Saturday, March 24, 2012

बिखर जाने का मन कर रहा है

बिखर जाने का मन कर रहा है ....कभी कभी ही तो ऐसा महसूस होता है जिंदगी में ..जब पूरी दुनिया, ये शहर , ये जॉब बेमतलब के लगने लगते हैं ....और तो तब जब खुद का होना भी बेमतलब सा होता है ..एकदम बेमतलब ...तो लगता है की बिखर जाऊ मैं , बाँट जाऊ टुकडो टुकडो में और बिखर जाऊ , और ऐसा बिखरू की नामो निशान  मिट जाये .....क्यूँ होता है ऐसा जब इन्सान खुद के अस्तित्व को ही मिटा देना चाहता है , सब सिर्फ भावनाएं होती है ...चलो वक़्त बहुत बड़ा मरहम होता है इस अहसास को भी मिटा देगा .......
पर सच में यार जिंदगी में हर अहसास का अपना अलग महत्त्व है ...और इस बिखर जाने का अहसास तो और भी ......कभी कभी तो सोचता हूँ की मैं बहुत भाग्यशाली हूँ की , इस दौर से गुजर रहा हु ......सच है यार कितने लोगो को ये अहसास होता होगा ....अपने अस्तित्व को मिटा देने का अहसास ....


प्रभु वक़्त बहुत बड़ी मरहम है न , सब कुछ मिटा देती है , सब कुछ भर देती है ..बस इसी वक़्त के सहारे गुजर रहा हु ...बस बिखरने मत देना मुझे , मिटने मत देना मुझे , मुझे खड़ा रहना है , सबके लिए , और सबकी मुस्कराहट के लिए , बरसात में भी , और धुप में भी मुझे ऐसे ही खड़ा रहना है , मुस्कुराते हुए, सबकी मुस्कराहट के लिए ...........बिखरने मत देना मुझे ....

2 comments:

  1. sir i think you should start writing a book.. awesome collection of words,keep it up

    ReplyDelete
  2. hmmmmmmmmmmmm....thanks Navneet Sir, ek book to jarur likhunga....

    ReplyDelete

निष्पृह