Saturday, July 21, 2012

hmmmmmmmmmmmm.....

what?Just wanted to write a b'ful sentence....hmm u said.....चाहे जितने भी गिले शिकवे  हो , हम जब भी मिलते है , एक दुसरे को खुले दिल से स्वीकार करते है ...

 Yes , yes yes....and thanks u made me remember that it's Neetu's b'day today..How could i forget this date ...freak...i forgot ...anyway called her and did wish my sweet sis........
And for last 2 days m going to Badi sadri, for kinda bank's works....n what, I love long drives, specially when m alone ....and It's b'ful lush greenery over there....drove at 26 km/h ....seems too slow.....but enjoyed every bit  of that....stopped my bike , stood over there, closed my eyes and spread my hands , as I was on Titanic ....awusum......passerby might thought ..kinda  mad ...and I smiled .."yes, I am"......

Reading "Of course I love you.." by Durjoy datta....and m loving it...साथ में गुलजार की "रावी पार " भी पढ़ रहा हूँ . अनुपम , अद्वितीय ,एक शायर की कहानिया ...और अचानक से मुझे धर्मवीर भारती का उपन्यास "गुनाहों का देवता " याद  आ गया....याद आ गया , अपना इलाहाबाद और साथ में चंदर और सुधा भी ....कालजयी !!! 

Friday, July 20, 2012

पता नहीं

एक बहुत ही खुबसूरत कविता पढ़ी ...गजाननं माधव मुक्तिबोध जी की ...
लिख रहा हूँ ............

पता नहीं ,कब ,कौन ,कहाँ , किस ओर मिले ,
किस साँझ मिले , किस सुबह मिले !!
यह राह जिंदगी की ,
जिससे जिस जगह मिले, है ठीक वही ,
बस वही अहाते मेहंदी के ,
जिनके भीतर है कोई घर ,
बाहर प्रसन्न पीली कनेर ,
बरगद ऊँचा ,जमीं गीली ,
मन जिन्हें देखकर कल्पना करेगा जाने क्या !!
तब बैठ एक गंभीर वृक्ष के तले 
टटोला मन , जिससे जिस छोर मिले ,
कर अपने अपने तप्त अनुभवों की तुलना 
घुलना मिलना ....

अपनी धकधक में दर्दीले फैले -फैलेपन की मिठास ,
या निह्स्वत्मक विकास का युग 
जिसकी मानव गति को सुनकर 
तुम दौडोगे प्रत्येक व्यक्ति के 
 चरण तले जनपथ बनकर !!
 
वे आस्थाये तुमको दरिद्र करवाएंगी 
की  दैन्य ही भोगोगे पर ,तुम  अनन्य होगे ..
प्रसन्न होगे ...

 आत्मीय एक  छवी तुम्हे नित्य भटकाएगी 
जिस जगह , जहाँ जो छोर मिले  ले जाएगी ..
पता नहीं ..कब , कौन ,कहाँ , किस ओर मिले।.......








Tuesday, July 17, 2012

ब्रज वीर : विदाई

 आज अंतिम दिन  है ब्रज वीर का हमारे साथ , सोचा तो  की बहुत कुछ लिखूंगा उसके बारे में ,  पर कुछ मन ही नहीं हो रहा है लिखने का , मैं खुद ही बहुत बुझा बुझा सा महसूस कर रहा हूँ ,ना  तो अब हंसने का मन  होता है न ही रोने का ... ख़ैर जो भी हो जब एक अच्छा इन्सान जिंदगी से छूटता है तो  तकलीफ तो होती है ...बस भगवान  से  यही दुआ  करता हु कि  जहाँ  भी रहे , हमेशा खुश रहे ,  हँसता रहे , मुस्कुराता रहे ....और जो भी सपने उसने देखे है सब पुरे हो ...एक खास बात यहाँ नोट कर लूँगा की इस बन्दे में त्याग की भावना है , और यही तो एक चीज़ है जो इन्सान को महान और अच्छा बनाता है ....त्याग ......May God bless him...

And I got seven books from Flipkart.....Best way to keep myself busy..
1.Of course I love u....till I find some one better by Durjoy Datta
2.You were my crush ...till u said u love me by Durjoy
3.Madhushala by Hariwansh roy bacchan
4.madhubala by Hariwansh roy bacchan
5.Rawi par by Gulzar(This book was in my mine since class 10th)
6.Ek gadhe ki aatmakatha by Krishna Chandar
7.Mudrarakshasa by Vishkhadatta(trans:-rangey Raghav)...sannskrit ki mahan kriti..

इन किताबो को पढ़ कर ही अब मेरा दिन गुजरेगा .....

and for Braj Veer...U r a great guy, i'll miss u.....


Monday, July 2, 2012

दादाजी का जाना और दीदी की शादी


ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही न था , दीदी की शादी के ठीक २ दिन पहले दादाजी का देहांत ....
मेरी जिंदगी का शायद सबसे बड़ा सदमा ,एक तरफ तो हम उसे अपने घर से विदा करा रहे थे , जिसने मुझे बड़े लड़ प्यार से रखा , और दूसरी तरफ उन्हें जो मुझे बड़े स्नेह से रखते थे ...दादाजी का आत्मीय  स्नेह और दीदी की ममता , एक ही बार में दोनों मेरी जिंदगी से गायब...
पर क्या करू, यही जिंदगी है , क्यों इतना दुःख होता है .....मन तो करता है की जार jaar होकर रो पडूँ, पर रो भी नहीं पता ......क्यूँ इतना शुष्क हो गया हूँ मैं ....

Tuesday, May 29, 2012

ब्रज वीर

हाँ जी, ब्रज वीर के बारे में सोच रहा था के कुछ लिखू ....पहले दिन जब ये ब्रांच में आया तो मैं भिड गया था ....मुझे इसका व्यवहार एकदम से पसंद नहीं आया ....सोचा कितना खडूस है ये ये....और आज जब ये लिख रहा हूँ तो लगता है , मैं गलत था ...ये खडूस नहीं है ये ऐसा ही है ......

धीरे धीरे इसे जानने  की कोशिश कर रहा हूँ ! मुझे लोगो को पढ़ना बहुत पसंद है और खास कर ऐसे लोगो को जिनमे कुछ खास होता है ...इस बन्दे को देख कर मुझे ऐसा महसुसू होता है , खुदा ने इसे कुछ बहुत ही खास बक्शा है ..कुछ बहुत ही खास ..शयद इसकी तन्हाई या  फिर इसका अकेलापन..या फिर इसके अकेले होने की चाहत....

बरबस ही वो लड़की याद आ जाती है  , अलका अग्रवाल , वही चुलबुली सी लड़की ...जिसका चुलबुलापन पता नहीं 5th  के बाद कहाँ गायब हो गयी थी ...निर्निमेष आँखे ...एक खाने को दौड़ता अकेलापन ...याद करता हूँ , 5th के बाद उसने कोई नया दोस्त भी नहीं बनाया ....खूब जानने की कोशिश की...आखिर क्यों ऐसा हुआ ...क्यूँ एक चुलबुली सी , प्यारी से मुस्कान एक खुबसूरत चेहरे से गायब हो गयी ...........

जो भी हो शायद अब मैं उसकी वजह जान भी नहीं पाउँगा ...और वही निर्निमेष आँखे अब मैं ब्रज वीर में पाता हूँ ..पता नहीं क्यों एक सूनापन ...एक अजीब सा सूनापन उसकी आँखों में दिखाई देता है ...और मुझे ऐसा सूनापन और ऐसी एकाकी एकदम पसंद नहीं .....तो मैं हमेशा ही उसे हंसाने की कोशिश करता हूँ .....शवाब, शराब और कवाब ..पर नहीं यार...हंस देता है वो ...लेकिन ये हंसी भी खोखली जान पड़ती है ..ऊपर से हंस देता है....पता नहीं इस बन्दे ने कब अन्दर से खुल के हंसी आई हो ...

और सबसे बुरी चीज़ तो ये है की, भाई साब हमेशा सिरिअस रहते है , जिंदगी से fun  जैसी चीज़ को तो लगता है काट कर फेंक दिया है , अरे भाई थोडा चेहरे पे मुस्कराहट रखो , पता नहीं कब सामने वाले की मुस्कराहट तेरी मुस्कराहट से अपनत्व जोड़ ले ..पर ना ये चांस भी नहीं लेना ....ठीक है ..पर सामने वाले को तो चांस दो....नहीं वो भी नहीं होगा ...और हर चीज़ के पीछे Logical मतलब तार्किक हो जाना तो इनका  सब से विशेष गुण है ...थोड़ी पागलपंथी भी तो जरुरी है ना ..जिंदगी के लिए....थोडा अनमना होना , थोडा खिल्दंडा होना ...

और जब जानने की कोशिश करता हूँ की , वो ऐसा क्यूँ है तो कोई उत्तर नहीं पाता ...तो खुद ही उत्तर ढूंढने लग jata हूँ ....क्यूँ है ऐसा ...बचपन का कोई दुह:स्वप्न ...पर नहीं ऐसा भी कुछ नहीं...गरीबी का दंश तो नहीं .....क्यूंकि गरीबी तो ऐसी चीज़ है सब से पहले चेहरे की मुस्कराहट ही छीन  लेती है, पर ऐसा भी नहीं है ...भाई साब तो खाते पीते घर से हैं ...तो फिर ऐसा क्यूँ है ...और फिर ध्यान आता है की किसी लड़की वडकी का तो चक्कर नहीं ...और यहाँ पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं पाता ....अरे भाई दिल के दरवाजे खुले रखो .....एक लड़की के चक्कर में तो तुम इतने विछिन्न  नहीं हो सकते  ......बस मुस्कुराते रहो ....पर नहीं चेहरे में हमेशा  ही seriousness .......

और मुझे भी खुजली होती रहती है की , हँसता रहता हूँ , भाई तू इतना serious क्यूँ है ....Life is beautiful , colorful , देख तो सही ....हर वक़्त कैरिएर , लाइफ , कैरिएर , लाइफ , कैरिएर लाइफ ...

अब कल ले गया उसे मैं , JK मंदिर और अम्बामाता ....पर उसे तो मेरे रूम पे ही रहना पसंद था ..कितना जिद करना पड़ा कि ...चलो ...finally मैं बहुत खुश  हुआ  जब धन्यवाद् मेसेज मिला ...चलो थोडा काम तो आया मैं , थोड़ी ख़ुशी और जयादा तो नहीं थोडा सा असली मुस्कराहट का अहसास मुझे उसके उस मेसेज से मिला  ..............

चलो ज्यादा नहीं लिखता हूँ , बस अब बंद करता हूँ ..........काफी दिन काटने बाकी है अभी ब्रज वीर के साथ ....जब  अलविदा कहोगे  तो बहुत कुछ लिखूंगा ....

Sunday, April 15, 2012

नाटक का पटाक्षेप

5 महीने से चल रहे नाटक   पर्दा गिरा और नाटक ख़तम ....सच में हम पर्दा गिरने का ही इन्तेजार कर रहे होते हैं ....कुछ किरदार बहुत ही नाटकीय होते हैं और कुछ बहुत ही सीधे साधे..बस इसी से तो नाटक बनता है ....और हर नाटक से कुछ  न कुछ सीखने को मिलता है ...और हर नाटक के बाद इन्सान थोडा और मजबूत होता है ...थोडा और अनुभवी ......सच कहूँ तो इस से उसे अगले नाटक को सही से करने की शक्ति मिलती है , चाहे किरदार कोई भी हो ....

और साला एक नाटक के ख़तम होने के बाद जिंदगी रूकती कहाँ है ...बस चलती  जाती है ...और हम नए नाटक के लिए तैयार हो रहे होते हैं...

बस इन्सान को खुद को तैयार रखना चहिये...हर किरदार में अपने आप को ढालने के लिए..और हर उस नाटक के लिए भी तैयार होना चहिये..जो भगवन उसके लिए चुनता है....


मैं तो अपना किरदार सही से निभाने की कोशिश कर रहा हूँ..बस यही पुछ ता हूँ की क्या आप भी इमानदार हैं..

Saturday, March 24, 2012

बिखर जाने का मन कर रहा है

बिखर जाने का मन कर रहा है ....कभी कभी ही तो ऐसा महसूस होता है जिंदगी में ..जब पूरी दुनिया, ये शहर , ये जॉब बेमतलब के लगने लगते हैं ....और तो तब जब खुद का होना भी बेमतलब सा होता है ..एकदम बेमतलब ...तो लगता है की बिखर जाऊ मैं , बाँट जाऊ टुकडो टुकडो में और बिखर जाऊ , और ऐसा बिखरू की नामो निशान  मिट जाये .....क्यूँ होता है ऐसा जब इन्सान खुद के अस्तित्व को ही मिटा देना चाहता है , सब सिर्फ भावनाएं होती है ...चलो वक़्त बहुत बड़ा मरहम होता है इस अहसास को भी मिटा देगा .......
पर सच में यार जिंदगी में हर अहसास का अपना अलग महत्त्व है ...और इस बिखर जाने का अहसास तो और भी ......कभी कभी तो सोचता हूँ की मैं बहुत भाग्यशाली हूँ की , इस दौर से गुजर रहा हु ......सच है यार कितने लोगो को ये अहसास होता होगा ....अपने अस्तित्व को मिटा देने का अहसास ....


प्रभु वक़्त बहुत बड़ी मरहम है न , सब कुछ मिटा देती है , सब कुछ भर देती है ..बस इसी वक़्त के सहारे गुजर रहा हु ...बस बिखरने मत देना मुझे , मिटने मत देना मुझे , मुझे खड़ा रहना है , सबके लिए , और सबकी मुस्कराहट के लिए , बरसात में भी , और धुप में भी मुझे ऐसे ही खड़ा रहना है , मुस्कुराते हुए, सबकी मुस्कराहट के लिए ...........बिखरने मत देना मुझे ....

निष्पृह