Tuesday, September 24, 2013

`अलविदा निम्बाहेड़ा। ...

पता नहीं क्या कहूँ , या समझ में ही नहीं आ रहा के कैसे तुझे थैंक्स कहूँ। अपनी जिंदगी के २ सबसे कीमती और सबसे महत्वपूर्ण साल मैंने यहाँ गुजरे ,मेरे 25th और 26th years  …मुझे याद आता  है वो 1st अगस्त 2011 का दिन जब मैंने निम्बहेरा ज्वाइन किया था, तब तो शायद  मैं बहुत डरा हुआ था , सिर्फ ये सोचकर के के पता नहीं यहाँ कैसे दिन गुजरूँगा।  छोटी जगह , और पता नहीं यहाँ कुछ सुविधा हो भी या न हो। फिर फिर यहाँ आते ही मैं रजनीश सर से मिला और दो दिन में ही ऐसा लगा की शायद बहुत अच्छी जगह में हु  और धीरे धीरे यहाँ एडजस्ट होता चला गया।  आर के जैन सर और फिर सोनी सर , भगवान का आशीर्वाद रहा की मुझे इतने अच्छे सर मिले जिन्होंने जिन्दगी का और बैंकिंग में रास्ता दिखाया।
शुरुआत में तो मैं बहुत परेशां सा रहा , कुछ समझ  में ही  नहीं आता था कि क्या करना है और कहाँ जाना है।  सुरुआत के पुरे महीने तो मुझे मकान ही नहीं मिला था , लेकिन धीरे धीरे सब कुछ व्यवस्थित होने लगा ! जिंदगी के बहुत सारे चीज़ मिले तो शायद जिंदगी का पहला था, मेरा पहला bike मेरा पहला टीवी , मेरा पहला फ्रिज और पता नहीं क्या क्या पहला। इतनी तो इबादत जरुर करूँगा तुम्हारी के तूने बहुत कुछ बक्शा मुझे बहुत कुछ।
जब ब्रांच से परेशां होने लगा तो फिर मुझे agri वाली सीट मिल गयी, जहाँ मैंने दिल खोल कर काम  किया और sirf यही नहीं पुरे ब्रांच का कम किया , mast होकर  काम  करना और पूरी बेफिक्री से लेकिन पूरी ईमानदारी से , मैंने यही पे सीखा, kitna भी टेंशन क्यूँ न हो  मस्त रहना है. और फिर जिन्दादिली भी।

२१ नवम्बर को मैं कृष्णा से और प्रमोद से मिला। और तब से जिंदगी में अच्छे बदलाव आने भी शुरू हो गए क्यूँ शायद हमउमर वालो का साथ सबसे शानदार होता है, फिर मिला मैं पवन गोयल से। साथ ही साथ कितने लोग आते रहे जिंदगी में।  ब्रिजेन्द्र , ब्रिज वीर, हम खाते पीते और खूब मस्ती करते रहे क़ुच लोगो के बारे में जरुर लिखूंगा।

कृष्णा, मस्त एकदम भगवन कृष्णा की तरह , मदमस्त अल्हड , लेकिन बहोत साफ दिल, और नेक , सच कहता हु भगवन ने ऐसा दिल सिर्फ कुछ लोगो को ही वरदान दिया है. कम में थोडा ढीला जरुर है लेकिन कभी किसी का भी बुरा नहीं सोचता।  हमेशा अच्छा करने का सोचता है और यही तो बड़प्पन है,  इतना जिम्मेदार बंदा  इस उम्र में बहोत कम लोग होते हैं ,अपने सारे  छोटे भाई बहनों को साथ में रखकर पढाना  लिखना बहुत बड़ी बात होती है, uski  पूरी सैलरी ख़तम  हो जाती  है लेकिन वो कभी कुछ भी शिकायत  नहीं करता जिंदगी से, बिना बोले त्याग , शायद ये uske liye बहोत बड़ा ward होगा और शायद मेरे लिए भी , लेकिनह शायद ये सच है की ये उसका बहोत बड़ा virture है। मैंने बहुत कुछ सीखा भी है उस से और ये दुआ करता hun की जहाँ भी रहे अच्छे से रहे अच्छा कम करे और बहुत आगे  जाये।  मुझे लगता है वो जिंदगी से बहुत कुछ deserve करता है। बहुत साडी अच्छी दुआ मेरे तरफ से उसके लिए।

प्रमोद , अच्छा यार बुरा ज्यादा मायने  कभी नहीं रखता, वो बिना किसी पार्टी में शरीक होते हुए भी हमारे लिए सबकुछ करता रहा , मैं उसकी सबसे बड़ी बात मानता हूँ ,कभी भी किसी बात का बुरा नहीं मानता , बस सब कुछ करता जाता है , एक कमजोरी देखि मैंने की वो बहोत मेहनत करता है फिर भी किसी चीज़ को अंजाम तक पहुंचाते पहुंचाते अटक जाता है , और शायद ये उसकी सबसे कमजोर कड़ी  है, अब भी मैं यही कहता हूँ प्रमोद किसी भी कम को हाथ में ले तो उसे अंजाम तक पहुंचा। प्रमोद के लिए यही दुआ है की बहोत जल्दी ही बहोत जल्दी आगे की तरफ जाये।

 फिर दिसम्बर 2011 का दिन , फिर जनवरी 2012, मुझे याद भी आता  है अपना 25th B'day on 7th January 2012 . पता है कभी कभी आपकी जिंदगी में अच्छे लोग आते है तो कुछ बुरे लोग भी , पर सच तो ये है की कोई बुरा नहीं होता। .everyone is bounded with their situations ..sometimes u get frustrated for everything..and then u started to ask question....n what I did , I never asked any questions to GOD or anyone...and that was the only best part from me..."Aceept whatever comes in your life, in the same form as it comes"......
ha ha ha ...I remember Swami Sukhbodhanand ...Suffer, and when u suffer, suffer joyfully.....any way ek bad caption yad aa gaya mujhe..  "जिंदगी को कुछ तरह आसान कर लिया हमने , कुछ से माफ़ी मांग ली और कुछ को माफ़ कर दिया।  " और सच में एक बन्दे से मैं माफ़ी मांगता हूँ , लेकिन शायद माफ़ी के काबिल भी नहीं होऊंगा ,मेरी वजह से जो दुःख उसे पहुंचा और जो तकलीफ पहुंची उसका शायद एक कतरा भी मैं अपनी माफ़ी वाले शब्द से वापस नहीं ले पाउँगा। बस इतना ही कहूँगा , "मन की किताब से तुम , मेरा नाम ही मिटा देना , गुण तो न था कोई भी , अवगुण मेरे भुला देना "

ठीक उसी वक़्त निम्बहेरा ने मुझे एक अच्छी सौगात दी।  दीदी की शादी पक्की हो गयी और बड़े अच्छे से हो गयी , बुरा तो ये भी रहा की एन वक़्त पर दादाजी नहीं रहे। . बाबा मैं अभी भी आपको बहुत याद कर रहा हूँ।   दीदी की शादी के बाद का आया हुआ मैं घर गया ही नहीं , पुरे साल भर ऐसा ही चलता रहा , निम्बहेरा ने एक और सौगात दी भैया की शादी भी हुई , और तब मैं घर गया पुरे साल भर बाद।
फिर गुप्ता सर मिले , सब कुछ मस्त सा चलने लगा , हमने  खूब सारी पार्टियाँ की और खूब कम भी किया। गुप्ता सर का स्नेह और आशीर्वाद बना रहा मुझपर ,और श्रीवास्तव सर , जिनके बारे में कुछ भी लिखूंगा तो कम पड़ेगा।  इनके स्नेह और आशीर्वाद से २ साल कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला। अभी ३ दिन हो गए मुझे निम्बहेरा छोड़े हुए , लेकिन अब भी वह की खुशबु बरक़रार है , और मुझे लगता ही की ताउम्र ये बरकरार रहेगी , मैं अपने साथ हुई har अच्छी चीज़ को याद  रखना चाहूँगा और जो कुछ भी यहाँ बुरा हुआ मेरे साथ वो तो मैं कबका भूल चूका हूँ।

मालीवाल जी , हमेशा लड़ जाता था मैं और वापस thodi देर में उन्हें हंसाकर आता था ,रण सिंह जी को याद करना चाहूँगा , जय भोले , विनोद सोनी , मस्त बंदा  है , पंडत जी , जिन्होंने मुझे सिंगल से डबल होने का आशीर्वाद कभी नहीं दिया , हा हा हा , फिर सुरेश जी , बहुत बढ़िया वक़्त गुजरा सुरेशजी के साथ ,और वो अब भी याद  करते हैं , हेमंत , जिस से मैंने बेफिक्री सीखी , अरे सर टेंशन क्यों लेते हो , सबकुछ होता रहेगा , बैंक का काम तो होता रहेगा। एक बंदी आई, शीतल, सच तो ये है की मैंने उसे कुछ भी नहीं सिखाया, but मैंने उससे सीखा , बहुत कुछ , जिंदगी के बारे में , जिम्मेदारियों के बारे में और भी बहोत कुछ। फिर भराडिया सर , और शर्मा सर , शुक्रगुजार हूँ की इतने अच्छे लोग मिले मुझे। जाकिर भाई भी बहोत याद आयेंगे मुझे , ब्रांच के बहार बहुत वक़्त  गुजारा है।  हर चीज़ में साथ दिया ! कैलाश जी भी , पुराने दिनों के चालान , हा हा हा और फिर unka दिया हुआ सब आईडिया ,
ले लो न जी साब।  खुद सब को कुछ न कुछ बक्श्ता है।  और गार्ड्स में विनोद जी , भोला , कभी कभी मैं iritate ho जाया करता थे लेकिन end  में उनका बहुत अच्छा होने सब chizo पे bhari pad जाया करता है। last में हुई एक buri चीज़ ने मुझे बहोत परेशां किया और मुझे khud को gira हुआ सा mahsush हुआ, पर thode दिन में लगा की उस bande में bachpana है , और शायद अच्छे बुरे की और इस duniya की समझ नहीं है , हमेशा कहा करता था की उसे protect करने की jarurat है duniya की buraion से और mujh पर ही ilzam , khair जो भी हुआ मेरे लिए एक सबक ही था ,मैंने अब भी यही कहता हूँ बचपना है और उसने जो कुछ भी कहा किया उसके लिए मेरे मन में द्वेष नहीं है , मैं अब भी उसे सलाह दूंगा की अच्छे बुरे की पहचान करना सीखे।

और अंत में एक एक बहुत प्यारी वजह,कुछ नहीं लिखूंगा ।  और कुछ भी इसलिए नहीं लिखूंगा की , मुझे बहुत कुछ अभी लिखना है और शायद जिंदगी भर।कुछ न कुछ तो लिखता रहूँगा न यार जिंदगी भर, अच्छा या बुरा। अच्छी चीज़े तो मैं हमेशा संजोता हूँ , और बुरी सबकुछ भूल जाता हु।  ।

अलविदा निम्बाहेरा , फिर मिलेंगे  और जरुर मिलेंगे , इसी वादे के साथ,

बीच राह  में दिलबर, बिछड़ जाये कहीं हम अगर ,और सूनी सी लगे तुझे जीवन के ये डगर।
हम लौट आयेंगे , तुम यु ही बुलाते रहना ,
कभी अलविदा न कहना, कभी अलविदा न कहना।




Sunday, September 22, 2013

वह अब भी मिलती है. .

वह अब भी मिलती है. .
सुबह बनकर , शाम बनकर
और अक्सर नज़्मे बनकर
और हम कितनी देर
एक दूजे को देखते रहे हैं
और मिलकर अपनी अपनी नज्मे
जिंदगी को सुनाते  है।
     इमरोज़। 

Monday, September 9, 2013

झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नहीं।

जगजीत सिंह जी का गाया ये song जब जब सुनता हूँ,  अजीब सी सिहरन होती है दिलो दिमाग मे. हर वक़्त ये पूछ पड़ता हूँ, दबा दबा सा सही इनमे प्यार है के नहीं। ।  तू अपने दिल की जवां धडकनों को गिन के बता  , मेरी तरह बेकरार है की नहीं। ।  और इस गाने का एक अंतरा जो बहुत ही दिल के करीब है , जब भी कमजोर हो रहा होता हूँ तो गुनगुना लेता हु। .. 
          तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को.. 
          तुझे भी अपने पे ही ऐतबार है के नहीं....

          

Saturday, August 24, 2013

Suffering .

Sometime u suffer for unknown reason and sum time u suffer for being good...It well said that the price of being good is paid by you and being bad is paid by others....so what just suffer...and when u suffer...suffer joyfully.

Friday, August 2, 2013

फिर वही अँधेरा।।

फिर वही बेबशी। फिर वही वाहियात पन। क़्यु मैं समेट नहीं पाता हु लम्हों को। …फ़िर वही अँधेरा। 

Sunday, June 23, 2013

क्यों मैं इतना खुश सा रहता हूँ..

कभी कभी तुम  ऐसा सवाल पूछ लेते हो कि मैं एकदम से सोच में पड जाता हूँ . और तुम्हारा ये सवाल कि " मैं क्यों हमेशा खुश रहता हूँ या खुश लगता हु", ने सचमुच मुझे सोचने को मजबूर कर दिया कि  वास्तव में ऐसा है क्या और अगर ऐसा है तो क्यों है? क्या मैं सचमुच हमेशा खुश रहता हूँ , खुश रहने की कोशिश करता हूँ या फिर बस यूँ ही ...जो भी हो कभी कभी नोटिस करता हूँ मुझे लोग ब्रांच में भी कह जाते हैं कि , हमेशा ही मुझे लोग मुस्कुराता हुआ पाते है , कुछ दिन पहले की बात है , बैंक में नए नए ज्वाइन किये एक बन्दे ने मुझसे कहा की बैंक में सिर्फ मुझे सी हँसता , मुस्कुराता और खुश पाया है , बाकी सब लोगो को हमेशा सीरियस पाया है ..
                       चलो जो भी हो ,अब तो मुझे तुम्हारे प्रश्न का  भी तो ढूँढना है कि क्यों मैं इतना मस्त रहता  हूँ, सबसे पहली बात तो ये है कि "I accept everything as it comes in life ", जो जैसा है उसको उसी रूप में स्वीकार करता हूँ/ या फिर उसी रूप में स्वीकार करने की कोशिश करता हूँ .क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है जैसे ही मैंने किसी चीज़ को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश की , उसका स्वरुप ही बिगड़ जाता है ...उसे उसके खुद के रूप में ही रहने देता  हूँ और उसके हिसाब से ही खुद को ढालने की जुगत में लग जाता है , तुम्हे पता है तुम हमेशा कहा करते हो की मैं वही  कहता हू जो सामनेवाला सुनना चाहता है , बस यही जुगत है , खुश रहने का जुगाड़ .....
                     दूसरी चीज़ जो मुझे लगता है की मुझे खुश रखने में सहायक होता है वो एक वाक्य में समाहित है .."Never expect anything from anyone, because expectations hurt ".. मुझे  याद आता है ३ साल पहले का एक वाकया , मेरे किसी दोस्त ने मुझसे कहा था की उसके roomies उसका care नहीं करते , इसलिए वो दुखी है, मैंने उससे सिर्फ यही कहा था कि तुम, ये expect करते हो कि  वो तुम्हारा care  करे, और जब वो तुम्हारा care नहीं करते तो तुम्हे हर्ट होता है . ऐसा करो कि ये expectation ही छोड़ दो ...और उसके बाद से मेरे उस दोस्त ने इस चीज़ की शिकायत शायद ही कभी की हो ..हाँ ये सच है , और जिंदगी का सबसे बड़ा फंडा ...
                     तीसरी चीज़ , हमेशा से हम ये कहते फिरते  हैं कि , ये बंदा बुरा है या ये बंदी बुरी है क्यूंकि हो सकता है कि उसने तुम्हें harm किया हो .पर ये सच नहीं की वो हर किसी के लिए बुरा हो, मैं तो ये सोचता हु की जब कोई खुद को harm  नहीं कर सकता तो किसी दुसरे को क्या harm  करेगा ..So I always use to think everyone is good .".. वो भी अच्छा है जिसने मेरी भलाई की और वो भी जिसने नुकसान पहुँचाया ...और जब मैं इस वाक्य को दुहराता हूँ, अन्दर से एक शक्ति मिलती है उस बन्दे के लिए भी अच्छा सोचने और अच्छा करने को जिसने जाने , अनजाने में मेरा अहित किया . और मैं समझाता हूँ दुनिया में इस से बड़ी भावना कोई हो ही नहीं सकती ..तो खुश रहने का ये था तीसरा  फंडा ...
                    इन फंडो को छोड़कर कुछ और कहूँगा , मेरी जिंदगी भी अब तक ऐसी गुजरी है की , खुश रहना तो बनता है यार , याद  आता है 2006 फ़रवरी , जब सब तरफ अँधेरा था,तब मुझे एक रोशनी की किरण भी याद आती है जिसने मुझे भरोशा दिया था खुद पे भरोशा रखने का , नहीं तो मैं पता नहीं कहाँ टूटकर बिखरा हुआ होता ।   ..मुझे 2007  याद आता है , जब मैं पागल सा हुआ करता था , ये सोच सोच कर की graduation के बाद क्या करूँगा , कहाँ जाऊंगा . साधनविहीन विपन्न ..ख़ुदा ने नेमत बक्शी , सारे दरवाजे खुद ही खोल दिए .. मैं चेहरों की मुस्कान खरीदना चाहता था , जो कितने सालों पहले जाने कहाँ खो गयी थी ..और उपरवाले ने मेरी हर  मुराद बक्शी ...मैं उड़ना चाहता था , उसने मुझे पंख बक्शे ....और मैं हँसना चाहता था उसने मुझे मुस्कराहट बक्शी ..और अब मैं उसकी इबादत इसी मुस्कराहट से करता हूँ ..
                  एक और  वजह से मेरे खुश रहने का , निश्चिंतता ,  हाँ ये भी बड़ी चीज़ है ,मैं हमेशा निश्चिंत होता हूँ कि हाँ यहाँ कोई तो है जो मेरे पास होगा ..even in the darkest hour of my life, to hold my hand and assure me , के  "मैं हूँ ना "..पता है उसे मेरी सारी बुराइयाँ पता होती है पर वो हमेशा मेरी बुराइयों में मेरी अच्छाई ढूंढ़ लाता है ...है न कमाल  की बात ...और मुझे भी ऐसा लगता है की कोई तो है जहाँ मैं अपनेसारे  दुःख गम विषाद समेट  सकता हूँ ..हर वो लम्हा समेट  सकता हु जहाँ मैं बहुत खुश होकर अपनी हंसी प्रस्फुटित की थी या फिर हर उस लम्हे को बाँट सकता हूँ जब मैंने अपनी आंसुओं से फिजाओं को रुलाया होगा .. तन्हा सा अकेला सा ..और इसी अकेलेपन का साक्षी वो , हर टूटते बिखरते सपनो का साक्षी ..वो भी तो बड़ी वजह है ...मेरे खुश रहने का ...
                    और रह गयी बात खुशिया ढूंढ़ने की तो हर छोटी चीज़ में कोशिश करता हूँ, खुशियाँ ढूंढ़ लु. ब्रांच में आने वाली वो रिटायर्ड टीचर या फिर वो साउथ इंडिया के वो अंकल ..इनको थोड़ी देर हंसाकर  भी खुश हो लेता हूँ ..या फिर वो पेंशनर अंकल जिनके पेंशन में  1 रूपया का फर्क है ..कल ही गया था बड़ी सादरी ब्रांच , बैंक  के कम से ,वहां भी एक गांववाला काफी देर से बैठा था , और जब मैंने उसे समझाया तो दुआएं दी मुझे उसने, खुश होने का एक और वजह , इस अजनबी देश में गर्मी में तपती रेत  और उसपर बारिश की पहली बूंद, तब मैंने ऐसा ही कुछ मह्सुश किया ..कुछ तो नेमत बक्शी है उपरवाले ने ...वही घंटाघर चोराहे से गुजरने लगा तो पाया की , कहाँ था मैं चंदवा में , और कहाँ आ गया मैं राजस्थान में, और आया ही नहीं इसे मह्सुश भी कर रहा हूँ ...ये नेमत नहीं तो क्या है ...मैंने इबादत न करूँ तो क्या करूँ ..मैं खुश ना रहूँ तो क्या करूँ ...
                              और भी कई वजहें  हो सकती है मेरे खुश रहने के , पर मुझे लगता है तुम्हे तुम्हारा उत्तर मिल गया होगा . ना  मिला हो तो फिर पूछना ...मेरे मूड में आकर लिखने को 2 कप चाय और 2 ,3 घंटे का वक़्त चाहिए ....कम से कम मेरे ब्लॉग में एक पोस्ट तो बढेगा ..हा हा हा ...
                              

Tuesday, June 18, 2013

बारिश की पहली बूंद

पता नहीं कितनी बारिशें आकर गुजर गई , पर हर वो बारिश जिसमे हम  और तुम साथ साथ भीगे थे , जिंदगी  की अनमोल अभिव्यक्ति सी बन  गई  . जब भी ये बारिश , मुझे छुकर गुजरती  है , मुझे वो लम्हा याद आ जाता है , मुझे वो तुम्हारा छोटा सा फूलो की छापों वाला छाता भी याद आता है , थोड़े हरे रंग का, हमारे और तुम्हारे साथ भींगने का साक्षी ..मुझे बारिश से बचाने को तुम और तुम्हे बचाने को मैं , और इसी बचाने की जद्दोजहद  में हम दोनों भींग जाते थे ..मुझे याद है मैं हमेशा तुम्हारी बायीं तरफ होता था और तुम हमेशा मेरी दायीं तरफ। और जब हम अलग होते थे , एक दुसरे को छुकर मह्सुश करते थे कि  "तुम " बहुत भींग  गए हो. शायद तुम्हे याद नहीं होगा जब हम तुम तुम्हारे उसी  छाते के नीचे होकर जा रहे रहे थे , अचानक जोरदार  बारिश हो गयी और हमारा एक कदम भी बढ़ाना मुश्किल सा हो गया था ,तब हम कुछ देर रुके थे एक छप्पर के निचे और अचानक से बिजली बहुत जोरों से कडकी थी , और तुम सिमट गए थे मुझमे , जैसे मुझमे और तुझमे कोई फर्क ही न हो और तब मुझे ऐसा लगा था की सारी कायनात ही सिमट गया हो मुझमे ...पता नहीं क्यों मैं उस वक़्त के अहसासात को शब्दों में ढाल ही नहीं पाता ..प्रकृति का सबसे हसीन लम्हा था वो मेरे लिये, वो बारिश की पहली बूंद , वो बिजली का कडकना , और वो तेरा मुझमे सिमट जाना ......

जब भी ये बारिश की पहली बूंद पड़ती है मेरे जिस्म पे, हमेशा तुम्हारी यादो से तारो ताज़ा हो जाता हूँ , उन लम्हों से जो अव्यक्त है , अनकही है , फिर भी है जानी  पहचानी सी ..हमेशा से मैं डरता रहा हूँ ,  डरता रहा हूँ तुम्हारे बारे में कुछ भी लिखने सुनने को , पर जब भी ये बारिश की बुँदे मुझ पर गिरती हैं . मैं  शायद उछ्रिन्ख्ल हो जाता हूँ और खुद को नहीं रोक पाता . शब्द  खुद ब खुद मूर्त रूप लेने लग जाते हैं .....हर बारिश के साथ तुम्हारी यादें जुडी हुई हैं ..और पता नही इतने साल  गुजर जाने के बाद भी यही मनाता हूँ की मेरी हर बारिश गुजरे, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे साथ ..

"वाह रे खयाली पुलाव , साला कभी कभी बकलोली हम भी कर ही लेते हैं ..हा हा हा .." 

निष्पृह