Saturday, November 4, 2017

मैला आँचल.......

    अभी अभी ही ख़तम की हैं फणीश्वर नाथ रेणु लिखित ये किताब।  बहुत कुछ अपने जैसा , अपने घर गांव जैसा। मैं बिहार  कभी नहीं रहा हूँ ,सिर्फ 1 ,2  बार ही जाने का मौका मिला है। समझता हूँ कुछ ज्यादा फर्क नहीं है वहां और हमारे यहॉ।  सब कुछ एक समान हैं सोंधा सोंधा , माटी के महक जैसा। मुझे अपने पुरखो के घर में अधिक दिनों तक रहने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है , जिंदगी की  आपाधापी में सब कुछ पीछे छूट गया है मेरा।  खैर ,जब आप  किसी उपन्यास को कहानी को पढ़ रहे होते हो तो आप खुद उस कहानी से अपने आप को जोड़ लेते हो। उसके किसी पात्र में खुद को ढूंढ लेते हो या किसी पात्र के करीब हो जाते हो। मैं लक्ष्मी कोठारिन को सबसे शसक्त किरदार मानता हूँ। सर्वस्य समर्पण और निश्वार्थ सेवा ,अपने आस पास भी ऐसे बहुत से किरदार होते हैं जो अनसुने से अनछुवे से रह जाते हैं। डॉक्टर प्रशांत और कमली भी ,रेणु  जी ने शरतचंद्र जी को भी करीने से नमन किया हैं। शरतबाबू के उपन्यासों की यह नारी अपने विश्वाश पर अडिग होकर आज भी आगे बढ़ रही है ,रूप बदल दो ,नाम बदल दो , समय बदल दो ,पर यह कभी बदल नहीं सकती। और यह सिर्फ शरत की ही नारी नहीं है पुरे भारत वर्ष की नारी है। हमारे  आस पास की ही माँ,पत्नी ,बहन या किसी और रूप में। वो है तो यही कहीं ,यहीं कहीं अपने आस पास। गोदान पढ़ी थी कुछ दिनों पहले उसमे भी थी वो धनिया शरत बाबू की नारी ,अपने विश्वाश पर अडिग होकर बढ़ने वाली।
                   मैला आँचल की एक और नारी है जिसके बारे में शायद बहुत कम चर्चा हुई है ,कमली की माँ , विश्वनाथ तहसीलदार की पत्नी। कड़ी यातना के क्षणों में अपनी पुत्री के पक्ष में खड़ी  ,पति  और बेटी दोनों के बिच का सामंजस्य। मेरी बेटी का कोई दोख नहीं..... माँ रो पड़ती है,"कमली का कोई कसूर नहीं। डॉक्टर ने फुसलाकर उसका सत्यानाश किया है। माँ का दुःख अब कौन समझे।
        आंचलिकता ,सबसे बड़ी खासियत रही है रेणु जी की। पढ़ते हुए लगता जैसे सब कुछ अपने आस पास का ही है। अपना ही है। और यही ......

No comments:

Post a Comment

निष्पृह