Sunday, December 11, 2011

फिर वही अकेलापन

माँ कल चली गई वापस घर को और फिर मैं अकेला और तनहा हो गया , जिसके पास तो कुछ करने को है और ही कुछ बाँटने को , और अकेला हो जाट हूँ तभी सोच पता हूँ की जिदगी क्या हो गयी है , दिन भर आज सोया रहा , सिर्फ सोया ! बहुत परेसान सा हो जाता हूँ, क्या ऐसे ही गुजर जाता है लम्हा लम्हा ,टीवी इन्टरनेट बस यही दो साथी है , पता नहीं क्या होगा मेरे सपनो का जो बचपन की आखों ने देखे थे , पागलों के लिए एक अस्पताल और एक ओल्ड एज होम , यहाँ अब कुछ पढने की भी इच्छा नहीं होती , एक stagnation के दौर से मैं गुजर रहा हूँ , और शायद यहो दौर जिंदगी को भागों में बंटती हैं , और महसूस हो रहा है मैं दोराहा हो रहा हूँ , सच मैं दोराहा , लगत है अब कुछ नहीं हो पायेगा , कुछ भी नहीं , तो अपनो के लिए और ही दूसरों के लिए, सच है हाथ की लकीरें भी कभी कम आती हैं

Wednesday, December 7, 2011

पता नहीं ऐसा कैसे हो गया

जिंदगी में गलती तो हो ही जाती है , यार कितना भी अच्छा सोचो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो हो ही जाता है, जब वो वक़्त गुजर रहा होता है तब कुछ भी पता नहीं चलता, पर जब गुजर जाता है तो पता चलता है की क्या सही था और क्या गलत था, चलो कोई न , इस बार तो बच गया, बंगलोरे का सफ़र भी ठीक थक था, सम्मिउल्ला से मिला , हिमांशु से मिला , बंगलोरे में संदीप से मिला, ओर अच्छा ही गुजर गया पर जब भी में कहीं से वापस आता हूँ हमेशा अपन को एक उधेड़बुन में पाता हूँ,, में यहाँ क्यों, क्या मेरी जिंदगी की यही दशा हैं, मेरी मंजिल कहीं और है बस यूँ ही जिंदगी जीते जी गुजर देनी है, यार न या तो होना चाहिए, में यहाँ अपना वक़्त नहीं गुजरना चाहता और जैसा लगता ही नहीं है ,पाता नहीं कब तक अपना चल पाता
की क्या है तो क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है, पर यार ज्जिंदगी ऐसी ही चलती है तो गुजर जाती है , गुजर जाएगी!

Monday, November 28, 2011

रेगिस्तान की रेत

कभी कभी मैं सोचता हूँ कि मैं कहाँ आ गया , और कहाँ जा रहा हूँ , न तो कोई मंजिल है और न ही कोई रास्ता, बस जीना है तो जिए जारहाहूँ, क्या यही होताहै जिंदगी का मतलब , सोचता हूँ नहीं ऐसा तो कभी नहीं,फिर मैं क्यों हूँ , क्यों हूँ मैं यहाँ , और क्या कर रहा हूँ, बैंक कि जिंदगी एकदम से नीरस होता जा रहा है, रेगिस्तान में पड़ी रेत कि तरह अपनी जिंदगी भी खुरदुरी होती जा रही है, पता नहीं मैं कहाँ पहुचुन्गा, शायद कहीं भी नहीं......पढाई भी अब नहीं कर पता और व्यावासिक जिंदगी मैं कहीं भी सुकून नहीं है , थोड़ी बहुत रुखाई मेरे व्यवहार में भी झलकना शुरू हो गया है, मैं खुद बदलता जा रहा हूँ शनैः शनैः , जो कि मुझे भी पता नहीं चल प् रहा है , हर किसी से झगड़ पड़ता हूँ , मन में थोड़ी सी भी शांति नहीं है , लगता है मैं धीरे धीरे घमंडी भी होता जा रहाहूँ, ऐसा परिवर्तन मुझे लगता है मेरे कार्यक्षेत्र की वजह से हो रहा है , हर सेकंड एक ऐसा बंद आता है जिसे अपनी परेशानी होती है और हर किसी के साथ मैं एक सा नहीं हो सकता , निम्बहेरा में ऐसा ये भी लगता है की यहाँ जायदा झगडे वाले लोग ही रहते हैं , अब मैं घर में भी ऐसे ही बात करने लगा हूँ जैसे मैं बहुत खिझा हुआ हूँ , हाँ बहुत खिझा हुआ , जबकि मुझे ऐसा नहीं होना चाहिए , मैं स्वार्थी भी होता जा रहा हूँ , पल पल जबकि पहले मैं ऐसा नहीं हुआ करता था, इस बदलाव को मैं रोकना चाहता हूँ , प्रभु प्लस मेरी मदद करो , मैंने हमेशा से ही विनती की है , की मैं कहीं पे भी रहूँ , मेरे पांव हमेशा जमीं पे ही होने चाहिए , और कभी भी घमंड मुझे छु न पाए , पर मुझे लगता है की मेरी विनती में कहीं चुक हो रही है , कुछ छुट ता सा लगता है ......

Saturday, November 19, 2011

कुछ बातें कुछ यादें

हाँ कुछ तो जरुर छुटता हुआ लगता है , कुछ पुरानी बहुत ही सुहानी यादें ताज़ा हो जाती हैं , सुन रहा हूँ गाना , लग जा गले से फिर हसीं रात हो न हो, फिर मुलाकात हो न हो, सचमुच हम मुलाकात को तरस से जाते हैं, सचमुच यादों से ही जिंदगी बनती है , कुछ खट्टी कुछ मीठी, और हम ऐसे ही जिंदगी के पन्नो को भरते चले जाते हैं , कुछ अफ़सोस भी होता है, किसी के छुटने को, डर भी होता है किसी के खोने का, लगता है सब शुन्य है और कुछ भी नहीं, जो ख जाते हैं उनसे तो हम कभी मिल भी नहीं पते और जिनसे मिलना चाहते हैं प्रकृति मिलने भी नहीं देती...

Friday, October 21, 2011

शहर में हूँ मैं तेरे , आके जरा मिल तो ले

बहुत प्यारे शब्दों का इस्तेमाल किया है , सुनता हूँ इन गानों को तो कुछ अपनेपन की अनुभूति होती है, पर तो यहाँ अपनापन है और ही अपना शहर , लगत है कितना पीछे छुट गया है अपना शहर और अपने लोग, सच कहूँ तो जीने का मकसद भी छूटता नज़र आता है , एक छोटी सी जिंदगी मैं अपने लोगों से ईतना दूर होकर जीना भी मुश्किल लगता है , आत्मीयता की एक बूंद के लिय भी यहाँ जिंदगी तरस सी जाती है , और हम इसी बूंद की तलाश में कई और मायने भी ढूनन्धने लग जाते हैं, और मैं भी इसका अपवाद नहीं हो सकता , और मैं भी इसी को तलाश करने लगता हूँ, पर अब लगता है की थोड़ी सी प्रतिबद्धत तो ही गयी है , साल पहले जो भटकाव होता था अब नहीं होता, हाँ सच है वो भटकाव नहीं होता, नहीं खुबसूरत चेहेरों पे भी नहीं...
खैर छोड़ो कुछ अपने शहर की बातें तो करूँ, आपना शहर अब अपना नहीं रहा , नाही अब ये शहर मुझे अपना मनाता है , बस एक अजनबी सा बर्ताव करता है, कहता है तुम्हे कल सुबह ही तो जाना है और मैं अकड़
कर रह जाता हूँ , काश मैं तुम्हे हक से अब भी आपना ही शहर कह पता , रांची भी शायद कुछ अपनी जैसी ही थी ,पर यहाँ राजस्थान मैं भटकते भटकते अपने अस्तित्व की पहचान भी खो चूका हूँ,
और क्या क्या लिखूं , कुछ तो लिखना ही हैं , हमेश सी ही गुरुवार अच्छा नहीं हो रहा हैं, कल तत्काल का टिकेट भी नहीं हुआ, और टिकेट, देखता हूँ की एक भी कन्फर्म होता हैं या नहीं, नहीं हो तो बहुत मुस्किल होगी जाने में, वो यात्रा भी याद जय हैं जो , इसी समय में , और इसी ट्रेन में हुई थी, हा हा हा बड़ा मजेदार वाक्य हुआ था , लगता ही नहीं की साल पुरे गुजर गए, यार ऐसे देखते ही देखते पूरी जिंदगी गुजर जाएगी..

Saturday, October 15, 2011

लैपटॉप

आखिर मैंने लैपटॉप ले ही लिया...२००९ से प्लान बना रहा था कभी ये इसु तो कभी वो इसु, चलता ही जा रहा था और अंत में मुझे लैपटॉप नसीब हो ही गया, बैंक की दुआ से..औत आज इन्टरनेट का कनेक्शन भी ले लिया, देखता हूँ अब मैं इसका कितना सार्थक उपयोग कर पता हूँ.......कब से एक बहाना धुंध रहा थे की मेरे पास लैपटॉप नहीं है अब वो बहाना भी ख़तम...
एकचअ है शायद अब कुछ रचनातमक कर paun

Sunday, October 2, 2011

Nimbahera

Nimbahera......
Yahan jab se main aaya hun..aisa lagata hai ki kuch bhi mere sath accha nahi ho raha hai...
kal parson ka hi problem..aur yahan rahane ka problem...2-3 days se khane ka problem.....then i feel being spritual..yar sac hai aisa hi hota hai life main , aur hum kuch bhi nahi kar sakte , bus mukdarshak hi bane rahte hain.....

It's life..and we must enjoy each nad every Moment of life....

निष्पृह