Tuesday, May 29, 2012

ब्रज वीर

हाँ जी, ब्रज वीर के बारे में सोच रहा था के कुछ लिखू ....पहले दिन जब ये ब्रांच में आया तो मैं भिड गया था ....मुझे इसका व्यवहार एकदम से पसंद नहीं आया ....सोचा कितना खडूस है ये ये....और आज जब ये लिख रहा हूँ तो लगता है , मैं गलत था ...ये खडूस नहीं है ये ऐसा ही है ......

धीरे धीरे इसे जानने  की कोशिश कर रहा हूँ ! मुझे लोगो को पढ़ना बहुत पसंद है और खास कर ऐसे लोगो को जिनमे कुछ खास होता है ...इस बन्दे को देख कर मुझे ऐसा महसुसू होता है , खुदा ने इसे कुछ बहुत ही खास बक्शा है ..कुछ बहुत ही खास ..शयद इसकी तन्हाई या  फिर इसका अकेलापन..या फिर इसके अकेले होने की चाहत....

बरबस ही वो लड़की याद आ जाती है  , अलका अग्रवाल , वही चुलबुली सी लड़की ...जिसका चुलबुलापन पता नहीं 5th  के बाद कहाँ गायब हो गयी थी ...निर्निमेष आँखे ...एक खाने को दौड़ता अकेलापन ...याद करता हूँ , 5th के बाद उसने कोई नया दोस्त भी नहीं बनाया ....खूब जानने की कोशिश की...आखिर क्यों ऐसा हुआ ...क्यूँ एक चुलबुली सी , प्यारी से मुस्कान एक खुबसूरत चेहरे से गायब हो गयी ...........

जो भी हो शायद अब मैं उसकी वजह जान भी नहीं पाउँगा ...और वही निर्निमेष आँखे अब मैं ब्रज वीर में पाता हूँ ..पता नहीं क्यों एक सूनापन ...एक अजीब सा सूनापन उसकी आँखों में दिखाई देता है ...और मुझे ऐसा सूनापन और ऐसी एकाकी एकदम पसंद नहीं .....तो मैं हमेशा ही उसे हंसाने की कोशिश करता हूँ .....शवाब, शराब और कवाब ..पर नहीं यार...हंस देता है वो ...लेकिन ये हंसी भी खोखली जान पड़ती है ..ऊपर से हंस देता है....पता नहीं इस बन्दे ने कब अन्दर से खुल के हंसी आई हो ...

और सबसे बुरी चीज़ तो ये है की, भाई साब हमेशा सिरिअस रहते है , जिंदगी से fun  जैसी चीज़ को तो लगता है काट कर फेंक दिया है , अरे भाई थोडा चेहरे पे मुस्कराहट रखो , पता नहीं कब सामने वाले की मुस्कराहट तेरी मुस्कराहट से अपनत्व जोड़ ले ..पर ना ये चांस भी नहीं लेना ....ठीक है ..पर सामने वाले को तो चांस दो....नहीं वो भी नहीं होगा ...और हर चीज़ के पीछे Logical मतलब तार्किक हो जाना तो इनका  सब से विशेष गुण है ...थोड़ी पागलपंथी भी तो जरुरी है ना ..जिंदगी के लिए....थोडा अनमना होना , थोडा खिल्दंडा होना ...

और जब जानने की कोशिश करता हूँ की , वो ऐसा क्यूँ है तो कोई उत्तर नहीं पाता ...तो खुद ही उत्तर ढूंढने लग jata हूँ ....क्यूँ है ऐसा ...बचपन का कोई दुह:स्वप्न ...पर नहीं ऐसा भी कुछ नहीं...गरीबी का दंश तो नहीं .....क्यूंकि गरीबी तो ऐसी चीज़ है सब से पहले चेहरे की मुस्कराहट ही छीन  लेती है, पर ऐसा भी नहीं है ...भाई साब तो खाते पीते घर से हैं ...तो फिर ऐसा क्यूँ है ...और फिर ध्यान आता है की किसी लड़की वडकी का तो चक्कर नहीं ...और यहाँ पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं पाता ....अरे भाई दिल के दरवाजे खुले रखो .....एक लड़की के चक्कर में तो तुम इतने विछिन्न  नहीं हो सकते  ......बस मुस्कुराते रहो ....पर नहीं चेहरे में हमेशा  ही seriousness .......

और मुझे भी खुजली होती रहती है की , हँसता रहता हूँ , भाई तू इतना serious क्यूँ है ....Life is beautiful , colorful , देख तो सही ....हर वक़्त कैरिएर , लाइफ , कैरिएर , लाइफ , कैरिएर लाइफ ...

अब कल ले गया उसे मैं , JK मंदिर और अम्बामाता ....पर उसे तो मेरे रूम पे ही रहना पसंद था ..कितना जिद करना पड़ा कि ...चलो ...finally मैं बहुत खुश  हुआ  जब धन्यवाद् मेसेज मिला ...चलो थोडा काम तो आया मैं , थोड़ी ख़ुशी और जयादा तो नहीं थोडा सा असली मुस्कराहट का अहसास मुझे उसके उस मेसेज से मिला  ..............

चलो ज्यादा नहीं लिखता हूँ , बस अब बंद करता हूँ ..........काफी दिन काटने बाकी है अभी ब्रज वीर के साथ ....जब  अलविदा कहोगे  तो बहुत कुछ लिखूंगा ....

Sunday, April 15, 2012

नाटक का पटाक्षेप

5 महीने से चल रहे नाटक   पर्दा गिरा और नाटक ख़तम ....सच में हम पर्दा गिरने का ही इन्तेजार कर रहे होते हैं ....कुछ किरदार बहुत ही नाटकीय होते हैं और कुछ बहुत ही सीधे साधे..बस इसी से तो नाटक बनता है ....और हर नाटक से कुछ  न कुछ सीखने को मिलता है ...और हर नाटक के बाद इन्सान थोडा और मजबूत होता है ...थोडा और अनुभवी ......सच कहूँ तो इस से उसे अगले नाटक को सही से करने की शक्ति मिलती है , चाहे किरदार कोई भी हो ....

और साला एक नाटक के ख़तम होने के बाद जिंदगी रूकती कहाँ है ...बस चलती  जाती है ...और हम नए नाटक के लिए तैयार हो रहे होते हैं...

बस इन्सान को खुद को तैयार रखना चहिये...हर किरदार में अपने आप को ढालने के लिए..और हर उस नाटक के लिए भी तैयार होना चहिये..जो भगवन उसके लिए चुनता है....


मैं तो अपना किरदार सही से निभाने की कोशिश कर रहा हूँ..बस यही पुछ ता हूँ की क्या आप भी इमानदार हैं..

Saturday, March 24, 2012

बिखर जाने का मन कर रहा है

बिखर जाने का मन कर रहा है ....कभी कभी ही तो ऐसा महसूस होता है जिंदगी में ..जब पूरी दुनिया, ये शहर , ये जॉब बेमतलब के लगने लगते हैं ....और तो तब जब खुद का होना भी बेमतलब सा होता है ..एकदम बेमतलब ...तो लगता है की बिखर जाऊ मैं , बाँट जाऊ टुकडो टुकडो में और बिखर जाऊ , और ऐसा बिखरू की नामो निशान  मिट जाये .....क्यूँ होता है ऐसा जब इन्सान खुद के अस्तित्व को ही मिटा देना चाहता है , सब सिर्फ भावनाएं होती है ...चलो वक़्त बहुत बड़ा मरहम होता है इस अहसास को भी मिटा देगा .......
पर सच में यार जिंदगी में हर अहसास का अपना अलग महत्त्व है ...और इस बिखर जाने का अहसास तो और भी ......कभी कभी तो सोचता हूँ की मैं बहुत भाग्यशाली हूँ की , इस दौर से गुजर रहा हु ......सच है यार कितने लोगो को ये अहसास होता होगा ....अपने अस्तित्व को मिटा देने का अहसास ....


प्रभु वक़्त बहुत बड़ी मरहम है न , सब कुछ मिटा देती है , सब कुछ भर देती है ..बस इसी वक़्त के सहारे गुजर रहा हु ...बस बिखरने मत देना मुझे , मिटने मत देना मुझे , मुझे खड़ा रहना है , सबके लिए , और सबकी मुस्कराहट के लिए , बरसात में भी , और धुप में भी मुझे ऐसे ही खड़ा रहना है , मुस्कुराते हुए, सबकी मुस्कराहट के लिए ...........बिखरने मत देना मुझे ....

Tuesday, December 27, 2011

नकाराकात्मक उर्जा का प्रवाह

पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है की , आजकल तिन चार दिनों से मेरे अन्दर से negative energy  flow हो  raha है ..मैंने एकदम से खुश नहीं हो प् रहा हूँ . पता नहीं क्यों ..हमेशा लोगों के बारे में सोचता हूँ की अच्छा सोचूंगा लेकिन ऐसा नहीं हो प् रहा है , aakhir ऐसा क्यों हो रहा है...
kaha gaya है न की जब आप अच्छे होते हो तो सब आप को अच्छे लगते  हैं और  जब आप ही अच्छे नहीं होते तो कोई भी अच  नहीं लगता ....matlab ऐसा है की मैं बहुत बुरा हो रहा हूँ...
मुझे किसी के बारे में बुरा सोचने का कोई haq नहीं है ...न ही बुरा सोचने का ..सब लोग अच्छे हैं..हर दिन मैं ऐसा सोच कर ही जाता हूँ लेकिन क्यों मैं खुद को ठीक नहीं rakh प् रहा हूँ ..aj तो मेरे माथा भी दुखने लगा...यार समझ में नहीं आता की ऐसा कैसे हो रहा है...
मैं केन्द्रित हो कर कम नहीं कर प् रहा हूँ...

आज भी मैंने किसी को ऐसा बोल दिया जो मुझे नहीं कहना चाहिए ...बाद में मुझे बहुत अफ़सोस हुआ ...बाद मैं मुझे खुद पर बहुत खीज भी हुआ की मैंने ऐसा क्यों कह दिया...अफ़सोस तो ये है की शब्द वापस नहीं लिए जा सकते...भगवन मुझे इन बुरी चीजों से बचाओ...

भगवन please  मुझे समर्थ बनाओ ताकि कोई भी स्थिथि हो मैं हँसता रहा मुस्कराता रहूँ और कम करता रहूँ..कोई ऐसा गुण सूत्र दो की मैं किसी के बारे मैं न तो बुरा सोचूं और न ही किसे को बुरा कहूँ और न तो किसी की बुरे सुनु...सच है यहाँ सभी लोग अच्छे हैं...और please मुझे भी अच्छा बनाओ....
मुझे  इतनी ताकत दो की अपनी सकारात्मक उर्जा को किसी भी नकारात्मक उर्जा से प्रभावित नहीं होते दूँ..अपने प्रभाव को धूमिल न होने दूँ...खुश रहूँ....मस्त रहूँ...किसी को हर्ट न करूँ...

Friday, December 23, 2011

प्रतिबद्धता

हाँ अब प्रतिबद्ध हूँ ...भटकाव थोडा कम होता है ...प्रतिबद्धता बहुत बड़ी चीज़ hoti है चाहे वो जैसे भी ही...
किसी के लिए हो या किसी लक्ष्य के लिए ...अच्छा होता है ...किसी चीज़ से जुड़  जाना aur  phir प्रतिबद्ध हो जाना .......

Thursday, December 22, 2011

सजनी मान जाओ ना , दिल आज रूठा है !

Sajni Man jao na!!


सजनी मान जाओ ना , दिल आज रूठा है  ! हाँ कभी कभी बहुत अच्छे गाने मिल जाते हैं , इस गाने को मैंने बहुत पहले भी सुना था पर , पता नहीं आज कौन सी कसक है की २ घंटे से इसे सुन रहा  हूँ और  बहुत कुछ बुनने की कोशिश कर रहा हूँ, सच मैं JAL Band  को बुत धन्यवाद् देता हूँ , बहुत ही खुबसूरत विडियो और बहुत ही अच्छे बोल.....
सोचता हूँ , कितनी खुबसूरत चीज़ उपरवाले ने बने  जिसे लोग मोहब्बत  कहते हैं, पर बहुतों के लिए तो सजा ही होता है, ५ फीट और ६ इंच के हाड़ मांस से बने बुत को तो ये एक नेमत से काम तो नहीं है , पर सच है यार सच्ची मोहब्बत अब कहाँ मिलती है , एक सीरियल आ रहा है  "कुछ तो लोग कहेंगे" इसमें भी कुछ ऐसा ही है , "लोलिता " इस उपन्यास मैं भी कुछ ऐसा ही था...कुछ तो है ये जरुर , दिल मेरा कितना मजबूर , जान के भी तू जाने ना सैयां सैया ,नैनो की भाषा समझे ना  ...हाँ पर समझने और समझाने वाला भी तो होना चाहिए....वक़्त दो वक़्त कहीं ना कहीं कोई ना कोई तो समझाने वाला तो होना चहिये , हाँ भाई नहीं तो जीने का मतलब ही क्या रह जायेगा....
खली वक़्त का सही सदुपयोग हो रहा है मैं यहाँ तनहा हूँ तो अकेलेपन मैं बहुत बेकार की चीजें माथा ख़राब करती है ...वक़्त तो बहुत ही ख़राब होता है , पर क्या करूँ , ये अकेलापन भी बहुत बुरी चीज़ है और तब जब कोई रास्ता ही नहीं दिखाई दे रहा है, मंजिल तो दूर की बात है...और जब भी मैं मंजिल की बात करता हूँ , घबरा जाता हूँ, घबरा ..क्या सोचा था और क्या हो रहा है ...यार यही तो नियति है ....सब कुछ नियत है ...Fixed  है ....२०-२० मैच की  तरह ...सब कुछ अगर fixed  है तो ये  जीने की इतनी जद्दोजहद क्यों है क्यों है अस्तित्व  की लड़ाई .....हाँ  सच है अस्तित्व की ही तो लड़ाई है ..अपने वजूद को बचाए रखने की...पता नहीं कब तक संभल कर रख पाऊंगा  अपने वजूद ko...बस संघर्ष है वजूद का अस्तित्व का ...एक पहचान पाने की ललक है ....तो बहुत ही तीव्र है बहुत ही तीव्र ..जिसमे से एक अपूर्व रोशनी निकलती रहती है और आँखों मैं सपनो को उजाले देती रहती है ..हम जिसे अपने खवाबों से पालते हैं..और पालना भी चाहिए...

Sunday, December 18, 2011

जिंदगी का क्या

क्या करूँ भाई कुछ समझ मैं नहीं आता , कहाँ जाऊं क्या करूँ कैसे करूँ, एक अजीब सी बैचैनी से मैं परेसान हुआ जाता हूँ ,यार क्या मतलब है इस लाइफ का कहाँ ढूँढू इसका मतलब, या नहीं ढूँढू, करूँ तो मैं क्या करूँ, यार कुछ तो करना होगा ,मतलब तो निकलना ही पड़ेगा भाई नहीं तो बेमतलब हो जाएगी पूरी जिंदगी, कहाँ है मंजिल, कहाँ है रास्ता , कुछ तो पता चले , अरे हाँ कुछ तो पता चले , निम्बहेरा की जिंदगी , कैसी है जिंदगी कैसा है सफ़र , क्या पैसा कमाना और पेट पलना यही जिंदगी होती है
क्या ऐसा ही सब कुछ चलता रहेगा या कुछ बदलाव भी होंगे , जब मैं अकेला होता हूँ तो बहुत सरे प्रश्नों का जवाब ढूंढता हूँ या बस टाइम पास करता हूँ कुछ पता ही नहीं चल पता, पता नहीं कब पता चलेगा! पता नहीं कब तक मैं वो सारी चीजें करूँगा जो बचपन से मेरे सपने रहे हैं, अभी तो ऐसा लगता है की कुछ भी नहीं हो पायेगा , कुछ भी नहीं, ..अब भगवन ही मुझे रास्ता दिखा सकते हैं ...तो यार दिखाओ न ...नहीं तो मैं ऐसा ही V चैनल ही देखता रह जाऊंगा ! यार मुझे कुछ और भी देखना है और कुछ करना भी है ......पर पता नहीं का तक!

निष्पृह