Tuesday, April 15, 2014

गुमनाम है कोई , बदनाम है कोई.

20 साल बाद , हाँ यही नाम है ,बहुत पुरानी थ्रिलर है ,
और पता नहीं कितनी बार  सुन रखा है इस song को ,
रेडियो के गीतमाला में या फिर 10.30  के छायागीत प्रोग्राम में ,
और जितनी  बार सुनता हूँ  नया  ही होता है ,कभी पुराना  नहीं होता।
सच है रेडियो मेरी जिंदगी का हिस्सा रहा है और सदा रहेगा।                                                              
और जब जब मेरे जेहन में ये गीत गूंजता है, मुझे हमेशा जीने का एक नया सबक मिल जाता है.
और शायद जिंदगी की असलियत बयां कर जाता है :-                                                                                                                                                               
 गुमनाम है कोई , बदनाम है कोई, किसको खबर कौन  है वो ,अनजान है कोई......
किसको समझें हम अपना ,कल का नाम है एक सपना
आज अगर तुम जिन्दा हो , तो कल के लिए.....
कल के लिए माला जपना .......

पल दो पल की मस्ती है ,बस दो दिन की बस्ती है..
चैन  यहाँ पर महंगा है और मौत यहाँ .....
और मौत यहाँ पर सस्ती है ....

कौन बला तूफानी है , मौत को खुद हैरानी है ,
आये सदा विरानो से , जो पैदा हुआ
जो पैदा हुआ वो फ़ानी है .....
( फ़ानी -नश्वर )

Monday, March 31, 2014

Wednesday, March 26, 2014

6 महीने पूरे हुए सांचौर में

6 महीने पूरे हुए सांचौर में , पता ही नहीं  चला कि कैसे वक़्त निकल गया। 26 सितम्बर से कब 26 मार्च हो गया।  सच कहा गया है जिंदगी कभी रूकती नहीं , अनवरत चलती रहती है। चूक जाते हैं तो बस हम।  कभी खुद  पहचानने में या फिर या फिर कभी दुसरो को पहचानने में। देखते देखते पूरी जिंदगी ऐसे ही निकल जाती है।  बस खुद के लिए कुछ अच्छे पल निकाल लो या फिर कुछ अच्छे , बेहतरीन पल बुन लो। इन बेहतरीन पलों से ही तो जिंदगी बनती है , बाकी तो क्या है , जिंदगी ऐसे भी चलती रही है और वैसे भी चलती रहेगी।

 छोड़ो सनम काहे का गम , हँसते रहो , खिलते रहो।
मिट जायेगा सारा ग़िला , हमसे गले मिलते रहो :)

Saturday, March 22, 2014

Too lonely...

Sometimes I started to feel too lonely....too lonely...then what should i do..just listen songs...

In the darkest night hour..
I'll search through the crowd..
Your face is all that I see..
I'll give you everything..
baby love me lights out...
love me like XO...

Monday, March 10, 2014

बहुत बुरा हूँ मैं। ..

कभी कभी  मुझे अपने बहुत बुरे होने का अहसाश होता है , जब आप जब किसी का दिल दुखाते हो , वो भी जान बुझ कर। पर शायद जब आप किसी का दिल दुखाते तो सबसे जयादा तकलीफ खुद को ही होती है ,क्यूंकि तब तन्हाई में आपके अँधेरे कमरे का एक कोना आपके आंसुओ से भी सींची जाती है। ।लेकिन जिंदगी ऐसे ही चलती रहती है। .. It has been well said na ...Sometimes it good to be bad ...

Saturday, February 15, 2014

16 फ़रवरी।

 जिंदगी में वापस ये 16 फ़रवरी।  8 साल। .

Monday, February 3, 2014

तुम.....

काश तुम्हे शब्दों में मैं बांध पाता, तुझे ढाल पाता।  पर मुझे पता है तुम्हें शब्दों में कभी परिभाषित कर ही नहीं पाया और शायद ताउम्र नहीं कर पाउँगा। जिंदगी में कुछ चीज़े जरुर ऐसी होती है जिन्हे शब्दों की जरुरत होती ही नहीं, निःशब्द , और उनका निःशब्द होना ही बेहतर होता है। कभी वक़्त मिले तो शेखर की " शशी " को जरुर पढ़ना।।।

  मैं सोचता था ,यदि ऐसा न होकर वैसा होता , और वैसा होता ,और वैसा होता ,तो ......पर आज सोचता हूँ कि नहीं ,आज लगभग मांग रहा हूँ कि यदि कुछ हो तो ऐसा ही हो , छाया ,हम -तुम भी ऐसे ही हो -अलग पर सदा एक दूसरे की ओर अग्रसर होने में सचेष्ट ,साधारण अभिधा में गैर पर वास्तव में अखंड विश्वास में बंधे , धमनी के एक .........कर्म में तुम हो , चिरंतन प्रेरणा -चिरंतन क्यूंकि मुक्त और -मोक्षदा .......अज्ञेय (शेखर एक जीवनी से )

मोक्षदा , ये शब्द शायद तुम्हे आकर देने की छोटी सी कोशिश होगी।  हाँ शायद मोक्षदा ही हो तुम , जब जिंदगी की सतरंगी छटाओं में झूम रहा होता हूँ तो छोड़ देते हो मुझे मुक्त , निर्मुक्त। शायद ये अहसाश दिलाने के लिए कि मेरे लिए तुम कभी भी बंधन का रूप कभी नहीं बने। और जब जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तो में बेतरतीब हो रहा होता हूँ तो पता नहीं कहाँ से pop-up बन कर सामने आ जाते हो ," मैं हूँ न रे "। और इन शब्दों  में मुझे  जिंदगी जैसे वापस मिल जाती है। कोई शिकायत भी नहीं और न ही कोई उम्मीद । … No expectation n no demand".....पता नहीं किस मिटटी के बने हो तुम।  लोग मुझे कहते है , जिंदगी को ऐसे गुजारने के लिए तुम ऊर्जा  कहाँ से लाते हो।  और मैं यही सवाल तुमसे पूछा करता हूँ ,  और तब पाता  हूँ कि जिंदगी का हुनर तुमसे ही पाया है , सारी ऊर्जा वही से तो पाता हूँ।  मोक्षदा.......मुझे याद आने लगता है कि कितनी बार जिंदगी में बिखरा हूँ मैं ,शीशे के टुकड़े की तरह चकनाचूर , और हर बार इन टूटे टुकड़ो को अपने ही हाथों से जमा किया है तुमने , संजोया है , और हर बार मैंने अपने हर टुकड़े से  तुम्हारी हाथो को जख्मी किया है। मेरे टुकड़ो को जमा करने में तुम्हारी अंगुलिया खून से सरोबार हो जाती थी , फिर भी तुम रुके नहीं।  हर बार मुझे ही चुनौती दी, चाहे जितनी बार बिखरना है बिखर , मैं यहीं हूँ , तुझे समेटने के लिए।   और कोई शिकायत भी नहीं , कोई उम्मीद भी नहीं। तुम्हारा दोषी हुँ मैं और तुम मोक्षदा ........क्यों तुम भगवान बन रहे हो, एक बार सिर्फ एक बार तो शिकायत कर , जीतेन्द्र तेरे बिखरे टुकड़े मुझे दर्द पहुंचाते है , कम से कम मुझे तेरे इंसान होने का भरम तो हो।  कभी कभी तो डर लगने लगता है कि कही तेरी इबादत करने ना  लग जॉन मैं।  और शायद इबादत भी कर लू तो भी तुम्हारी कोई चीज़ तुम्हे कभी वापस नहीं कर पाउँगा।  शायद खून का एक बूंद भी नहीं जो तुमने मुझे समेटने में गिराए थे। 
मोक्षदा .......तुम्हारा दोषी हूँ मैं , सज़ा दो मुझे। 




















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