़ी के लिए चला तो मैंने कुछ भी खाया नहीं था , एक कसबे की उम्मीद कर के मैं जा रहा था की वही कुछ खा लूँगा।  पर जैसे जैसे मैं आगे बढ़ता गया मेरा दिल बैठता चला गया , एक छोटा सा देहाती, अर्ध रेगिस्तानी क़स्बा , और जब ब्रांच पहुंचा , मेरा दिल रोने को हो आया , लगा की कहाँ आ गया मैं , कहाँ मुझे फंसा दिया गया , फिर पीने  को पानी भी नहीं , मेरा मन ,मेरा दिल, और मेरी इच्छा सब कुछ बैठता सा गया , दिन भर गला रुंधा सा रहा, ३, ४, लोगो से बात भी की , और sabne यही कहा की नए नए हो २,४ दिनों में सेट हो जाओगे फिर सब कुछ अच्छा लगने लगेगा , मौज करो तुम तो वहां पे , पर शायद मेरी उस दिन की मनः स्थिति को कोई समझ नहीं पा रहा था , लेकिन  आज जब मैं यहाँ ९ दिन गुजर चूका हु , मुझे lagta है की सब सही थे यार, मेरा मन यहाँ लगना शुरू हो गया , लोग यहाँ अच्छे है , स्टाफ सपोर्टिव है और फालतू की मगजमारी नहीं है यार , आप आराम से ब्रांच यहाँ 5.30 तक बंद कर सकते हैं , बाकि का वक़्त तो आपका है।  फिर मैंने यहाँ देखा की एजेंट्स का बोलबाला है , लेकिन ये सब भी बंद हो सकता है।  एक सबसे अच्छे और बड़ी बात जो मुझे महसूस हुई ये की शायद मैं यहाँ जी सबसे निचला तबका है , सबसे गरीब और निरक्षर उनकी सेवा कर पाउँगा।

बस अब इतने दिन यहाँ गुजरने के बाद बहुत हल्का और फ्री महसूस कर रहा हूँ , २६थ की और आज के मनः स्थिति में अमूल चुल परिवर्तन हुआ है , और शायद एकदम ही परिवर्तित हो गया है।  ब्रांच में लोकेश, प्रेम के साथ वैसा ही रिश्ता बन गया है जैसा शायद कृष्णा और प्रमोद के साथ था , और शायद इसी वजह से यहाँ अच्छा महसूस करना शुरू कर चूका हूँ , 20 किमी बाइक चला कर आने और जाने में थोड़ी परेशानी जरुर होती है , लेकिन ये थोड़े दिनों में एडजस्ट हो जायेगा।  बस यही लिख कर सांचोर मैं तुम्हे नमस्कार करता हूँ की अगले कुछ दिन , जब तक मैं यहाँ हूँ , अच्छे गुजरे , खुशगवार गुजरे , बस और क्या , इतनी छोटी सी कामना तो मैं कर ही सकता हूँ न यार .      

Tuesday, September 24, 2013

`अलविदा निम्बाहेड़ा। ...

पता नहीं क्या कहूँ , या समझ में ही नहीं आ रहा के कैसे तुझे थैंक्स कहूँ। अपनी जिंदगी के २ सबसे कीमती और सबसे महत्वपूर्ण साल मैंने यहाँ गुजरे ,मेरे 25th और 26th years  …मुझे याद आता  है वो 1st अगस्त 2011 का दिन जब मैंने निम्बहेरा ज्वाइन किया था, तब तो शायद  मैं बहुत डरा हुआ था , सिर्फ ये सोचकर के के पता नहीं यहाँ कैसे दिन गुजरूँगा।  छोटी जगह , और पता नहीं यहाँ कुछ सुविधा हो भी या न हो। फिर फिर यहाँ आते ही मैं रजनीश सर से मिला और दो दिन में ही ऐसा लगा की शायद बहुत अच्छी जगह में हु  और धीरे धीरे यहाँ एडजस्ट होता चला गया।  आर के जैन सर और फिर सोनी सर , भगवान का आशीर्वाद रहा की मुझे इतने अच्छे सर मिले जिन्होंने जिन्दगी का और बैंकिंग में रास्ता दिखाया।
शुरुआत में तो मैं बहुत परेशां सा रहा , कुछ समझ  में ही  नहीं आता था कि क्या करना है और कहाँ जाना है।  सुरुआत के पुरे महीने तो मुझे मकान ही नहीं मिला था , लेकिन धीरे धीरे सब कुछ व्यवस्थित होने लगा ! जिंदगी के बहुत सारे चीज़ मिले तो शायद जिंदगी का पहला था, मेरा पहला bike मेरा पहला टीवी , मेरा पहला फ्रिज और पता नहीं क्या क्या पहला। इतनी तो इबादत जरुर करूँगा तुम्हारी के तूने बहुत कुछ बक्शा मुझे बहुत कुछ।
जब ब्रांच से परेशां होने लगा तो फिर मुझे agri वाली सीट मिल गयी, जहाँ मैंने दिल खोल कर काम  किया और sirf यही नहीं पुरे ब्रांच का कम किया , mast होकर  काम  करना और पूरी बेफिक्री से लेकिन पूरी ईमानदारी से , मैंने यही पे सीखा, kitna भी टेंशन क्यूँ न हो  मस्त रहना है. और फिर जिन्दादिली भी।

२१ नवम्बर को मैं कृष्णा से और प्रमोद से मिला। और तब से जिंदगी में अच्छे बदलाव आने भी शुरू हो गए क्यूँ शायद हमउमर वालो का साथ सबसे शानदार होता है, फिर मिला मैं पवन गोयल से। साथ ही साथ कितने लोग आते रहे जिंदगी में।  ब्रिजेन्द्र , ब्रिज वीर, हम खाते पीते और खूब मस्ती करते रहे क़ुच लोगो के बारे में जरुर लिखूंगा।

कृष्णा, मस्त एकदम भगवन कृष्णा की तरह , मदमस्त अल्हड , लेकिन बहोत साफ दिल, और नेक , सच कहता हु भगवन ने ऐसा दिल सिर्फ कुछ लोगो को ही वरदान दिया है. कम में थोडा ढीला जरुर है लेकिन कभी किसी का भी बुरा नहीं सोचता।  हमेशा अच्छा करने का सोचता है और यही तो बड़प्पन है,  इतना जिम्मेदार बंदा  इस उम्र में बहोत कम लोग होते हैं ,अपने सारे  छोटे भाई बहनों को साथ में रखकर पढाना  लिखना बहुत बड़ी बात होती है, uski  पूरी सैलरी ख़तम  हो जाती  है लेकिन वो कभी कुछ भी शिकायत  नहीं करता जिंदगी से, बिना बोले त्याग , शायद ये uske liye बहोत बड़ा ward होगा और शायद मेरे लिए भी , लेकिनह शायद ये सच है की ये उसका बहोत बड़ा virture है। मैंने बहुत कुछ सीखा भी है उस से और ये दुआ करता hun की जहाँ भी रहे अच्छे से रहे अच्छा कम करे और बहुत आगे  जाये।  मुझे लगता है वो जिंदगी से बहुत कुछ deserve करता है। बहुत साडी अच्छी दुआ मेरे तरफ से उसके लिए।

प्रमोद , अच्छा यार बुरा ज्यादा मायने  कभी नहीं रखता, वो बिना किसी पार्टी में शरीक होते हुए भी हमारे लिए सबकुछ करता रहा , मैं उसकी सबसे बड़ी बात मानता हूँ ,कभी भी किसी बात का बुरा नहीं मानता , बस सब कुछ करता जाता है , एक कमजोरी देखि मैंने की वो बहोत मेहनत करता है फिर भी किसी चीज़ को अंजाम तक पहुंचाते पहुंचाते अटक जाता है , और शायद ये उसकी सबसे कमजोर कड़ी  है, अब भी मैं यही कहता हूँ प्रमोद किसी भी कम को हाथ में ले तो उसे अंजाम तक पहुंचा। प्रमोद के लिए यही दुआ है की बहोत जल्दी ही बहोत जल्दी आगे की तरफ जाये।

 फिर दिसम्बर 2011 का दिन , फिर जनवरी 2012, मुझे याद भी आता  है अपना 25th B'day on 7th January 2012 . पता है कभी कभी आपकी जिंदगी में अच्छे लोग आते है तो कुछ बुरे लोग भी , पर सच तो ये है की कोई बुरा नहीं होता। .everyone is bounded with their situations ..sometimes u get frustrated for everything..and then u started to ask question....n what I did , I never asked any questions to GOD or anyone...and that was the only best part from me..."Aceept whatever comes in your life, in the same form as it comes"......
ha ha ha ...I remember Swami Sukhbodhanand ...Suffer, and when u suffer, suffer joyfully.....any way ek bad caption yad aa gaya mujhe..  "जिंदगी को कुछ तरह आसान कर लिया हमने , कुछ से माफ़ी मांग ली और कुछ को माफ़ कर दिया।  " और सच में एक बन्दे से मैं माफ़ी मांगता हूँ , लेकिन शायद माफ़ी के काबिल भी नहीं होऊंगा ,मेरी वजह से जो दुःख उसे पहुंचा और जो तकलीफ पहुंची उसका शायद एक कतरा भी मैं अपनी माफ़ी वाले शब्द से वापस नहीं ले पाउँगा। बस इतना ही कहूँगा , "मन की किताब से तुम , मेरा नाम ही मिटा देना , गुण तो न था कोई भी , अवगुण मेरे भुला देना "

ठीक उसी वक़्त निम्बहेरा ने मुझे एक अच्छी सौगात दी।  दीदी की शादी पक्की हो गयी और बड़े अच्छे से हो गयी , बुरा तो ये भी रहा की एन वक़्त पर दादाजी नहीं रहे। . बाबा मैं अभी भी आपको बहुत याद कर रहा हूँ।   दीदी की शादी के बाद का आया हुआ मैं घर गया ही नहीं , पुरे साल भर ऐसा ही चलता रहा , निम्बहेरा ने एक और सौगात दी भैया की शादी भी हुई , और तब मैं घर गया पुरे साल भर बाद।
फिर गुप्ता सर मिले , सब कुछ मस्त सा चलने लगा , हमने  खूब सारी पार्टियाँ की और खूब कम भी किया। गुप्ता सर का स्नेह और आशीर्वाद बना रहा मुझपर ,और श्रीवास्तव सर , जिनके बारे में कुछ भी लिखूंगा तो कम पड़ेगा।  इनके स्नेह और आशीर्वाद से २ साल कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला। अभी ३ दिन हो गए मुझे निम्बहेरा छोड़े हुए , लेकिन अब भी वह की खुशबु बरक़रार है , और मुझे लगता ही की ताउम्र ये बरकरार रहेगी , मैं अपने साथ हुई har अच्छी चीज़ को याद  रखना चाहूँगा और जो कुछ भी यहाँ बुरा हुआ मेरे साथ वो तो मैं कबका भूल चूका हूँ।

मालीवाल जी , हमेशा लड़ जाता था मैं और वापस thodi देर में उन्हें हंसाकर आता था ,रण सिंह जी को याद करना चाहूँगा , जय भोले , विनोद सोनी , मस्त बंदा  है , पंडत जी , जिन्होंने मुझे सिंगल से डबल होने का आशीर्वाद कभी नहीं दिया , हा हा हा , फिर सुरेश जी , बहुत बढ़िया वक़्त गुजरा सुरेशजी के साथ ,और वो अब भी याद  करते हैं , हेमंत , जिस से मैंने बेफिक्री सीखी , अरे सर टेंशन क्यों लेते हो , सबकुछ होता रहेगा , बैंक का काम तो होता रहेगा। एक बंदी आई, शीतल, सच तो ये है की मैंने उसे कुछ भी नहीं सिखाया, but मैंने उससे सीखा , बहुत कुछ , जिंदगी के बारे में , जिम्मेदारियों के बारे में और भी बहोत कुछ। फिर भराडिया सर , और शर्मा सर , शुक्रगुजार हूँ की इतने अच्छे लोग मिले मुझे। जाकिर भाई भी बहोत याद आयेंगे मुझे , ब्रांच के बहार बहुत वक़्त  गुजारा है।  हर चीज़ में साथ दिया ! कैलाश जी भी , पुराने दिनों के चालान , हा हा हा और फिर unka दिया हुआ सब आईडिया ,
ले लो न जी साब।  खुद सब को कुछ न कुछ बक्श्ता है।  और गार्ड्स में विनोद जी , भोला , कभी कभी मैं iritate ho जाया करता थे लेकिन end  में उनका बहुत अच्छा होने सब chizo पे bhari pad जाया करता है। last में हुई एक buri चीज़ ने मुझे बहोत परेशां किया और मुझे khud को gira हुआ सा mahsush हुआ, पर thode दिन में लगा की उस bande में bachpana है , और शायद अच्छे बुरे की और इस duniya की समझ नहीं है , हमेशा कहा करता था की उसे protect करने की jarurat है duniya की buraion से और mujh पर ही ilzam , khair जो भी हुआ मेरे लिए एक सबक ही था ,मैंने अब भी यही कहता हूँ बचपना है और उसने जो कुछ भी कहा किया उसके लिए मेरे मन में द्वेष नहीं है , मैं अब भी उसे सलाह दूंगा की अच्छे बुरे की पहचान करना सीखे।

और अंत में एक एक बहुत प्यारी वजह,कुछ नहीं लिखूंगा ।  और कुछ भी इसलिए नहीं लिखूंगा की , मुझे बहुत कुछ अभी लिखना है और शायद जिंदगी भर।कुछ न कुछ तो लिखता रहूँगा न यार जिंदगी भर, अच्छा या बुरा। अच्छी चीज़े तो मैं हमेशा संजोता हूँ , और बुरी सबकुछ भूल जाता हु।  ।

अलविदा निम्बाहेरा , फिर मिलेंगे  और जरुर मिलेंगे , इसी वादे के साथ,

बीच राह  में दिलबर, बिछड़ जाये कहीं हम अगर ,और सूनी सी लगे तुझे जीवन के ये डगर।
हम लौट आयेंगे , तुम यु ही बुलाते रहना ,
कभी अलविदा न कहना, कभी अलविदा न कहना।




निष्पृह