माँ कल चली गई वापस घर को और फिर मैं अकेला और तनहा हो गया , जिसके पास न तो कुछ करने को है और न ही कुछ बाँटने को , और अकेला हो जाट हूँ तभी सोच पता हूँ की जिदगी क्या हो गयी है , दिन भर आज सोया रहा , सिर्फ सोया ! बहुत परेसान सा हो जाता हूँ, क्या ऐसे ही गुजर जाता है लम्हा लम्हा ,टीवी औ इन्टरनेट बस यही दो साथी है , पता नहीं क्या होगा मेरे सपनो का जो बचपन की आखों ने देखे थे , पागलों के लिए एक अस्पताल और एक ओल्ड एज होम , यहाँ अब कुछ पढने की भी इच्छा नहीं होती , एक stagnation के दौर से मैं गुजर रहा हूँ , और शायद यहो दौर जिंदगी को २ भागों में बंटती हैं , और महसूस हो रहा है मैं दोराहा हो रहा हूँ , सच मैं दोराहा , लगत है अब कुछ नहीं हो पायेगा , कुछ भी नहीं , न तो अपनो के लिए और न ही दूसरों के लिए, सच है हाथ की लकीरें भी कभी कम आती हैं
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