हाँ जी, ब्रज वीर के बारे में सोच रहा था के कुछ लिखू ....पहले दिन जब ये ब्रांच में आया तो मैं भिड गया था ....मुझे इसका व्यवहार एकदम से पसंद नहीं आया ....सोचा कितना खडूस है ये ये....और आज जब ये लिख रहा हूँ तो लगता है , मैं गलत था ...ये खडूस नहीं है ये ऐसा ही है ......
धीरे धीरे इसे जानने की कोशिश कर रहा हूँ ! मुझे लोगो को पढ़ना बहुत पसंद है और खास कर ऐसे लोगो को जिनमे कुछ खास होता है ...इस बन्दे को देख कर मुझे ऐसा महसुसू होता है , खुदा ने इसे कुछ बहुत ही खास बक्शा है ..कुछ बहुत ही खास ..शयद इसकी तन्हाई या फिर इसका अकेलापन..या फिर इसके अकेले होने की चाहत....
बरबस ही वो लड़की याद आ जाती है , अलका अग्रवाल , वही चुलबुली सी लड़की ...जिसका चुलबुलापन पता नहीं 5th के बाद कहाँ गायब हो गयी थी ...निर्निमेष आँखे ...एक खाने को दौड़ता अकेलापन ...याद करता हूँ , 5th के बाद उसने कोई नया दोस्त भी नहीं बनाया ....खूब जानने की कोशिश की...आखिर क्यों ऐसा हुआ ...क्यूँ एक चुलबुली सी , प्यारी से मुस्कान एक खुबसूरत चेहरे से गायब हो गयी ...........
जो भी हो शायद अब मैं उसकी वजह जान भी नहीं पाउँगा ...और वही निर्निमेष आँखे अब मैं ब्रज वीर में पाता हूँ ..पता नहीं क्यों एक सूनापन ...एक अजीब सा सूनापन उसकी आँखों में दिखाई देता है ...और मुझे ऐसा सूनापन और ऐसी एकाकी एकदम पसंद नहीं .....तो मैं हमेशा ही उसे हंसाने की कोशिश करता हूँ .....शवाब, शराब और कवाब ..पर नहीं यार...हंस देता है वो ...लेकिन ये हंसी भी खोखली जान पड़ती है ..ऊपर से हंस देता है....पता नहीं इस बन्दे ने कब अन्दर से खुल के हंसी आई हो ...
और सबसे बुरी चीज़ तो ये है की, भाई साब हमेशा सिरिअस रहते है , जिंदगी से fun जैसी चीज़ को तो लगता है काट कर फेंक दिया है , अरे भाई थोडा चेहरे पे मुस्कराहट रखो , पता नहीं कब सामने वाले की मुस्कराहट तेरी मुस्कराहट से अपनत्व जोड़ ले ..पर ना ये चांस भी नहीं लेना ....ठीक है ..पर सामने वाले को तो चांस दो....नहीं वो भी नहीं होगा ...और हर चीज़ के पीछे Logical मतलब तार्किक हो जाना तो इनका सब से विशेष गुण है ...थोड़ी पागलपंथी भी तो जरुरी है ना ..जिंदगी के लिए....थोडा अनमना होना , थोडा खिल्दंडा होना ...
और जब जानने की कोशिश करता हूँ की , वो ऐसा क्यूँ है तो कोई उत्तर नहीं पाता ...तो खुद ही उत्तर ढूंढने लग jata हूँ ....क्यूँ है ऐसा ...बचपन का कोई दुह:स्वप्न ...पर नहीं ऐसा भी कुछ नहीं...गरीबी का दंश तो नहीं .....क्यूंकि गरीबी तो ऐसी चीज़ है सब से पहले चेहरे की मुस्कराहट ही छीन लेती है, पर ऐसा भी नहीं है ...भाई साब तो खाते पीते घर से हैं ...तो फिर ऐसा क्यूँ है ...और फिर ध्यान आता है की किसी लड़की वडकी का तो चक्कर नहीं ...और यहाँ पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं पाता ....अरे भाई दिल के दरवाजे खुले रखो .....एक लड़की के चक्कर में तो तुम इतने विछिन्न नहीं हो सकते ......बस मुस्कुराते रहो ....पर नहीं चेहरे में हमेशा ही seriousness .......
और मुझे भी खुजली होती रहती है की , हँसता रहता हूँ , भाई तू इतना serious क्यूँ है ....Life is beautiful , colorful , देख तो सही ....हर वक़्त कैरिएर , लाइफ , कैरिएर , लाइफ , कैरिएर लाइफ ...
अब कल ले गया उसे मैं , JK मंदिर और अम्बामाता ....पर उसे तो मेरे रूम पे ही रहना पसंद था ..कितना जिद करना पड़ा कि ...चलो ...finally मैं बहुत खुश हुआ जब धन्यवाद् मेसेज मिला ...चलो थोडा काम तो आया मैं , थोड़ी ख़ुशी और जयादा तो नहीं थोडा सा असली मुस्कराहट का अहसास मुझे उसके उस मेसेज से मिला ..............
चलो ज्यादा नहीं लिखता हूँ , बस अब बंद करता हूँ ..........काफी दिन काटने बाकी है अभी ब्रज वीर के साथ ....जब अलविदा कहोगे तो बहुत कुछ लिखूंगा ....
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