First closing on my own...hope all goes well...:)
Monday, March 31, 2014
Wednesday, March 26, 2014
6 महीने पूरे हुए सांचौर में
6 महीने पूरे हुए सांचौर में , पता ही नहीं चला कि कैसे वक़्त निकल गया। 26 सितम्बर से कब 26 मार्च हो गया। सच कहा गया है जिंदगी कभी रूकती नहीं , अनवरत चलती रहती है। चूक जाते हैं तो बस हम। कभी खुद पहचानने में या फिर या फिर कभी दुसरो को पहचानने में। देखते देखते पूरी जिंदगी ऐसे ही निकल जाती है। बस खुद के लिए कुछ अच्छे पल निकाल लो या फिर कुछ अच्छे , बेहतरीन पल बुन लो। इन बेहतरीन पलों से ही तो जिंदगी बनती है , बाकी तो क्या है , जिंदगी ऐसे भी चलती रही है और वैसे भी चलती रहेगी।
छोड़ो सनम काहे का गम , हँसते रहो , खिलते रहो।
मिट जायेगा सारा ग़िला , हमसे गले मिलते रहो :)
छोड़ो सनम काहे का गम , हँसते रहो , खिलते रहो।
मिट जायेगा सारा ग़िला , हमसे गले मिलते रहो :)
Saturday, March 22, 2014
Too lonely...
Sometimes I started to feel too lonely....too lonely...then what should i do..just listen songs...
In the darkest night hour..
I'll search through the crowd..
Your face is all that I see..
I'll give you everything..
baby love me lights out...
love me like XO...
In the darkest night hour..
I'll search through the crowd..
Your face is all that I see..
I'll give you everything..
baby love me lights out...
love me like XO...
Monday, March 10, 2014
बहुत बुरा हूँ मैं। ..
कभी कभी मुझे अपने बहुत बुरे होने का अहसाश होता है , जब आप जब किसी का दिल दुखाते हो , वो भी जान बुझ कर। पर शायद जब आप किसी का दिल दुखाते तो सबसे जयादा तकलीफ खुद को ही होती है ,क्यूंकि तब तन्हाई में आपके अँधेरे कमरे का एक कोना आपके आंसुओ से भी सींची जाती है। ।लेकिन जिंदगी ऐसे ही चलती रहती है। .. It has been well said na ...Sometimes it good to be bad ...
Saturday, February 15, 2014
Monday, February 3, 2014
तुम.....
काश तुम्हे शब्दों में मैं बांध पाता, तुझे ढाल पाता। पर मुझे पता है तुम्हें शब्दों में कभी परिभाषित कर ही नहीं पाया और शायद ताउम्र नहीं कर पाउँगा। जिंदगी में कुछ चीज़े जरुर ऐसी होती है जिन्हे शब्दों की जरुरत होती ही नहीं, निःशब्द , और उनका निःशब्द होना ही बेहतर होता है। कभी वक़्त मिले तो शेखर की " शशी " को जरुर पढ़ना।।।
मैं सोचता था ,यदि ऐसा न होकर वैसा होता , और वैसा होता ,और वैसा होता ,तो ......पर आज सोचता हूँ कि नहीं ,आज लगभग मांग रहा हूँ कि यदि कुछ हो तो ऐसा ही हो , छाया ,हम -तुम भी ऐसे ही हो -अलग पर सदा एक दूसरे की ओर अग्रसर होने में सचेष्ट ,साधारण अभिधा में गैर पर वास्तव में अखंड विश्वास में बंधे , धमनी के एक .........कर्म में तुम हो , चिरंतन प्रेरणा -चिरंतन क्यूंकि मुक्त और -मोक्षदा .......अज्ञेय (शेखर एक जीवनी से )
मोक्षदा , ये शब्द शायद तुम्हे आकर देने की छोटी सी कोशिश होगी। हाँ शायद मोक्षदा ही हो तुम , जब जिंदगी की सतरंगी छटाओं में झूम रहा होता हूँ तो छोड़ देते हो मुझे मुक्त , निर्मुक्त। शायद ये अहसाश दिलाने के लिए कि मेरे लिए तुम कभी भी बंधन का रूप कभी नहीं बने। और जब जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तो में बेतरतीब हो रहा होता हूँ तो पता नहीं कहाँ से pop-up बन कर सामने आ जाते हो ," मैं हूँ न रे "। और इन शब्दों में मुझे जिंदगी जैसे वापस मिल जाती है। कोई शिकायत भी नहीं और न ही कोई उम्मीद । … No expectation n no demand".....पता नहीं किस मिटटी के बने हो तुम। लोग मुझे कहते है , जिंदगी को ऐसे गुजारने के लिए तुम ऊर्जा कहाँ से लाते हो। और मैं यही सवाल तुमसे पूछा करता हूँ , और तब पाता हूँ कि जिंदगी का हुनर तुमसे ही पाया है , सारी ऊर्जा वही से तो पाता हूँ। मोक्षदा.......मुझे याद आने लगता है कि कितनी बार जिंदगी में बिखरा हूँ मैं ,शीशे के टुकड़े की तरह चकनाचूर , और हर बार इन टूटे टुकड़ो को अपने ही हाथों से जमा किया है तुमने , संजोया है , और हर बार मैंने अपने हर टुकड़े से तुम्हारी हाथो को जख्मी किया है। मेरे टुकड़ो को जमा करने में तुम्हारी अंगुलिया खून से सरोबार हो जाती थी , फिर भी तुम रुके नहीं। हर बार मुझे ही चुनौती दी, चाहे जितनी बार बिखरना है बिखर , मैं यहीं हूँ , तुझे समेटने के लिए। और कोई शिकायत भी नहीं , कोई उम्मीद भी नहीं। तुम्हारा दोषी हुँ मैं और तुम मोक्षदा ........क्यों तुम भगवान बन रहे हो, एक बार सिर्फ एक बार तो शिकायत कर , जीतेन्द्र तेरे बिखरे टुकड़े मुझे दर्द पहुंचाते है , कम से कम मुझे तेरे इंसान होने का भरम तो हो। कभी कभी तो डर लगने लगता है कि कही तेरी इबादत करने ना लग जॉन मैं। और शायद इबादत भी कर लू तो भी तुम्हारी कोई चीज़ तुम्हे कभी वापस नहीं कर पाउँगा। शायद खून का एक बूंद भी नहीं जो तुमने मुझे समेटने में गिराए थे।
मोक्षदा .......तुम्हारा दोषी हूँ मैं , सज़ा दो मुझे।
Friday, January 24, 2014
the worst days....
पिछले तीन दिनों से मैं बहुत परेशां हूँ , एक तो वो २२ का रात में मुझे किसी ने कॉल किया और फिर परेशां किया , फिर कल एक चिड़िया मेरे बाइक के निचे आकर मर गयी और आज सुबह मेरी वजह से मेरे पीछे चल रहा बाइक सवार गिर कर घायल हो गया , और आज दिन में एक बन्दे ने मेरी झूठी शिकायत करी जिसकी वजह से मैं अभी भी परेशां सा महसुश कर रहा हुँ। पता नहीं क्यों हो रहा है कुछ समझ में नहीं आ रहा है .पर सब कुछ बुरा नहीं होता , कुछ न कुछ अच्छा जरुर होता है और कोई न कोई अच्छा इंसान जरुर आस पास होता है , उम्मेद सिंह , आज यहाँ पर बैठा है और मेरे लिए खाना बना रहा है और सिर्फ यहाँ इसलिए है कि मैं परेशां न रहूँ।।। सच है खुदा भी कभी कभी मेरे लिए नेमत बख्शता है।
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कभी कभी मैं सोचता हूँ कि मैं कहाँ आ गया , और कहाँ जा रहा हूँ , न तो कोई मंजिल है और न ही कोई रास्ता, बस जीना है तो जिए जारहाहूँ, क्या यही हो...
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I don't know..what's going to happen with me in 2014.It was the very first day, was in Goa with best pals , wondering on beach..but...
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Good Story and a lot of history.... M loving it ..It seems Hindi is also comlicated foe me..Complicated words by author ....But m learni...