Saturday, March 22, 2014

Too lonely...

Sometimes I started to feel too lonely....too lonely...then what should i do..just listen songs...

In the darkest night hour..
I'll search through the crowd..
Your face is all that I see..
I'll give you everything..
baby love me lights out...
love me like XO...

Monday, March 10, 2014

बहुत बुरा हूँ मैं। ..

कभी कभी  मुझे अपने बहुत बुरे होने का अहसाश होता है , जब आप जब किसी का दिल दुखाते हो , वो भी जान बुझ कर। पर शायद जब आप किसी का दिल दुखाते तो सबसे जयादा तकलीफ खुद को ही होती है ,क्यूंकि तब तन्हाई में आपके अँधेरे कमरे का एक कोना आपके आंसुओ से भी सींची जाती है। ।लेकिन जिंदगी ऐसे ही चलती रहती है। .. It has been well said na ...Sometimes it good to be bad ...

Saturday, February 15, 2014

16 फ़रवरी।

 जिंदगी में वापस ये 16 फ़रवरी।  8 साल। .

Monday, February 3, 2014

तुम.....

काश तुम्हे शब्दों में मैं बांध पाता, तुझे ढाल पाता।  पर मुझे पता है तुम्हें शब्दों में कभी परिभाषित कर ही नहीं पाया और शायद ताउम्र नहीं कर पाउँगा। जिंदगी में कुछ चीज़े जरुर ऐसी होती है जिन्हे शब्दों की जरुरत होती ही नहीं, निःशब्द , और उनका निःशब्द होना ही बेहतर होता है। कभी वक़्त मिले तो शेखर की " शशी " को जरुर पढ़ना।।।

  मैं सोचता था ,यदि ऐसा न होकर वैसा होता , और वैसा होता ,और वैसा होता ,तो ......पर आज सोचता हूँ कि नहीं ,आज लगभग मांग रहा हूँ कि यदि कुछ हो तो ऐसा ही हो , छाया ,हम -तुम भी ऐसे ही हो -अलग पर सदा एक दूसरे की ओर अग्रसर होने में सचेष्ट ,साधारण अभिधा में गैर पर वास्तव में अखंड विश्वास में बंधे , धमनी के एक .........कर्म में तुम हो , चिरंतन प्रेरणा -चिरंतन क्यूंकि मुक्त और -मोक्षदा .......अज्ञेय (शेखर एक जीवनी से )

मोक्षदा , ये शब्द शायद तुम्हे आकर देने की छोटी सी कोशिश होगी।  हाँ शायद मोक्षदा ही हो तुम , जब जिंदगी की सतरंगी छटाओं में झूम रहा होता हूँ तो छोड़ देते हो मुझे मुक्त , निर्मुक्त। शायद ये अहसाश दिलाने के लिए कि मेरे लिए तुम कभी भी बंधन का रूप कभी नहीं बने। और जब जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तो में बेतरतीब हो रहा होता हूँ तो पता नहीं कहाँ से pop-up बन कर सामने आ जाते हो ," मैं हूँ न रे "। और इन शब्दों  में मुझे  जिंदगी जैसे वापस मिल जाती है। कोई शिकायत भी नहीं और न ही कोई उम्मीद । … No expectation n no demand".....पता नहीं किस मिटटी के बने हो तुम।  लोग मुझे कहते है , जिंदगी को ऐसे गुजारने के लिए तुम ऊर्जा  कहाँ से लाते हो।  और मैं यही सवाल तुमसे पूछा करता हूँ ,  और तब पाता  हूँ कि जिंदगी का हुनर तुमसे ही पाया है , सारी ऊर्जा वही से तो पाता हूँ।  मोक्षदा.......मुझे याद आने लगता है कि कितनी बार जिंदगी में बिखरा हूँ मैं ,शीशे के टुकड़े की तरह चकनाचूर , और हर बार इन टूटे टुकड़ो को अपने ही हाथों से जमा किया है तुमने , संजोया है , और हर बार मैंने अपने हर टुकड़े से  तुम्हारी हाथो को जख्मी किया है। मेरे टुकड़ो को जमा करने में तुम्हारी अंगुलिया खून से सरोबार हो जाती थी , फिर भी तुम रुके नहीं।  हर बार मुझे ही चुनौती दी, चाहे जितनी बार बिखरना है बिखर , मैं यहीं हूँ , तुझे समेटने के लिए।   और कोई शिकायत भी नहीं , कोई उम्मीद भी नहीं। तुम्हारा दोषी हुँ मैं और तुम मोक्षदा ........क्यों तुम भगवान बन रहे हो, एक बार सिर्फ एक बार तो शिकायत कर , जीतेन्द्र तेरे बिखरे टुकड़े मुझे दर्द पहुंचाते है , कम से कम मुझे तेरे इंसान होने का भरम तो हो।  कभी कभी तो डर लगने लगता है कि कही तेरी इबादत करने ना  लग जॉन मैं।  और शायद इबादत भी कर लू तो भी तुम्हारी कोई चीज़ तुम्हे कभी वापस नहीं कर पाउँगा।  शायद खून का एक बूंद भी नहीं जो तुमने मुझे समेटने में गिराए थे। 
मोक्षदा .......तुम्हारा दोषी हूँ मैं , सज़ा दो मुझे। 




















Friday, January 24, 2014

the worst days....

पिछले तीन दिनों से मैं बहुत परेशां हूँ , एक तो वो २२ का रात में मुझे किसी ने कॉल किया और फिर परेशां किया , फिर कल एक चिड़िया मेरे बाइक के निचे आकर मर गयी और आज सुबह मेरी वजह से मेरे पीछे चल रहा बाइक सवार गिर कर घायल हो गया , और आज दिन में एक बन्दे ने मेरी झूठी शिकायत करी जिसकी वजह से मैं अभी भी परेशां सा महसुश कर रहा हुँ।  पता नहीं क्यों हो रहा है कुछ समझ में नहीं आ रहा है .पर सब कुछ बुरा नहीं होता , कुछ न कुछ अच्छा जरुर होता है और कोई न कोई अच्छा इंसान  जरुर   आस पास होता है , उम्मेद सिंह , आज यहाँ पर बैठा है और मेरे लिए खाना बना रहा है और सिर्फ यहाँ इसलिए है कि मैं  परेशां न रहूँ।।। सच है खुदा भी कभी कभी मेरे लिए नेमत बख्शता है। 

Tuesday, January 21, 2014

2014..Plz be good yar!

I don't know..what's going to happen with me in 2014.It was the very first day, was in Goa with best pals , wondering on beach..but deep inside there was just a hollow...somewhere mourning for something.....sitting on some rock ..idly watching the waves..coming n going ..asking God for the purpose of my existence, my nonchalance ... I use to say there are some questions, better not to be answered....but i again started to ask those questions to Almighty.....Why me?  why me ?..........And the soul gives me the best answer ..you are the chosen one ....
Just to cajole yourself..make yourself pleased...what's the purpose of my existence..just to wonder here n there in dusky desert of Rajasthan n earn some money...just to satisfy your social needs..where m I, just loosing my life , loosing my time..beginning of this year, i started to think abruptly about my life..started t feel like am in shackle, n wanted to break these shackles..i wanted to quit , quit this Job...this freaking bank...this freaking job...where m chained ...
Sometimes i feel like crying...but can't...i have to keep the promise..i see all around of myself, there is no one ..no one..m alone in this creepy desert....searching for just a drop of water..alas ..I lost everything, want to quit..just want to be home..in the arms of mom....crying like a newborn ...
So this is the starting of 2014...In the branch too , i feel , it's full of selfish person, everyone having their own reasons...n m having to no one to share a bit of it...it's only 22 days n m doomed...how's it gonna rest of 2014...please 2014 have mercy..be good...for God's sake !  

Thursday, January 9, 2014

खुशियां

अब तक तो इस खुशफहमी में जी रहा था कि शायद मैं खुशियां बांटता हूँ लेकिन पहली बार ये भी पता चला कि मैं खुशियों पर नज़र लगता हूँ।  चलो जी कम से कम पता तो चला.

अपनी बात करू तो मुझे खुद ही पता नहीं चलता कि मेरी खुशियां पता नहीं कहा गायब हो गयी है। कब कि तमन्ना थी शिर्डी जाऊ , लेकिन कोई उत्सुकता नहीं।  गोआ गया कोई भी ख़ुशी नहीं , मुम्बई सम्मी के पास ,कुछ भी नहीं।  फिर पहली हवाई यात्रा, फिर भी कुछ भी ख़ुशी नहीं। पता नहीं क्या हो गया है मेरी खुशियों को , या तो साला सारी खुशियां ही ख़तम हो गयी हैं या फिर मैंने मह्सुश करना ही बंद कर दिया है.

आज भी अहमदाबाद से आते वक़्त पता ही नहीं कैसा मह्सुश करने लग गया , सांचोर पहुंचते ही लगा कि इस बियाबान बंजर में एकदम अकेला , एकदम तनहा सा।  ऐसा तो पहले कभी मह्सुश नहीं किया। कुछ भी करने का , या किसी से बात भी करने का मन नहीं होता , एकदम नहीं , खाना बनाने या फिर खाने का भी मन नहीं करता। सच है यार एक शुद्ध निगेहबानी छीन गयी तो कितना बेतरतीब सा और कितना असुरक्षित सा मह्सुश करने लग गया हूँ मैं। 

जो कुछ भी हो , सिर्फ और सिर्फ यही सोच रहा हु कि मैं कभी भी किसी कि भी खुशियों को नज़र नहीं लगा सकता , कभी भी नहीं , कभी नहीं चाहे  मेरी खुशियां ख़तम ही क्यों ना हो जाये और चाहे क्यों न मैं कुछ भी मह्सुश करना ही बंद कर दूँ.

निष्पृह