Tuesday, April 27, 2021

निष्पृह

बहुत दिन हो गए और बहुत कुछ जीवन प्रवाह बह चूका। कुछ लिखा नहीं मैंने , वैसे लिखने को कुछ था भी नहीं। जीवन में जब तारतम्यता न हो तो वैसे ही मन निष्पृह हो जाता है। इच्छारहित। 

 

2 साल हुए शादी को , और नन्हा मुन्ना बाबू भी धरती पे आ चूका। याद करता हूँ , सितम्बर का महीना जो बहुत भयावह था। सोचता था लिखूंगा उस अनुभव को पर शायद अब तक मूड न बन पाने की वजह से लिख नहीं पाया। अब चूँकि अपने पास करने को कुछ हैं नहीं तो सोचता हूँ अपने अनुभव को ही शब्द रूप दूँ। 

बहुत दुःख होता है कि मैं एक ऐसी संस्था में काम कर रहा हूँ जिसने हमेशा मुझे पीड़ा ही दी है। हमेशा से , और लगभग तब से जब से मैं यहाँ आया , तबसे इसे छोड़ने का यत्र तत्र परयत्न कर रहा हूँ ,लेकिन किस्मत और भाग्य दोनों को यह मंजूर नहीं है। लगभग 12 साल हो आये , यहीं घुटता हूँ , पिसता हूँ , लेकिन छोड़ नहीं पता। कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है मेरे पास। 

Saturday, October 5, 2019

तुम ही आना ....

बहुत आयी गयीं यादें ,
मगर इस बार तुम ही आना।


तुम आओगे मुझे मिलने ,
खबर ये भी तुम ही लाना।

जुबिन नौटियाल का स्वर और शब्द हैं कुणाल वर्मा के.

लगातार सुन रहा हूँ इस गाने को , और मज़बूर हो गया हूँ कुछ लिखने के लिए. लगभग २ साल के बाद मेरे अपने ब्लॉग में कुछ लिखना हो रहा है। हाँ अब शादी हो गयी है मेरी और कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गया हूँ। सबकुछ भूल कर , छिना कर , सामान्य सा जीवन जीने की कोशिश करने लगा हूँ। एक आम आदमी का जीवन जैसा होना चाहिए , ठीक एकदम वैसा ही।

ये गाना सुनकर बहुत कुछ फ़्लैश बैक में आ रहा है जा रहा है।

बहुत आयी गयीं यादें ,
मगर इस बार तुम ही आना।


किस किस की यादें आ रही हैं और जा रही हैं , समझ ही नहीं पा रहा हूँ। बचपन से हर वो शख्स जिससे कुछ यादें  जुडी हुई है , टूट टूट कर आ रही है. 





Saturday, November 4, 2017

मैला आँचल.......

    अभी अभी ही ख़तम की हैं फणीश्वर नाथ रेणु लिखित ये किताब।  बहुत कुछ अपने जैसा , अपने घर गांव जैसा। मैं बिहार  कभी नहीं रहा हूँ ,सिर्फ 1 ,2  बार ही जाने का मौका मिला है। समझता हूँ कुछ ज्यादा फर्क नहीं है वहां और हमारे यहॉ।  सब कुछ एक समान हैं सोंधा सोंधा , माटी के महक जैसा। मुझे अपने पुरखो के घर में अधिक दिनों तक रहने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है , जिंदगी की  आपाधापी में सब कुछ पीछे छूट गया है मेरा।  खैर ,जब आप  किसी उपन्यास को कहानी को पढ़ रहे होते हो तो आप खुद उस कहानी से अपने आप को जोड़ लेते हो। उसके किसी पात्र में खुद को ढूंढ लेते हो या किसी पात्र के करीब हो जाते हो। मैं लक्ष्मी कोठारिन को सबसे शसक्त किरदार मानता हूँ। सर्वस्य समर्पण और निश्वार्थ सेवा ,अपने आस पास भी ऐसे बहुत से किरदार होते हैं जो अनसुने से अनछुवे से रह जाते हैं। डॉक्टर प्रशांत और कमली भी ,रेणु  जी ने शरतचंद्र जी को भी करीने से नमन किया हैं। शरतबाबू के उपन्यासों की यह नारी अपने विश्वाश पर अडिग होकर आज भी आगे बढ़ रही है ,रूप बदल दो ,नाम बदल दो , समय बदल दो ,पर यह कभी बदल नहीं सकती। और यह सिर्फ शरत की ही नारी नहीं है पुरे भारत वर्ष की नारी है। हमारे  आस पास की ही माँ,पत्नी ,बहन या किसी और रूप में। वो है तो यही कहीं ,यहीं कहीं अपने आस पास। गोदान पढ़ी थी कुछ दिनों पहले उसमे भी थी वो धनिया शरत बाबू की नारी ,अपने विश्वाश पर अडिग होकर बढ़ने वाली।
                   मैला आँचल की एक और नारी है जिसके बारे में शायद बहुत कम चर्चा हुई है ,कमली की माँ , विश्वनाथ तहसीलदार की पत्नी। कड़ी यातना के क्षणों में अपनी पुत्री के पक्ष में खड़ी  ,पति  और बेटी दोनों के बिच का सामंजस्य। मेरी बेटी का कोई दोख नहीं..... माँ रो पड़ती है,"कमली का कोई कसूर नहीं। डॉक्टर ने फुसलाकर उसका सत्यानाश किया है। माँ का दुःख अब कौन समझे।
        आंचलिकता ,सबसे बड़ी खासियत रही है रेणु जी की। पढ़ते हुए लगता जैसे सब कुछ अपने आस पास का ही है। अपना ही है। और यही ......

Thursday, October 19, 2017

राजू....

   आज दिवाली की रात है और जग जगमग है और जब बहरी परिवेश जगमग होता है तो अंदर का अँधेरा खुलकर बाहर आ ही जाता है। इंसान का माज़ी कभी उसका पीछा नहीं छोड़ती और इंसान को भी अपने माज़ी से मोहब्बत करना आना ही चाहिए। और अगर इस अँधेरे में कोई देवता सा हो तो....
     कम से कम मेरे लिए तो वो देवता ही था। जिंदगी के उस श्याह अँधेरे को अगर मै भूल भी जाऊ उस देवता को कभी नहीं भुला पाउँगा।  भूखे को भोजन देना सबसे बड़ा पुण्य कार्य कहा गया है ,भगवन की सबसे बड़ी भक्ति कही गयी है। और उस वक़्त सबसे बड़ी भक्ति ही कर रहा था वो। बड़ी दीदी भी याद आती है ,बस नतमस्तक हो जाने को मन करता है। क्या क्या लिखू उस वक़्त जो गुजरा था ,कहते हैं सब बुरी बातों को भूल कर उनमे छुपी अच्छी यादो को संजो कर रखना चाहिए। और उस वक़्त की केवल एक ही अच्छी याद है...राजू।
       आज इतने साल हो गए ,न कभी उसकी खबर मिली और ना ही उसे मिल पाया। शायद पता नहीं कहाँ हो। पता नहीं जीवन के किस दौर में हो। इस बार घर जाऊंगा तो कोशिश करूँगा कुछ खबर मिले उसकी। भगवान से प्रार्थना करता हूँ उसका जीवन भी उतना ही बड़ा हो जितना बड़ा उसका दिल था। दिल में हमेशा से दुआ उठती है कभी मिलु तो कहूं राजू जीवन के उन दिनों का जो अहसान है कभी मौका देना ,कुछ हल्का कर पाऊं।  जनता हूँ जन्मो जन्मो तक तुम्हारा वो अहसान नहीं चूका पाउँगा भाई। तुम कुछ भी न थे ,कुछ भी नहीं ,पर तुमने जो मेरे लिए किया वो तुम्हारे बड़प्पन को और बड़ा कर देता है।तब शायद नवी या दशवी में था मैं ,14 या 15  साल का,और अब जिंदगी का उतना ही हिस्सा और गुजर चूका है,रहा सहा वो भी गुजर जायेगा ,बस इसके गुजर जाने से पहले भगवान से दुआ करूँगा कि तुमसे एक बार तो मिला दे ,कम से कम धन्यवाद तो बोल पाऊं।  

Monday, October 16, 2017

प्रारब्ध....

                      सब प्रारब्ध का ही फल है। बहुत मेहनत करता हूँ कि अपने आप को खुश रखूं , पर ये हो नहीं पाता। कुछ न कुछ तो बना ही रहता है। चलो सब प्रारब्ध ही है अपना तो बस यही कर्त्तव्य है कि कर्म करते रहो ,अच्छा और बुरा होना तो भगवान के हाथो में होता है। और जब भी कुछ बुरा हो बस यही सोचना है कि चलो पिछले जनम का कोई पाप कटा। भाग्यवादी होना भी अच्छा होता है। 

Friday, September 1, 2017

भुखमरिया

भुखमरिया ,ये शब्द मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा रहा है ,और शायद अब ये मेरी नियति में छप गया है। इस शब्द को मैंने डिक्शनरी में भी ढूंढने की कोशिश की और इसका अर्थ मिला भूख से मरने की अवस्था और मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ इस अर्थ से। शायद इसका अर्थ होना चाहिए सब कुछ होते हुए भी भूख से मरने की अवस्था।
                 अब शुरुआत करता हूँ कि कब मेरा इस शब्द से पाला पड़ा ,बहुत पूरानी बात है,एक बहुत अच्छे ओहदे पर बैठा व्यक्ति जब हाफ प्लेट तड़का,2 रोटी और आधी कप चाय से अपना पेट भर लेता हो तो भुकमरिया शब्द जेहन में चस्पा हो जाता है। और इस बहुत पुरानी बात को याद करता हूँ तो ऐसा लगता है कि मैं ठीक वहीँ बैठा हूँ ,2 रोटी हाफ प्लेट तड़का और फिर आधी चाय। उस व्यक्ति को याद करता हूँ और वहां खुद को पाकर मुस्कुरा पड़ता हूँ। कल ही एक मित्र से बात कर रहा था ठीक कहा भाई ने तुम इतना सोचते हो इसलिए ही ये शब्द तुम्हारे आस पास ही भटकता रहता है।
    बैंकिंग में हूँ तो थोड़ा बहुत अर्थशास्त्र भी पढ़ लेता हूँ , तो बहोत पहले पढ़ी थी ,Cycle of poverty ,गरीबी का दुःश्चक्र ,कहते है गरीबी जब एक बार पीछा पकड़ लेती है तो कितनी भी कोशिश करो ख़तम नहीं होती ,चलती रहती है ,चलती रहती है जब तक कोई बहरी प्रभाव न पड़े. कम से कम ३ पीढ़ियों तक ,चाहे कोई कितना भी क्यों न कमा ले।  तीन पीढ़ियों तक तो वो परिवार भुखमरिया ही बना रहेगा। अब सोचता हूँ कितना बड़ा अनुभव रहा होगा और कितना सच्चा अनुभव रहा होगा इस थ्योरी को लिखने वाले का।
        चलो अब बात कुछ और भी करते हैं ,चलो बहुत कमाने लग गए ,खूब पैसा फिर भी ये भुखमरियागिरि कभी ख़तम नहीं होगी , क्यूंकि जो अनुभव इस दुष्चक्र में पड़  चुका होता है वो कभी पीछा नहीं छोड़ेगा।  पैसे खूब कमा लोगे लेकिन ट्रैन के जनरल डिब्बे में ही सफर करना ज्यादा अच्छा लगेगा ,अपनापन तो वहीँ मह्सुश होगा न। एयरपोर्ट की 15 ,20 हज़ार तनख्वाह वालो से तो आप बात ही नहीं कर पाएंगे ,भुखमरियागिरी  आड़े जाएगी न। डोमिनोस या केएफसी से आर्डर करने से ज्यादा बेहतर सड़क के किनारे लगे थडियो और ठेलो का स्वाद ही भला लगेगा। रेमंड्स ,लेवाइस ,लाइफस्टाइल के शोरूम से बेहतर तो वही फुटपाथिया कपडा ,हाँ जी सही पकडे हैं रांची मेन रोड हनुमान मंदिर के पीछे 100 रुपया ,100 रूपया वाला कपडा ही मन को भायेगा। भुखमरिया गिरी ही है भाई।
  बस बहुत लम्बा निबंध लिखा जा सकता है , ये जो शब्द चस्पा हैं न जिंदगी में , बहुत लम्बा। और लिखूंगा भी लेकिन अभी नहीं फिर कभी।

Monday, April 17, 2017

Thanks to Almighty

M home,remembering all stuff went through for last 10 years,agony,pain,suffering.although it's 10 years and m still standing under the electricity pole in front of my house,counting stars...thanking almighty for all these years standing by me side ,making me strong,strong enough to bring smile on the faces of my family...m not the day dreamer m content with what I have and ...I thank God Almighty for the same...

Friday, January 13, 2017

When you suffer, suffer joyfully...

कहते हैं न कि जब suffering आता है तो बिना कहे आता है ,और सब तरफ से आता हैं , हम कितने भी ज्ञानी क्यों न हो जाये कितने बड़े क्यों न हो जाये , बड़ी बड़ी बातें क्यों न कर ले , जब वक़्त बुरा होता है तो ये सब कुछ सिर्फ मन को बहलाने के काम आता है।  वास्तव में दुःख मनुष्य के मन का स्टेट है और उसे सिर्फ वही मह्सुश कर सकता है जिसके साथ वो होता है।  मैं गीता की, कर्मा की, प्रारब्ध की, बातें क्यों न कर लूँ , लेकिन जब अपने जन्मदिन पर अपने सबसे पुराने और अच्छे दोस्तों का फ़ोन नहीं आता, भाई दुःख तो बहुत होता है। और वह भी तब जब आपके गृह बहोत बुरे चल रहे हो और आप खुद को बहोत लो फील कर रहे हों।

सच हैं की पुरानी दोस्ती को महज इस बात से तौला नहीं जा सकता कि, आपके जन्मदिन पर शुभकामनाये नहीं दी गयी ,पर यह भी सच है की आपकी छोटी सी जिंदगी भी इन्ही छोटी छोटी चीजों से बनी होती है। मैंने इस ब्लॉग को पिछले लगभग १ डेढ़ सालो से छोड़ रखा हैं और आज इसे वापस पढता हूँ तो लगता हैं की जरुरी हैं कि इसे जारी रखा जाना चाहिए , कम से कम अपनी भावनाओ को शब्द तो देने में समर्थ रहूँ, वार्ना ऐसा न हूँ की शायद अपने भावनायों को , दुःख को , अपनी खुशिओं को व्यक्त करना भी भूल जाऊ।
suffering का जो दौर चल रहा है अपने  जीवन में , पता नहीं कब ख़तम हो।  पर इतना तय है इस दफा भी मैं कुछ मजबूत होकर और कुछ अच्छा बनकर निकलूंगा। कहते हैं न ,Whatever comes to you , accept it gracefully.When you suffer suffer It  joyfully. जब  आपके खिलाफ परिस्थितियां हो जाये और आप एकदम लाचार हो जाये आपको चुपचाप किनारे बैठ कर वक़्त को गुजर देने देना चाहिए। जब अच्छा वक़्त निकल गया तो बुरा भी निकल जायेगा। अकेलेपन का ये दौर भी निकल जायेगा, बहुत कुछ अच्छा सीखा जायेगा और बहुत कुछ अचछा बना जायेगा।


                      

Saturday, November 26, 2016

कुछ यूँ ही...

ये कहानी हमारी ही थी ,पर लफ्जो को मुस्कुराना तो तुमने ही सिखाया था, कुछ पन्ने स्याह थे उसके ,पर हर पन्ने पर नाम तुम्हारा था

Thursday, January 29, 2015

Nervous breakdown.....

ho jata hai kabhi kabhi mera bhi nervous breakdown.......beer pita hun , fir to aur jayda.....bahot rone ka man karta hai..akela hota hun ....aisa lagta hai jaise apane hone ka koi matalab nahi hai ...kuch bhi nahi ....bus waqt hi to katna ...pata nahi main kyu itani mehnat karta hun ..kya purpose...sab kuch faltu.........

aakhir main bhi ek insan hun....

Thursday, January 1, 2015

अलविदा 2014 , नववर्ष 2015 शुभ हो सबके लिए।

तो अब 2014 ख़तम और नया साल शुरू।
साल दर साल तो ख़तम होते ही चले जाते है। मुझे याद आता है गोवा से वापस आते हुए सिर्फ मैंने यही दुआ की थी कि ,2014 be good yar . और आज जब खुद को तौलता हूँ तो यही पाता हूँ, 2014 तो सही मैं अच्छा अच्छा गुजर गया और अब 2015 से यही wish करता हूँ।  2015 please be best yar

याद करता हूँ 2014 की शुरुआत बहुत खूबसूरत गोवा की हसीं वादियों में हुई थी। और साला पता नहीं कैसे पूरा साल गुजर गया। खास कर बीच अक्टूबर से तो वक़्त ऐसे गुजर जाया ,कुछ पता ही नहीं चला। सबसे बड़ी बात तो ये कि मेरा confidence boast -up हो गया मेरे भाई। जिसकी मुझे बहोत जरुरत थी।

ये साल खूब घूमना फिरना भी हुआ ,गोवा , हैदराबाद , अहमदाबाद ,जोधपुर ,जयपुर ,बीकानेर ,दिल्ली ,पटना ,राजगीर ,नालंदा और सबसे अंत में हरिद्वार। … 2015 एक chota foreign trip करा दो भाई।

बस एक resolution है अपनी जिंदगी के लिए 2015 में , देखता हूँ पूरा कर पाता हूँ या नहीं।
जय साईं भगवान।

। तब तक एक खूबसूरत गाना सुन लूँ।


This love is a blaze
I saw flames from the side of the stage
And the fire brigade comes in a couple of days
Until then we got nothing to say and nothing to know
But something to drink and maybe something to smoke


Thursday, December 25, 2014

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया ……

बेगम अख्तर को सुनिए ,
सच कहता हूँ , जब आप एकदम अकेले होंगे , तो आपको ये एक पूरी  दुनिया बख्सता है

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया ……
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

यु तो  हर शाम उम्मीदों  गुजर जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया



Sunday, December 21, 2014

सपने .....

किसी ने सही कहा है ,सपने वो नहीं होते जो आप सोकर देखते हो।
सपने तो वो होते है जो आपको सोने नहीं देते। ..

एक नयी शुरुआत करनी है अब
फिरसे अपने सपने के लिए 

Tuesday, October 7, 2014

एक बहुत बुरा सपना।

आज रात करीब 1.30 मेरी नींद खुल गयी , क्यूंकि मैं एक बहुत बुरा सपना देख रहा था। मैं अचानक से काफी डर गया और काफी देर तक मैं उसी सपने के बारे में सोचने लगा। एक खूबसूरत लड़की,मेरी मंझली बहन , बैंक का कोई अधिकारी और वो 2 लोग जो बाद में दैत्य बन गए थे। फिर जब नींद नहीं आ रही थी तो मैं टीवी खोलकर कुंगफू पांडा देखने लग गया और फिर वापस करीब 3 बजे के आस पास मुझे नींद आई

सुबह जब मैं जागा तो मेरा सर दुखने लगा था ,शायद मैं ये सोच कर भी डरा की पता नहीं इस सपने का क्या मतलब है ,पता नहीं क्या सूचित कर रहा है ये सपना। या   पता नहीं कोई रूह पास से होकर गुजर गया हो। अभी interpretation of dreams पढ़ रहा था। ये धोखे की सम्भावना व्यक्त कर रहा है ,मुझे सावधान रहना है। 

Saturday, October 4, 2014

Oh, won't you stay with me? Cause you're all I need

Oh Beautiful song....

Oh, won't you stay with me?
Cause you're all I need

http://www.youtube.com/watch?v=pB-5XG-DbAA

Thursday, September 25, 2014

oh yes 26th Sept....one year gone...

Yup...This is the day when I joined bichawadi branch ,year ago.......A day before left Nimbahera to join this place..I was just counting..oh One month gone, three months gone and now A year...सच कहा गया है भाई , वक़्त कहाँ किसी के लिए रुकता है। … चूक जाते है तो बस हम।  सबकुछ गुजरता चला जाता है और हमे कुछ पता ही नहीं चलता।  जिंदगी ऐसी ही चलती है।

याद तो रह जाते है कुछ नमूने।  कभी जन्मदिन के बहाने तो कभी किसी बिखरे हुए पन्ने में कोई टूटा गुलाब का पत्ता हमे हमे बहुत कुछ याद दिला जाता है।  सच है यार एक साल पहले ,ठीक इसी दिन जब मैं निम्बाहेड़ा छोड़ आया था तो कभी ये ना सोचा था कि मैं इस कदर सांचोर से प्यार करने लगूंगा। पर प्यार तो मुझे हर उस जगह से हो ही जाता है जहाँ मुझे रहना होता है , पहले बारां फिर दिल्ली ,फिर भीलवाड़ा , निम्बाहेड़ा और अब सांचोर। 

हमेशा कहा करता हूँ , जहाँ जितना वक़्त अच्छा गुजर जाये, गुजार  लो , फिर पता नहीं क्या हो। अब यहाँ अच्छा वक़्त जितना गुजर जाये उतना बढ़िया।

ओह, प्यार से मुहब्बत शब्द भी याद हो आया।  वाहियात शब्द है। पर जो भी हो आजकल तो ऐसा लगता है जैसे मोहब्बत का एक जमाना गुजर गया।  हाँ जी गुजरते गुजरते तो सब कुछ ही गुजर,बिखर जाता है।  न तो जिंदगी में कोई कशिश है और न ही कोई खलिश। वक़्त के साथ अब तो ऐसा लगता है हम भी दराज़ हो रहे है।
कभी कभी जब मैं field में जाता हूँ तो रेगिस्तान के किसी धोरे पे अचानक ठिठक कर खड़ा हो जाता हूँ। निर्विकार ,निर्मोही।  यहाँ का एकाकी,अकेलापन , सूनापन अपना सा लगता है।  कभी कोई आवाज़ आती है दूर से ,किसी के गीतों की।  लोकगीतों की।  तो मैं समझ नहीं पाता , पूछता हूँ तो पता चलता है रेगिस्तानी निर्जीव जीवन में इन्ही लोकगीतों ने रंग भरा है। जिंदगी के विरानेपन को , तन्हाई को शब्दों में रंगा है।   हुह , ये रेगिस्तान , ये तन्हाई और ये रंग।  इस वीरानी जिंदगी में रंग वक़्त के साथ मज़ाक सा लगता है।

इन्ही रंगो को जब तौलता हूँ तो अचानक लगने लगता है वास्तव में जिंदगी खूबसूरत है। दूर दूर रेगिस्तान के टीले ,अपने आप को बचाये रखने की जद में जिंदगी और इसी जद्दोजहद में गीतों का रंग. जीवन का रंग। विरह की ना खत्म होने वाले पल और उन्ही पलो की वीरानी। माशा अल्लाह , अब तो ये रंग और ये गीत मेरे वजूद का हिस्सा है.। वो कहा करता था न मैं …………" तेरे बिना क्या वजूद मेरा "
और भी कहीं सुना था इन रेगिस्तानों में पहले कहीं नखलिस्तान हुआ करता था। सबके अपने रंग थे। बहारें थी। … ठीक अपनी तरह। …। हा हा हा।
हाँ जी मुकद्दर का भी अपना खेल होता है। अब ना तो किसी के फ़ोन आने का टेंशन होता है और ना ही किसी को फ़ोन करने का।  डर भी लगने लग जाता है किसी अशुभ की या किसी अपशगुन की। 27 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। अजीब तरह का टेंशन मुक्त रहने लग लगा हूँ और अकेला मस्त। पर शायद असुरक्षित भी। हाँ मैं हर वक़्त अपने आपको असुरक्षित मह्सुश करने लग गया हूँ …………………………………………बिन तेरे वास्तव में असुरक्षित हूँ मैं , मैं क्या मेरा पूरा वजूद भी । पर आदत तो डालनी पड़ती है। कहते है न किसी को इतना भी दूर मत करो की वो हमेशा के लिए दूर हो जाये …………………………………………आमीन।  












Saturday, September 20, 2014

Aloof, alone and isolated...

Once again started to feel isolated, alone aloof and abandoned.Yup and that's for true.How long you hold you emotions... month or more...it's almost a year...feeling lyk abandoned ...somewhere in this cruel world.....there is no one to tell me that i needed to tell them the sound of my room's lock..so that they may assure that m home...m safe n m good...I know life moves on that it must...but alas m human ...i can feel, i can cry ......have a heart ....having always in conflict with my brain ......

   May be I was not good, never was....got punished for my deeds...or may be the मेरे प्रारब्ध का फल ....may be....I don't know ..how bad i was in my previous birth ....so what..m paying my karma....being punished or being isolated ...may cut my कर्म फल....
   what I started to do...i started to be a runaway ...yes exactly this is the best word...m a runaway...मैं भाग रहा हूँ , खुद से और खुद के होने से। i miss my whole days....when i was missed n now m abandoned...abandoned..abandoned....

Thursday, September 4, 2014

गिरहें ....

पता नहीं कितने गिरहें अभी बाकी है। जिंदगी की कितनी परतें हैं और कितने गिरहें हैं ,पता ही नहीं चलता। और सारी गिरहें खोलना संभव ही नहीं है। आजकल तनहा होता हूँ और बेतरतीब सा भी , वक़्त भी ऐसे गुजर जाता है , कुछ पता ही नहीं चलता , अपने आप को busy रखना सीख रहा हूँ।  सच है की खाली वक़्त में बुरी यादें तो परेशान करती है , अच्छी यादें भी कम नहीं। 
   खैर हर गुजरते पल के साथ जिंदगी का एक कतरा गुजर जाता है।  हम जिन लम्हों के इन्तेजार में बरसों से खड़े होते हैं वो , इन्ही लम्हों में चुपचाप सा गुजर जाता है। तो बस सीखता हूँ , जिंदगी जीने की कला,लम्हों में जीने की कला और इन्हीं लम्हों में खुश रहने की कला। 
    जिनसे कुछ लिया उन्हें कुछ दे पौन पाऊं , किन्हीं के मुस्कुराने की वजह बन पाउ या बना पाऊं , उससे बड़ी इबादत क्या होगी। 

Monday, August 18, 2014

अन्यमनस्क।

एक बार फिर से अन्यमनस्क सा महसूस करने लगा हूँ मैं।  पिछले कुछ दिनों की लगातार भागादौड़ी ने भी मुझे परेशान कर दिया है। पर जब तक जिंदगी है तब तक परेशानी साथ साथ ही लगी है।

  20 जून से लगातार ही घूम दौड़ रहा हुँ मैं। सांचोर से जोधपुर ,फिर दिल्ली ,पटना ,नालंदा ,राजगीर ,बोधगया और फिर चंदवा।  चंदवा से वापस सांचोर , सांचोर से जोधपुर , फिर वापस सांचोर ,और पिछले सप्ताह बीकानेर और पिछले 3 दिनों से मेरा माउंट आबू प्रवास। और अब एकदम थका सा महसूस कर रहा हु , फिर भी इस सप्ताहांत में मुझे जयपुर जाना है , जाना ही होगा ,मज़बूरी है। पर अब एकदम सोच रखा है अब इस साल के बाकी बचे महीनों में कहीं भी नहीं जाऊंगा।

कुछ और चीज़ें भी मुझे याद कर लेना चाहिए। घर में हुई 27 जुलाई की घटना ने मुझे एक नए तरह के डर से रूबरू कराया।  एक ऐसा डर जिसने मेरे खुद के होने के अहसास को ही झकझोर कर रख दिया। सच है डर  बहुत जरुरी है। एक वक़्त को तो ऐसा लगा जैसा कि मेरा सब कुछ ख़तम ,मेरा खुद का वुज़ूद भी। मेरी इतने सालों की मेहनत सिर्फ और सिर्फ बेमानी थी बाकि कुछ भी नहीं था। पर ये भी सच है कि कुछ चीज़ो को होने से आप रोक नहीं सकते ,वो अपनी नियति के के मुताबिक घटेंगी ही घटेंगी। बस अब आपको उनको स्वीकार कर के चलना है।

ऐसे सच नहीं है कि आपके साथ हमेशा बुरा ही होता है। अच्छा भी होता है। परसों की ही बात ले , रात के 10 बज रहे थे और साथ में रिमझिम बारिश , जब हम माउंट आबू पहुंचे थे , पूरा आबू ठसाठस भरा हुआ था ना तो हमें कोई होटल मिल रहा था और ना ही कोई मकान और हम जहाँ तहाँ भटक रहे थे कि कहाँ रात काटी जाये और अचानक अपना गेस्ट हाउस दिख गया , बिना बुकिंग के भी हमने निवेदन किया और हमे ठिकाना मिल गया। अकस्मात् ही शीश उस विधाता के आगे झुक जाते है। धन्यवाद और प्रार्थना साथ साथ ही गुंजायमान हो उठते हैं। और साथ ही  मन ये भी बोल उठता है कि कहीं न कहीं प्रारब्ध में कुछ पुण्य कर्म संचित तो जरूर हैं।  

Sunday, July 13, 2014

Nothing

Sometimes i feel tat m not happy nor m i sad. What i feel, nothing. nothing like just nothing,  a hollow. It's almost impossible to explain. Just sitting in a corner of my dark room and wondering, why m i here.why m doing all these. Why m i not able to keep myself busy .
  This all hush hush of branch and banking.freaking , I just wanted to quit. 
Why m I so afraid ?I remember in my whole life I always used to be afraid. afraid of something or may be anything. I want to be free , want to be out of this freaking word..."being afraid"...........

निष्पृह