Monday, November 5, 2012

अच्छा -बुरा


तुम बुरे होने का नाटक कर सकते, पर बुरे नहीं हो सकते ...
तुम अच्छे होने का नाटक कर सकते हो , पर अच्छे हो नहीं सकते ...
अच्छा और बुरा , तुम्हारे खुद के होने पे होता है , नाटक पर कभी नहीं ...

Saturday, October 20, 2012

बड़ी वाली बकलोली...


खाली बैठा हू और काफी दिनों से कुछ लिखा भी नहीं , अपने विचारो को शब्दों का मूर्त रूप देने का ये बढ़िया वक़्त होता है जब आप खाली  बैठे हो ...तो सोचा क्यूँ न कुछ बकलोली किया जाये , ऐसे भी आजकल मैंने खुद को खुद में ढाल लिया है , न कहीं आता हू न ही कहीं जाता हू बस कमरे को ही मैंने अपनी जिंदगी बना लिया है , और ऐसे में लिखना  बड़ा सुकून देता है और सब से बड़ी बात तो ये की  वक़्त बड़े आराम से गुजर जाता है ...

कुछ पत्रिकाए पढ़ रहा हूँ , आहा जिंदगी , हाँ इसके  पिछले  अंक कृष्ण और इश्क पे थे और इस महीने ये  दर्शन पर केन्द्रित  है , महान दार्शनिक सुकरात पर बहुत कुछ लिखा है . अच्छा लगता है ये जानकर के हज़ार साल पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य पर खुद को स्वाहा कर दिया...कहा  है न पाने से बड़ी चीज़ तो खोना होता है ...जो खोया सो पाया ....

पर साला अब खोना अब कहाँ होता है बस पाने की दौड़ बाकी है और बस इसी पाने की दौड़ में पूरी दुनिया भागी जा रही है , खोने का सिद्धांत  ही निरर्थक हो गया है..बस पाना है चाहे जैसे भी हो.. पैसे , प्यार, हर सांसारिक सुख और तो और अब भगवान को भी लोग जैसे तैसे पाना चाहते है ..खोना कहाँ है ..और यहीं पर पता हू थोडा आत्मिक सुकून , भक्ति , कुछ दिन पहले जगतगुरु कृपालु जी महाराज की शिष्य के प्रवचन पे गया था ...लगा अब भी थोडा खोने का भाव बाकी   है , खुद को खोने का ..निःस्वार्थ ,अपने आप को कृष्ण पे लगा देना , बिने कुछ पाने की कामना किये ..और यह बड़ा परम भाव है ..रामानुज का विशिष्टाद्वैत भगवन और भक्त  को ऐसे ही देखते हैं जैसे सूर्य और सूर्य से प्रदीप्त  प्रकाश रश्मियाँ .पर हम जैसे लोगो को कभी कभी  तो चार्वाक का दर्शन ही जीवन दर्शन सा लगता है , यावत जीवेत , सुखं जीवेत ....पापी हो या पुण्यात्मा , सूर्य कभी भेदभाव नहीं करता , सामान भाव से प्रकाश  देता है और जल भी किसी पापी को उतना ही मिटा लगता है जितना किसी पुण्यात्मा को ..मतलब कर्मा का कोई मतलब नहीं होता और प्रारब्ध सिर्फ ब्राह्मणों के दिमाग की उपज..जीवन एक ही बार मिलता है और फिर सब कुछ यही पर ख़तम ..तो फिर वर्तमान में जियो ..पुनर्जन्म जैसी  कोई चीज़ ही नहीं होती और न ही पाप पुण्य जैसे कोई चीज़ ..जो अच्छा लगे खुद को वही करो , पाप पुण्य से ऊपर उठाकर , समाज और संस्कार से ऊपर उठकर  .....साला ये तो भ्रस्त  कर देगा ..हाँ पर यही तो चीज़ है जो इन्सान के अन्दर सदियों से बैठी दबी कुचली इच्छाओं को बाहर की तरफ लती हैं ..और फिर ओशो तो यही कहते हैं , न तो कुछ अच्छा होता है और न ही बुरा . ये सब कुछ इन्सान का खुद का गढ़ा  बुना है। जो तुम्हे अचछा लगे बस वही करो  .यार ये दर्शन भी पता नहीं कहाँ खिंच लता है ..अगले पच्चीस सालो तक बहुत बकलोली करनी पड़ेगी तभी दर्शन पर कुछ लिख पाउँगा ...

पर हाँ  इश्किया होने के लिए इतने लम्बे इन्तेजार की जरुरत नहीं..क्योंकि यहाँ कोई भावना सदियों से दबी कुचली हुई नहीं है और न ही उसे ऐसे रहने की जरुरत पड़ी , जब भी और जहा भी इसे लगा , खुलकर बाहर आ गयी ..अब देख लो कृष्ण और राधा ...और सदियों के बाद मीरा , और  मैं खुशकिस्मत के मीरा की नगरी में बैठा हूँ , जहाँ के जर्रे जर्रे में मीरा का असीम प्रेम है , कृष्ण के लिए , मीरा मंदिर का चक्कर भी कभी कभार लगा आया करता हूँ , चित्तौड़  में और एक साधिका है जो वही मीरा के सबद सुनाती  है , और मैं चुपचाप  कोने में बैठकर सुना करता हूँ...मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥...और  "मीरा" के प्रभु गिरधर नागर, हरस हरस जश गायो।.....बस बस ..यही तो सुकून है , खुद का खो जाना ..और क्या ..फिर मोबाईल की घंटी बजती है और मैं वापस इसी दुनिया में आ जाता हूँ , वही बैंक और वही वीभत्स जालिम दुनिया , वही मैं और तुम ...

पर सच बताऊँ  तुम्हारा होना भी बहुत मायने रखता है , और मुझे तो कभी किसी दूसरी दुनिया में जाने की जरुरत ही नहीं पड़ती , जब तुम पास होते हो ..हाँ मेरी दूसरी , तीसरी और चौथी दुनिया भी तुम्ही हो ..हर गम , दुःख अवसाद , सब कुछ तुम्हारे पास आते ही छू मंतर , ये जादू नहीं तो और क्या है ..सब कुछ अच्छा सा लगने लगता है सब कुछ अच्छा  सा होने लगता है ...रंग बिरंगी ये दुनिया और भी हसीं हो जाती है .हाँ जब तुम पास होते हो ..और कभी कभी तो ऐसे सिर्फ तुम्हारे पास होने के अहसास से ही होना शुरु हो जाता है..ये भी बड़ी नेमत है खुद का इशिकिया होना और इसके लिए बड़ा अनुभव भी जरुरी  नहीं  ..बस अन्दर से एक आवाज आनी चाहिए  इश्किया इश्किया ....कुछ दिनों पहले एक दोस्त से बाते कर रहा था ,  और वो अपने एक दोस्त की बाते मुझे सुनाये जा रहा था , मैंने कहा यार वो तेरे लिए इतना कुछ करता है , सब सहता है सब सुनता है फिर शायद हदों तक तुमसे मुहब्बत भी , फिर तुम क्यों नहीं सोचते उसके बारे में ...और पता है उसका उत्तर क्या था ..यार उसके लिए ये आवाज ..इश्किया इश्किया वाली अन्दर से कभी आती नहीं ...हा हा हा ..सच है यार ये आवाज तो अन्दर से आनी चाहिए ..ड्रम ढोल और नगाड़े भी बजने चाहिए , पर नहीं बजती तो इसका कुछ किया भी नहीं जा सकता ....माहौल  भी तो बदलना चाहिए ...ये नीरस जगह कब एस्किमो वाला  टुन्ड्रा प्रदेश में बदल जाये या फिर अफ्रीका का वाइल्ड लाइफ सफारी ...पता नहीं न ..पर ये तो होना चाहिए न ..पर भावनायो में सच्चाई होनी चाहिए , कामना नहीं ..और यही कामना तो हर जगह इन्सान को गिरा देती है , जहाँ कामना आया , वह से इश्किया गायब, भाग जाता है ये इश्किया भी......इतने सालों  से तुम्हे देख रहा हूँ ....एक चीज़ जो अब तक नहीं बदली है  वो है ...No Demand , No Expectation and No Complaint ..जहाँ  भी रहा मैं और जो कुछ भी सही गलत किया मैंने ....तुम्हारी ये No Demand , No Expectation and No Complaint वाली चीज़ हर वक़्त मुझे हरा देती है ...कभी कोई शिकवा नहीं, कोई गिला या शिकायत नै , सब कुछ स्वीकार होता है तुम्हे ...और यही से तो रूहानी शुरुआत होती है इश्किया इश्किया वाली...कुछ रूहानी और कुछ रूमानी सी..

कहा न की आज मैं बड़ी वाली बकलोली करने वाला हू ..हा हा हा







Monday, October 8, 2012

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती ...अजमेर

 पीर साब के दरबार में ये मेरी दूसरी हाजरी थी ...पिछले साल जनवरी में मैं गया था , उस वक़्त भी जय मेरे साथ था और इस बार की भी दस्तक उसी के साथ ...कोई प्लान नहीं बस जाना है तो जाना है , शम्भू  भी आया था जयपुर और मैंने कहा भी की अजमेर आ जाये ..ख्वाजा के दर पर ..पर एन मौके पर उसकी तबियत ख़राब हो गयी ..और आज जब पता चल रहा है की उसकी तबियत बहुत ही ख़राब हो गयी है ..

सच कहूँ तो दरगाह  के अन्दर बहुत शांति महसूस होती है , बहार के कोलाहल से अनादर का वातावरण एकदम से शांत ..मैं बैठ जाता हु चुपचाप , एकदम शांत , बाहर और अन्दर भी...बस कव्वाली की आवाज आ रही है ..पुरसुकून है ...सूफियो में बड़ी ताकत होती है ..और ये ताकत महसूस कर रहा होता हु ..सजदे  में खुद ब खुद सर झुक जाता है और दुआ में हाथ खुद ब खुद उठ जाते हैं..यहाँ हिन्दू होना या मुसलमान होना कोई भी मायने नहीं रखता ...मायने रखता है तो सिर्फ खुद का खुद होना ...सूफी संतो में और भक्ति संप्रदाय के संतो में यही समानता है ..खुद को खुदा के साथ मिला देना ...और और महसूस करना बहुत बड़ी नेमत है .....

अब देखता हूँ छोटी सी दुआ की है पता नहीं कब तक कुबूल होती है और कब तक मुझे दरगाह पर जाने का तीसरा मौका मिलता है .......ख्वाजा मेरे ख्वाजा ...

Tuesday, September 18, 2012

I don't ask questions , I just accept the answers...

People use to ask me, why I don't ask questions, to God or to anyone ...and you know What I say....simply..
I don't ask questions , I just accept the answers...

Yar , Life becomes too easy, when u accept everything in the same form as it comes... whether It's happiness or sorrow, pain or comfort. I assume each and every emotions has it's own importance  in the Life...Love or hate , honesty or cheating ..everything has it's own essence..and we must accept every such human emotion..
And you you know, when problem starts...when we start to ask questions ,  why, why me, etc, etc...hay u were chosen one , destiny's child...So why to ask questions...Nature gives u some some answers...Just accept those answers..And see how life seems beautiful.....

ho ho ho..as my tagline goes...How beautiful life is....It's beautiful yar, it's colorful..only u have to know how to live ..how to enjoy each and every moment..

Saturday, September 15, 2012

ऐसा कैसे हो जाता है ....


पता नहीं मैं कभी कभी ऐसा कैसे बोल जाता हूँ , आज सुबह पवन आया था ब्रांच में , मैं तो ऐसे ही निरपेक्ष रहता हु ,  पर पता नहीं मुझे क्या हो गया था , बहुर बुरे शब्दों का इस्तेमाल कर दिया मैंने उसके लिए और उसके सामने ही , थोडा गुस्सा निकल गया, पर उसके जाने के बाद मुझे बहुत ही ख़राब लगने लगा , पता नहीं क्यों , रोने का मन होने लगा , लगा की फुट फुट कर रो पडू , मैं ऐसा किसी को कैसे बोल सकता हु, क्यूँ मैं किसी भी चीज़ के लिए किसी को भी  दोषी ठहरा  सकता हूँ , पता है पवन खुद ही टेंशन में है और मैंने ऐसा बुरा बोलकर उसे बहुत तकलीफ पहुंचा दिया ..पता नहीं मेरे अन्दर का इंसानियत थोड़े देर के लिए कहा मर जाता है , मैं खुद ही कहा करता हूँ कोई कोई भी बुरा नहीं होता , फिर मैं क्यों  बुरा सोचने लगता हूँ , क्यों किसी को hurt करना शुरू कर देता हूँ ..ऐसा लग रहा है  की मैं अभी जाऊ और पवन से अपने शब्दों के लिए माफ़ी मांगू.....

जो भी हो , अब मुझे ध्यान रखना है , जो होना होता है वो तो हो ही जाता है और जो चीज़ गुजर गई हो उसे सुधारा भी नहीं जा सकता , लेकिन भविष्य में इसका ख्याल रखा जा सकता है की मैं अपने शब्दों से किसी को आहत न करू ..बस भगवन से माफ़ी मांगता हूँ की क्यों मैंने पवन को हर्ट किया , भगवन , मुझे माफ़ करो ...

Thursday, September 13, 2012

मन की किताब से तुम, मेरा नाम ही मिटा देना.......

मन की किताब से तुम, मेरा नाम ही मिटा देना.......

बंदिनी फिल्म का ये गाना , जिसे गुलज़ार साब ने लिखा है, जब भी सुनता हूँ एक अजीब सी हलचल  सी मच जाती है ..पता नहीं किस भाव से लिखा गया गया है ये song और उसी शिद्दत से गाया भी  गया है ...
कहते है न कि, अपने आप को स्वीकार करना बहुत मुश्किल भरा काम है, अपनी अच्छाइयों से इतर अपनी बुराइयों को स्वीकार करना , शायद ये इंसानों से तो संभव नहीं है ...

मैं सब कुछ भूल कर  वर्तमान में जीने लगता हु ,खुश और मस्त ,पर  आज कुछ लोगो से मिला तो ये अहसाह हुआ , अपने बुरे होने का , और ये भी महसूस भी हुआ ....जब आप खुद को किसी और कि जगह पर रख कर देखते हैं तब ही आपको उस बन्दे की  तकलीफ , दर्द  का अहसास होता है, दुःख तो तब और होता है जब न चाहते हुए भी  आपकी वजह से कोई दुखी हो, आपकी वजह से किसी की मुस्कराहट छिन जाये ...... कुछ नहीं बस इतना ही कह सकता हूँ ....

मन कि किताब से तुम , मेरा नाम ही मिटा देना 
गुण तो न था कोई भी , अवगुण मेरे भुला देना ..
अवगुण मेरे भुला देना .....................................

निष्पृह